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Himachal Entry Tax Dispute: क्या गैर-हिमाचली वाहनों से वसूली अब अवैध? AAP विधायक के कानूनी दांव ने बढ़ाई सरगर्मी

रूपनगर MLA दिनेश चड्ढा ने हिमाचल सरकार को भेजा कानूनी नोटिस; नेशनल हाईवे पर वसूले जा रहे टोल को असंवैधानिक बताते हुए तुरंत बैरियर हटाने की मांग की। SC के 2026 के हालिया फैसले का हवाला देते हुए केंद्र और राज्य के बीच विधायी शक्तियों पर खड़े किए गंभीर सवाल.
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Himachal Entry Tax Dispute: हिमाचल प्रदेश एंट्री टैक्स विवाद अब पंजाब और हिमाचल प्रदेश के बीच अंतर-राज्यीय कानूनी टकराव अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। रूपनगर से आम आदमी पार्टी (AAP) विधायक दिनेश चड्ढा ने हिमाचल प्रदेश सरकार को एक औपचारिक कानूनी नोटिस जारी कर नेशनल हाईवे पर बाहरी राज्यों के वाहनों से वसूले जा रहे टोल को चुनौती दी है।

यह नोटिस हिमाचल प्रदेश के मुख्य सचिव के साथ-साथ केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) को भी भेजा गया है। चड्ढा ने मांग की है कि हिमाचल प्रदेश टोल एक्ट, 1975 और राज्य की 2026-27 की टोल नीति के तहत संचालित किए जा रहे इन बैरियरों को तत्काल प्रभाव से हटाया जाए।

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संवैधानिक शक्तियों का उल्लंघन
विधायक दिनेश चड्ढा ने अपने कानूनी तर्क में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 246 का हवाला दिया है। उनके अनुसार, नेशनल हाईवे का क्षेत्राधिकार पूर्णतः केंद्र सरकार के अधीन आता है। ऐसे में किसी भी राज्य सरकार द्वारा इन राजमार्गों पर टोल वसूलना संसद के अनन्य विधायी डोमेन का अतिक्रमण है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का आधार
नोटिस में न्यायिक मिसालों को आधार बनाते हुए मार्च 2026 के उस ऐतिहासिक फैसले का जिक्र किया गया है, जिसमें मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय को उच्चतम न्यायालय ने बरकरार रखा था। इस फैसले में स्पष्ट किया गया था कि नेशनल हाईवे पर केवल केंद्र सरकार को ही टोल लगाने का अधिकार है। चड्ढा का आरोप है कि हिमाचल सरकार स्थापित कानून की अवहेलना कर लगातार वसूली जारी रखे हुए है।

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भेदभावपूर्ण टैक्स का आरोप
इस विवाद का एक अन्य मुख्य बिंदु वाहनों के साथ हो रहा कथित भेदभाव है। नोटिस में दावा किया गया है कि हिमाचल में पंजीकृत वाहनों को इन करों से छूट दी गई है, जबकि पंजाब सहित अन्य राज्यों के वाहनों पर वित्तीय बोझ डाला जा रहा है।

चड्ढा ने तर्क दिया कि यह वर्गीकरण अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है, क्योंकि इसके पीछे कोई उचित तर्क या आधार मौजूद नहीं है। इस कानूनी नोटिस के बाद अब गेंद हिमाचल सरकार और केंद्र के पाले में है, जिससे आने वाले दिनों में पर्यटन और परिवहन क्षेत्रों पर बड़ा असर पड़ने की संभावना है।

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