Digital Vision Pharma FIR: हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिला के काला अंब की दवा निर्माता कंपनी डिजिटल विजन एक बार फिर कानूनी विवादों में घिर गई है। कभी जहरीले कफ सिरप से बच्चों की मौत का मामला, कभी नशीली दवाओं के अवैध कारोबार की जांच और अब एक पंजीकृत दवा ब्रांड के कथित अनधिकृत इस्तेमाल को लेकर एफआईआर। सवाल यह है कि गंभीर विवादों और जांच एजेंसियों की कार्रवाई के बावजूद दवा उद्योग में ऐसी कंपनियों के कामकाज और निगरानी को लेकर व्यवस्था कितनी जवाबदेह है?
ताजा मामला मेडिस्किन लाइट (MEDISKIN LITE®) ट्रेडमार्क से जुड़ा है। इस ब्रांड के कथित अनधिकृत इस्तेमाल को लेकर पुलिस थाना काला अंब में डिजिटल विजन के खिलाफ एफआईआर नंबर 111/2026 दर्ज की गई है। शिकायतकर्ता रणवीर सिंह की शिकायत पर 18 अगस्त 2026 को दर्ज इस मामले में ट्रेडमार्क एक्ट 1999 की धारा 29, 103 और 104 लगाई गई हैं।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि मेडिस्किन लाइट नामक पंजीकृत ट्रेडमार्क का इस्तेमाल बिना वैधानिक अनुमति के किया जा रहा है। शिकायत के साथ दस्तावेज, फोटोग्राफ, व्हाट्सऐप संवाद और अन्य साक्ष्य भी पुलिस को सौंपे गए हैं। यानी अब विवाद केवल किसी ब्रांड के नाम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी जांच का विषय है कि दवा का निर्माण और विपणन किसके वैधानिक अधिकारों के तहत किया जा रहा था।
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सिरमौर ने 26 सितंबर 2026 को ट्रेडमार्क रजिस्ट्री, नई दिल्ली को पत्र भेजकर आधिकारिक जानकारी मांगी है। इसमें मेडिस्किन लाइट के रजिस्ट्रेशन नंबर, पंजीकरण की तारीख, क्लास और वर्तमान स्थिति के अलावा डिजिटल विजन की आवेदन संख्या 7845665 की भी जानकारी मांगी गई है।
पुलिस ने यह भी पूछा है कि क्या कंपनी को इस ब्रांड के इस्तेमाल, दवा निर्माण अथवा विपणन का कोई वैधानिक अधिकार प्राप्त है। शिकायतकर्ता की ओर से मेडिरैन मेडिकेयर के पास वर्ष 2018 से इस ट्रेडमार्क का पंजीकरण होने का दावा किया गया है। हालांकि, इस संबंध में अंतिम स्थिति ट्रेडमार्क रजिस्ट्री के आधिकारिक जवाब से ही स्पष्ट होगी।
लेकिन डिजिटल विजन का नाम पहली बार किसी विवाद में नहीं आया है। इस कंपनी का पिछला रिकॉर्ड और भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
वर्ष 2019-20 में जम्मू-कश्मीर के उधमपुर जिले के रामनगर क्षेत्र में बच्चों को दिए गए कोल्डबेस्ट-पीसी (Coldbest-PC) कफ सिरप के सेवन के बाद 12 मासूम बच्चों की मौत हुई थी। जांच में सिरप के एक बैच में जानलेवा रासायनिक पदार्थ डायएथिलीन ग्लाइकोल (डीईजी) की मौजूदगी सामने आई थी। इस सिरप का निर्माण भी काला अंब स्थित डिजिटल विजन ने किया था।
इस मामले में कंपनी के संचालकों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज हुआ। दिसंबर 2022 में उधमपुर पुलिस ने कंपनी के मालिकों सहित पांच आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र भी दाखिल किया था। इस त्रासदी में कई बच्चे स्थायी रूप से दिव्यांग भी हुए। यह मामला आज भी दवा निर्माण की गुणवत्ता और नियामक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
इतना ही नहीं, नवंबर 2025 में डिजिटल विजन के संचालकों के खिलाफ कथित तौर पर करीब 600 करोड़ रुपये के नशीली दवाओं के अवैध डायवर्जन नेटवर्क की जांच में एनसीबी ने गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी किए थे। एनसीबी की जांच में ट्रामाडोल जैसी साइकोट्रॉपिक दवाओं और कोडीन युक्त कफ सिरप की बड़े पैमाने पर कथित अवैध सप्लाई का मामला सामने आया था। जांच एजेंसी ने अलग-अलग स्थानों से भारी मात्रा में नशीली दवाएं और कच्चा माल भी जब्त किया था।
दूसरी तरफ, इसी विस्तारित कारोबारी परिवार से जुड़ी एक अलग इकाई ओरिसन फार्मा इंटरनेशनल भी पहले ट्रामाडोल के कथित अवैध डायवर्जन को लेकर कार्रवाई का सामना कर चुकी है। वर्ष 2021 में पुलिस ने कंपनी से करीब 35 लाख ट्रामाडोल टैबलेट और दो क्विंटल ट्रामाडोल पाउडर जब्त किया था। इस मामले में एनडीपीएस एक्ट सहित अन्य धाराओं के तहत कार्रवाई हुई थी। इसके अतिरिक्त कंपनी के नाम पर दवाओं के गुणवत्ता परीक्षण में विफल रहने से जुड़े मामले भी सामने आए हैं। जुलाई 2026 के सीडीएससीओ ड्रग अलर्ट में इसकी निर्मित एक दवा का सैंपल गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं उतरा था।
यहां सबसे बड़ा सवाल केवल एक एफआईआर या एक कंपनी का नहीं है। सवाल यह है कि दवा निर्माण जैसे संवेदनशील उद्योग में बार-बार गंभीर विवाद सामने आने के बाद भी निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है? क्या दवा निर्माण की अनुमति, उत्पादों के लाइसेंस, ब्रांड अधिकारों और नशीले तत्वों वाली दवाओं की सप्लाई चेन की नियमित समीक्षा होती है? आखिर ऐसी चूक या कथित अनियमितताओं के लिए जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था कितनी मजबूत है?
एक तरफ दवाओं को जीवन बचाने का माध्यम माना जाता है, वहीं दूसरी तरफ दवा निर्माण और नशीले पदार्थों के कथित अवैध कारोबार से जुड़े मामले सामने आना बेहद चिंताजनक है। बच्चों की मौत से जुड़े पुराने मामले से लेकर अब ट्रेडमार्क विवाद तक घटनाओं की यह श्रृंखला नियामक एजेंसियों की जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े करती है।
फिलहाल मेडिस्किन लाइट ट्रेडमार्क मामले में एफआईआर दर्ज है और पुलिस जांच कर रही है। ट्रेडमार्क रजिस्ट्री के जवाब तथा जांच के निष्कर्षों से ही यह स्पष्ट होगा कि ब्रांड का इस्तेमाल वैधानिक था या नहीं। एफआईआर में दर्ज आरोप अभी सिद्ध नहीं हुए हैं।


















