जन्म तों पहले ही धियाँ मार मुकाईयाँ रब्ब वर्गेयाँ हाथ चोंवी ज़हर दियाँ सुईईयाँ आईयां ने।

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✍️ तृप्ता भाटिया

गर्भ में आये हर बच्चे को जन्म मिले यह उसका जन्मसिद्ध अधिकार होना चाहिए पर वह बेटा हो या बेटी इस आधार पर बच्चे को जीवन देना एक घिनौनी मानसिकता है। दुनिया चाँद पर पहुंची गयी है और यहाँ लोग यह तय ही नहीं कर पा रहे कि बेटी को जन्म दिया जाए या नहीं अफसोस इस बात का है कि गर्भ में भ्रूण को मिटाने में माँ की भी न चाहते हुए रजामंदी होती है चाहे वो किसी दबाव में ही क्यों न हो। एक माँ का अपने बच्चे पर पहला और आखिरी अधिकार होता है अगर वो इन बुराईयों के लिए आवाज बुलंद कर ले तो इस तरह के कानूनन अपराध को रोका जा सकता है और यह सबकी नैतिक जिमेदारी बनती है।
पिछले पांच सालों में लिंग अनुपात में काफी आई है जो चिंतनीय है। लड़कों के मुकाबले में लड़कियों की संख्या में कमी आना निश्चित ही चिंताजनक है। गर्भ में भ्रूण हत्या करना महापाप है जिस पर रोक लगाना अति आवश्यक है। आधुनिकता के इस दौर में लड़कियां किसी भी सूरत में लड़कों से कम नहीं हैं लोगों में यह जागरूकता होनी चाहिये कि वे लड़का लड़की में भेद न करें।
सबसे पहले माँ तय करे कि उसकी कोख में जो बच्चा है उसकी सुरक्षा वह हर हालत में करेगी फिर चाहे उसे अपने के खिलाफ ही जंग क्यों न लड़नी पड़े और सभी सरकारी और गैर सरकारी संस्थओं को ऐसी महिलाओं का साथ देना होगा। सरकार को चाहिये कि वह निजी हस्पतालों और क्लिनिक पर नज़र रखे जो जन्म से पूर्व बच्चे का लिंग बताते हैं अपने स्वार्थ, चंद पैसों के लालच में गर्भ में ही बेटियों को मार देते हैं। हालांकि परिवार की सहमति से ही ऐसे कार्य को अंजाम दिया जाता है पर कोई भी संस्थान खुद प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लिंग परीक्षण या भ्रूण हत्या में सहभागिता न करे। अपितु अगर कोई इस तरह की जानकारी लेने चाहता है तो इसकी सूचना प्रशासन को दें। यह बहुत ही जरूरी है ताकि समाज में लड़के लड़कियों की संख्या का बैलेंस बना रहे। समाज के सभी वर्ग के लोगों को जागरूक किया जाना चाहिए और समय पर कठोर कार्यवाही की जानी चाहिये।

दुर्भाग्य यह भी है ऐसे अपराध में संलिप्त वो पाये जाते हैं जिनका समाज में भगवान के बाद का दूसरा दर्जा है। डॉक्टर जो सिर्फ जीवन देने के लिए जाने जाते हैं उनमें से कुछ महत्वकांशी थोड़े से पैसे के लिए न केवल कानून अपराध करते हैं बल्कि अपने पेशे के साथ भी दगाबाजी कर जाते हैं। उनके लिए इतना ही कहा जा सकता है कि “जन्म लैण तों पहले ही धियाँ मार मुकाईयाँ ने, रब्ब वर्गेयाँ हाथ चों वी ज़हर दियाँ सुईईयाँ आईयां ने”।
इस बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि यदि गर्भ में लड़का है या लड़की इसकी जानकारी नहीं दी जाये तो समाज के पास जन्म देने के अलावा कोई ओर रास्ता बचता ही नहीं है।