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Child Nutrition: क्या कार्टून देखते ही बच्चों के डाइजेस्टिव एंजाइम्स बंद हो जाते हैं? जानिए एक्सपर्ट्स की राय

Screen Time and Child Nutrition: डिजिटल युग में बच्चों की खानपान की आदतों में आए बदलावों और स्क्रीन टाइम से जुड़े दावों का वैज्ञानिक विश्लेषण। जानिए रिस्पॉन्सिव फीडिंग का सही तरीका और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की सिफारिशें।
Updated By News Desk
Published on: 15 अक्टूबर 2026
Child Nutrition: क्या कार्टून देखते ही बच्चों के डाइजेस्टिव एंजाइम्स बंद हो जाते हैं? जानिए एक्सपर्ट्स की राय

Child Nutrition: आजकल अधिकतर परिवारों में रात का खाना शुरू होते ही बच्चों के हाथों में मोबाइल थमा दिया जाता है। एक हाथ में चम्मच और दूसरे हाथ में फोन, स्क्रीन पर पसंदीदा कार्टून या राइम्स चलते रहते हैं और इसी बीच बच्चा खाना खाता है। जब प्लेट खाली हो जाती है, तो माता-पिता इसे अपनी सफलता मान लेते हैं।

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हालांकि, सोशल मीडिया पर अक्सर ऐसे नाटकीय दावे किए जाते हैं कि स्क्रीन देखने से बच्चे के डाइजेस्टिव एंजाइम्स काम करना बंद कर देते हैं या मोबाइल सीधे पाचन तंत्र को नुकसान पहुंचाता है। लेकिन वर्तमान में ऐसे दावों की पुष्टि के लिए कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं है।

पेरेंट्स के लिए सबसे पहली बात यह समझना जरूरी है कि बिना वजह खुद को दोषी महसूस करना सही नहीं है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, ऑफिस का तनाव, घर के काम और बच्चे के पोषण की चिंता बेहद वास्तविक है। ऐसे में स्क्रीन कई बार माता-पिता के लिए एक त्वरित और आसान सहारा बन जाती है।

हालांकि, इसे रोजाना के भोजन का एक स्थायी हिस्सा बनाना भी उचित नहीं माना जाता। स्क्रीन फीडिंग को धीरे-धीरे कम करने के लिए पूरे परिवार के सहयोग से शुरुआत की जा सकती है। इसके लिए दिन का कम से कम एक भोजन ऐसा तय किया जाना चाहिए जो स्क्रीन-फ्री हो। इसमें यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि नियम पूरे परिवार पर लागू हो, न कि केवल बच्चे पर।

अभिभावकों पर बेवजह का दबाव और व्यवहारिक चुनौतियां

विशेषज्ञ मानते हैं कि दैनिक जीवन में दफ्तर का तनाव, थकान, घर के काम और बच्चे के पोषण की चिंता बेहद वास्तविक है। ऐसे में स्क्रीन माता-पिता के लिए एक आसान सहारा बन जाती है। विशेषज्ञों  के अनुसार अभिभावकों को इसके लिए अपराधी महसूस कराने की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, स्क्रीन को हर दिन के भोजन का स्थायी हिस्सा बनने से रोका जा सकता है।

इसके लिए पूरे परिवार को मिलकर प्रयास करने होंगे। उदाहरण के लिए, यदि घर में केवल बच्चे का फोन बंद कर दिया जाए और बाकी सदस्य टीवी या अन्य उपकरणों का इस्तेमाल करते रहें, तो यह तरीका कारगर नहीं होता। अनुशासन के नियम पूरे परिवार पर समान रूप से लागू होने चाहिए। दिन में कम से कम एक वक्त का भोजन ऐसा तय किया जा सकता है जो पूरी तरह से स्क्रीन-मुक्त हो।

रिस्पॉन्सिव फीडिंग: सही पोषण का आधुनिक दृष्टिकोण

बच्चों में स्वस्थ खानपान की आदतें विकसित करने के लिए ‘रिस्पॉन्सिव फीडिंग’ दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी इस प्रक्रिया की सिफारिश करता है। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • उम्र के अनुसार भोजन का चुनाव: बच्चे को उसकी उम्र के हिसाब से सुरक्षित टेक्सचर और छोटे पोर्शन में खाना दें।
  • स्वयं खाने का अवसर: बच्चे को देखरेख में भोजन को देखने, छूने और खुद खाने का अभ्यास करने दें। इस दौरान थोड़ा बिखराव (मेस) होना स्वाभाविक है, क्योंकि डाइनिंग टेबल कोई ऑपरेशन थिएटर नहीं है।
  • भूख और तृप्ति के संकेतों को समझना: बच्चा जब मुंह बंद कर ले, सिर घुमाए या प्लेट को दूर धकेले, तो ये संकेत बताते हैं कि उसका पेट भर चुका है। बच्चे को खाने के लिए प्रोत्साहित करें, लेकिन जबरदस्ती बिल्कुल न करें।

चिकित्सकीय परामर्श कब आवश्यक है?

हर समस्या के लिए केवल मोबाइल को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। यदि बच्चे का वजन सही तरीके से नहीं बढ़ रहा है, खाते समय उसे दर्द या बार-बार खांसी होती है, या फिर वह बेहद सीमित चीजें ही खाता है, तो यह केवल आदत का मामला नहीं हो सकता। ऐसे मामलों में बाल रोग विशेषज्ञ (Pediatrician) से विस्तृत जांच करानी चाहिए, क्योंकि ईटिंग और फीडिंग कठिनाइयों में व्यक्तिगत चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता होती है।

भोजन का मूल उद्देश्य केवल पेट भरना नहीं, बल्कि खाने के साथ एक सकारात्मक और स्वस्थ संबंध बनाना है। परिजनों को यह विचार करने की आवश्यकता है कि वे बच्चे की स्वाभाविक भूख का सम्मान कर रहे हैं या केवल स्क्रीन चलाकर कटोरी खाली कराने पर ध्यान दे रहे हैं। यह जानकारी सामान्य जागरूकता के लिए है, व्यक्तिगत स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के लिए हमेशा बाल रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।

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