Himachal High Court News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने नशीले पदार्थों की तस्करी से जुड़े मामले में सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने एनडीपीएस एक्ट के तहत दोषी ठहराए गए दो पुलिस कांस्टेबलों की सेवा से बर्खास्तगी को पूरी तरह से बरकरार रखा है। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस अजय मोहन गोयल की एकल पीठ ने टिप्पणी की है कि पुलिसकर्मियों की ऐसे गंभीर अपराधों में संलिप्तता एक अत्यंत चिंताजनक विषय है।
अदालत ने साफ कहा कि इस तरह के गंभीर मामले में विभागीय बर्खास्तगी की सजा न तो अत्यधिक कठोर है और न ही अनुचित या असंगत है। जस्टिस अजय मोहन गोयल ने सुनवाई के दौरान बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि दोषी दोनों व्यक्ति पुलिस विभाग के जिम्मेदार कर्मचारी रहे हैं।

ऐसे में जब कानून को लागू करने वाली एजेंसी के कर्मी ही खुद अपराध करने लगें, तो यह स्थिति “कानून के रक्षकों के ही कानून तोड़ने वाले बनने” जैसी हो जाती है। कोर्ट के अनुसार, समाज में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों से इस प्रकार के आचरण की बिल्कुल भी अपेक्षा नहीं की जा सकती। दरअसल, यह पूरा कानूनी मामला कांस्टेबल गौरव वर्मा और कांस्टेबल लक्ष्य चौहान की सेवामुक्ति और विभागीय कार्रवाई से जुड़ा हुआ है।
रिकॉर्ड के अनुसार, गौरव वर्मा को वर्ष 2009 में पुलिस विभाग में बतौर कांस्टेबल नियुक्त किया गया था। बाद में उसे एनडीपीएस एक्ट की धारा 20 के तहत दोषी ठहराया गया। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, उसके कब्जे से कथित तौर पर 1003 ग्राम (1 किलो से अधिक) चरस बरामद हुई थी। इस मामले में सुनवाई पूरी होने के पश्चात उसे तीन वर्ष के कारावास और ₹25,000 के जुर्माने की सजा सुनाई गई थी।
वहीं दूसरे मामले में, लक्ष्य चौहान को वर्ष 2015 में खेल कोटा (Sports Quota) के तहत पुलिस कांस्टेबल के पद पर नियुक्ति मिली थी। उसके खिलाफ वर्ष 2019 में एक प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई थी, जिसके बाद जांच पूरी होने पर उसे एनडीपीएस एक्ट की धारा 21, 25 और 29 के तहत दोषी करार दिया गया था। आपराधिक अदालत से दोषसिद्धि मिलने के बाद राज्य पुलिस महानिदेशक (DGP) द्वारा दोनों पुलिसकर्मियों को सेवा से बर्खास्त करने का विभागीय आदेश जारी किया गया था।
दोनों पूर्व कांस्टेबलों ने अपने बर्खास्तगी के आदेशों को चुनौती देते हुए हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में अलग-अलग रिट याचिकाएं दायर की थीं। याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने तर्क दिया था कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 311(2)(a) के तहत अनिवार्य विभागीय जांच चलाए बिना सीधे बर्खास्तगी कर दी गई, जो नियमों के खिलाफ है। इसके अलावा, याचिकाओं में यह दलील भी दी गई कि पुलिस महानिदेशक के पास बिना जांच के सीधे इस तरह की कठोर सजा देने का कानूनी अधिकार नहीं था।
याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने संविधान और पुलिस नियमों की व्याख्या की। अदालत ने स्पष्ट किया कि पंजाब पुलिस नियमों के नियम 16.1 के प्रावधानों के अनुसार, उच्च रैंक का सक्षम अधिकारी किसी भी कांस्टेबल को बर्खास्त करने का अधिकार रखता है। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल आपराधिक अदालत से दोषसिद्धि हो जाने मात्र से स्वतः बर्खास्तगी लागू होना जरूरी नहीं है, बल्कि सक्षम प्राधिकारी को अपराध की प्रकृति, उसकी गंभीरता और दोषी के आचरण का निष्पक्ष आकलन करते हुए उचित सजा तय करनी होती है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पाया कि डीजीपी ने दोनों मामलों में एनडीपीएस अपराधों की प्रकृति, उनकी गंभीरता और अदालत द्वारा दी गई दोषसिद्धि को ध्यान में रखते हुए ही बर्खास्तगी का अंतिम आदेश पारित किया था। इसके अलावा, अदालत ने एक अन्य महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु को स्पष्ट करते हुए कहा कि आपराधिक अपील लंबित रहने के दौरान यदि ऊपरी अदालत द्वारा सजा का निलंबन कर दिया जाता है, तो भी जब तक दोषसिद्धि कायम है, तब तक संविधान के अनुच्छेद 311(2)(a) के तहत विभागीय कार्रवाई पर कोई कानूनी रोक नहीं लगती। अंततः अदालत ने दोनों आदेशों में कोई त्रुटि न पाते हुए याचिकाओं को खारिज कर दिया।


















