Himachal High Court POCSO Case: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पोक्सो (POCSO) कानून से जुड़े एक गंभीर मामले की सुनवाई करते हुए राज्य पुलिस की जांच प्रक्रिया में पाई गई गंभीर लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने पाया कि जांच अधिकारियों द्वारा पीड़िता या विधि का उल्लंघन करने वाले किशोर की आयु प्रमाण से संबंधित आवश्यक दस्तावेज और दसवीं का प्रमाणपत्र एकत्र न करने के कारण अभियोजन पक्ष के कई मामले अदालत में कमजोर होकर खारिज हो जाते हैं।
इस प्रशासनिक व प्रक्रियात्मक खामी को देखते हुए हाईकोर्ट ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को तत्काल दिशा-निर्देश जारी करने के आदेश दिए हैं। न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति भूपेश शर्मा की खंडपीठ ने इस विषय पर गहरी चिंता व्यक्त की। पीठ ने कहा कि कई आपराधिक अपीलों और पुनरीक्षण याचिकाओं की सुनवाई के दौरान यह देखा गया है कि जांच में रहने वाली कमियों, विशेषकर उम्र साबित करने वाले पुख्ता सबूत न जुटाने की वजह से पीड़िता या आरोपी की सही आयु तय नहीं हो पाती और मुकदमों में अभियोजन का पक्ष विफल हो जाता है।
अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 432 के तहत राज्य सरकार द्वारा दायर अतिरिक्त साक्ष्य से संबंधित एक आवेदन पर सुनवाई के दौरान ये निर्देश दिए। यह मामला सत्र न्यायालय द्वारा आरोपी को दी गई 20 वर्ष की सश्रम कारावास की सजा के खिलाफ लंबित अपील से जुड़ा है। इसमें आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 354ए, 354डी, 376, 506 और पोक्सो अधिनियम की धारा 4(2) के तहत दोषी ठहराया गया था।
मामले के विवरण के अनुसार, निचली अदालत में सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने पीड़िता की उम्र साबित करने के लिए केवल पंचायत रजिस्टर और स्थानीय रजिस्ट्रार द्वारा जारी जन्म प्रमाणपत्र पर भरोसा किया था। हालांकि, अपील की तैयारी के दौरान राज्य सरकार ने पाया कि पीड़िता का दसवीं का प्रमाणपत्र और स्कूल रिकॉर्ड जांच के समय एकत्र ही नहीं किया गया था, और न ही संबंधित स्कूल के रिकॉर्ड कस्टोडियन को गवाह के रूप में नामित किया गया था। इस पर राज्य ने अतिरिक्त साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति मांगी थी, जिसका बचाव पक्ष ने विरोध किया था।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि न्याय के हित में और सत्य तक पहुंचने के लिए आवश्यक साक्ष्य जुटाना अदालतों का कर्तव्य है। यदि जांच एजेंसी की अज्ञानता या लापरवाही के कारण कोई महत्वपूर्ण दस्तावेज छूट जाता है, तो उसे सुधारना न्याय के सिद्धांत के खिलाफ नहीं है। अदालत ने माना कि स्कूल रिकॉर्ड और मैट्रिक प्रमाणपत्र आयु निर्धारण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं।
अदालत ने डीजीपी हिमाचल प्रदेश को निर्देश दिया कि वे 15 अक्टूबर 2026 तक राज्य के सभी जांच अधिकारियों को किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 94 के प्रावधानों का सख्ती से पालन करने के निर्देश जारी करें। इसके साथ ही, अधिकारियों को निर्देश दिया जाए कि वे न केवल प्राथमिकता वाले दस्तावेज जैसे स्कूल या मैट्रिक प्रमाणपत्र, नगर निगम या पंचायत से जारी जन्म प्रमाणपत्र एकत्र करें, बल्कि यदि ये उपलब्ध न हों या संदिग्ध हों, तो समिति या अदालत की अनुमति से ऑसिफिकेशन टेस्ट का सहारा लें।
हाईकोर्ट ने राज्य के आवेदन को स्वीकार करते हुए पीड़िता और स्कूल रिकॉर्ड अधिकारियों के पुनः परीक्षण की अनुमति प्रदान कर दी है। इस मामले की आगे की कार्यवाही के लिए 28 सितंबर 2026 को रजिस्ट्रार (न्यायिक) के समक्ष सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया है।


















