RLA Bilaspur Scam: अंतरराज्यीय फर्जी वाहन पंजीकरण और चोरी की लग्जरी गाड़ियों के नेटवर्क से जुड़े आरएलए बिलासपुर फर्जीवाड़े में जांच तेज हो गई है। इस मामले की कड़ियों को खंगालने के लिए दिल्ली क्राइम ब्रांच की टीम बिलासपुर पहुंच चुकी है। टीम ने अपनी जांच को आगे बढ़ाते हुए इस रैकेट के तहत ब्लैक लिस्ट की गई गाड़ियों को अपने कब्जे में लेना शुरू कर दिया है।
दूसरी ओर, कानूनी कार्रवाई के तहत क्राइम ब्रांच ने इस पूरे फर्जीवाड़े के मास्टरमाइंड गौरव को अपनी कस्टडी में ले लिया है। अदालत ने आरोपी गौरव को 19 मई तक पुलिस रिमांड पर भेज दिया है। बता दें कि जांच एजेंसियों को इस पूरे अंतरराज्यीय नेटवर्क में 1000 से ज्यादा लग्जरी गाड़ियों के गोलमाल होने का गहरा शक है, जिसकी गहनता से तफ्तीश की जा रही है।
जानकारी के मुताबिक अब तक की जांच में कई चौंकाने वाले आधिकारिक आंकड़े सामने आए हैं। इस फर्जीवाड़े में अब तक 44 गाड़ियों के फर्जी रजिस्ट्रेशन सीधे तौर पर एक अन्य आरोपी सुभाष से जुड़े पाए गए हैं। इसके अतिरिक्त, रिमांड पर लिए गए मुख्य आरोपी गौरव के नाम पर भी 45 गाड़ियों का संदिग्ध रिकॉर्ड सामने आया है। क्राइम ब्रांच की टीम अब इस बात का पता लगाने में जुटी है कि ये सभी ब्लैक लिस्टेड वाहन किन-किन माध्यमों से बाजार तक पहुंचे।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, क्राइम ब्रांच की टीम उन कार डीलरों, बिचौलियों और वाहन खरीदने वाले लोगों से भी पूछताछ कर रही है, जिनके माध्यम से ये गाड़ियां आम ग्राहकों तक पहुंचाई गईं। टीम का मुख्य फोकस पुख्ता साक्ष्य जुटाने और इस पूरे नेटवर्क के हर लिंक को आपस में जोड़ने पर है। कई ऐसे बाहरी नाम भी अब जांच एजेंसियों के रडार पर हैं, जो सीधे तौर पर विभाग से जुड़े नहीं थे, लेकिन वाहनों की खरीद-फरोख्त और जाली दस्तावेजी प्रक्रिया में बेहद सक्रिय भूमिका निभा रहे थे।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक क्राइम ब्रांच के एक उच्च अधिकारी ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल जांच टीम की सर्वोच्च प्राथमिकता उन सभी गाड़ियों को इकट्ठा करना और जब्त करना है, जिन्हें परिवहन विभाग द्वारा ब्लैकलिस्ट किया गया है या जिनका पंजीकरण धोखाधड़ी के जरिए अवैध तरीके से कराया गया था। इसके लिए बिलासपुर आरएलए कार्यालय के कंप्यूटर सिस्टम, एक्सेस लॉग, डिजिटल रिकॉर्ड और विभागीय लॉगिन गतिविधियों की बारीकी से फोरेंसिक और तकनीकी जांच की जा रही है।
उल्लेखनीय है कि इस पूरे नेटवर्क का भंडाफोड़ करने में बिलासपुर आरएलए से पंजीकृत दो फॉर्च्यूनर और अन्य एसयूवी गाड़ियां सबसे अहम सुराग बनकर सामने आई थीं। इस शातिर गिरोह ने इन गाड़ियों को पूरी तरह वैध और असली बताकर दिल्ली के ग्राहकों को ऊंचे दामों पर बेचा था। बाद में जब मामले की जांच शुरू हुई, तब जाकर यह खुलासा हुआ कि इन सभी वाहनों का पंजीकरण पूरी तरह से जाली दस्तावेजों और फर्जी डिजिटल एंट्री के आधार पर किया गया था।
इस बड़े खुलासे के बाद प्रदेश स्तर पर गठित की गई जांच समितियों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठने लगे हैं। प्रदेश स्तरीय जांच कमेटियां साढ़े चार महीने का लंबा समय बीत जाने के बाद भी अपनी अंतिम रिपोर्ट पेश नहीं कर सकी हैं, इससे बड़ा सवाल यह है कि इतने बड़े अंतरराज्यीय फर्जीवाड़े के बावजूद अब तक किसी बड़े अधिकारी या प्रभावशाली व्यक्ति तक जांच की आंच नहीं पहुंच पाई है। जिससे जांच की गंभीरता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। अब तक केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर ही कार्रवाई होती दिख रही है, जबकि पूरे नेटवर्क को संचालित करने वाले मुख्य सरगना अभी भी दूर हैं।

















