Khushwant Singh Lit Fest 2026: ऐतिहासिक कसौली क्लब में आयोजित 15वें खुशवंत सिंह लिट फेस्ट के अंतिम दिन भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल कृष्णास्वामी सुंदरजी की जीवनी पर एक विशेष सत्र आयोजित हुआ। जनरल सुंदरजी 1 फरवरी 1986 से 31 मई 1988 तक थल सेनाध्यक्ष रहे और उन्हें सेना के प्रमुख व दूरदर्शी नेतृत्वकर्ताओं में गिना जाता है। उनकी जीवनी पर लिखी पुस्तक के लेखक प्रोबल दासगुप्ता ने इस चर्चा के दौरान 1980 के दशक की कई प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं पर महत्वपूर्ण खुलासे किए।
“भिंडरावाले को कांग्रेस ने खड़ा किया”
प्रोबल दासगुप्ता ने दावा किया कि सत्तर के दशक के अंत में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी की कोशिशों के बीच ज्ञानी ज़ैल सिंह और संजय गांधी पंजाब में एक नया नेता खड़ा करना चाहते थे। इसके लिए मोगा के नौजवान जरनैल सिंह भिंडरावाले को आगे बढ़ाया गया। उन्होंने कहा कि उनके पास चंडीगढ़ के एक होटल की वे रसीदें मौजूद हैं, जहाँ भिंडरावाले की ख़ातिरदारी की गई थी। उनके अनुसार, भिंडरावाले आगे चलकर कांग्रेस सरकार के लिए “फ्रेंकेनस्टाइन का राक्षस” बन गया, जिसकी कल्पना सरकार ने कभी नहीं की थी। उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार को “सैन्य कार्रवाई से अधिक एक राजनीतिक विफलता” करार दिया।

ऑपरेशन ब्लू स्टार में प्रशासन हुआ ध्वस्त, कार्रवाई की ज़िम्मेदारी सेना पर आई
प्रोबल दासगुप्ता ने बताया कि वर्ष 1983 में पंजाब के डीआईजी अवतार सिंह अटवाल की गोल्डन टेंपल की सीढ़ियों पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी और छह घंटे तक उनका शव वहाँ से हटाया नहीं जा सका था। यह घटना उस समय प्रशासन के पूरी तरह ध्वस्त होने को दर्शाती है। महीनों तक परिसर के भीतर हथियार और उग्रवादी जमा होते रहे, जिसे उन्होंने एक बड़ी खुफिया विफलता बताया। उनके मुताबिक पुलिस, खुफिया एजेंसियां, सेना और सरकार “एक ही रुख पर नहीं” थे और कोई ‘संपूर्ण-राष्ट्र दृष्टिकोण’ नहीं था। अंततः कार्रवाई की पूरी ज़िम्मेदारी सेना के कंधों पर आ गई।
उन्होंने खुलासा किया कि उस सेना के सामने दो विकल्प थे, परिसर की घेराबंदी करना या सीधी कार्रवाई करना। घेराबंदी की स्थिति में खालिस्तान की घोषणा होने और समर्थकों के अमृतसर कूच करने की आशंका थी। प्रबल ने जनरल सुंदरजी को इस बात के लिए उत्तरदायी ठहराया कि उन्होंने सैन्य प्रोटोकॉल लांघा था। तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल वैद्य के स्थान पर उन्होंने इंदिरा गांधी से सीधे बातचीत कर कार्रवाई का मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने भारी गोलाबारी को भी एक ऐसा कारण माना, जिसने देश के सामाजिक ताने-बाने पर “गहरा घाव” छोड़ा। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि खुशवंत सिंह ने सुंदरजी से ब्लू स्टार पर अपना पक्ष लिखने का आग्रह किया था, लेकिन सेवानिवृत्ति के कुछ वर्षों बाद ही उनका निधन हो गया।
बोफोर्स “तोप सही थी, सौदा गलत था”
प्रोबल दासगुप्ता ने बताया कि 1981 में चार तोपों का चयन किया गया था, ऑस्ट्रियाई, फ्रांसीसी सोफ़्मा, बोफोर्स और ब्रिटिश। ऑस्ट्रियाई तोप का बैरल फट गया था और फ्रांसीसी तोप इसलिए दौड़ से बाहर हो गई क्योंकि अमेरिका पाकिस्तान को ‘गन-लोकेटिंग रडार’ दे रहा था। उनके अनुसार बोफोर्स कोई कमतर तोप नहीं थी। सुंदरजी का स्पष्ट मत था कि “तोप सही थी, लेकिन सौदा गलत था”। उन्होंने रक्षा सचिव एस.के. भटनागर को नोट भेजकर प्रधानमंत्री से यह कहने को कहा था कि बोफोर्स कंपनी से पूछा जाए कि उसने किसे रिश्वत दी। हालाँकि, सरकार ने नाम उजागर नहीं किए और राजीव गांधी सरकार में रक्षा राज्य मंत्री अरुण सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। प्रोबल दासगुप्ता ने जनरल सुंदरजी को पूरे मामले में “बेदाग” बताया, हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि सौदे से जुड़े कुछ लोगों ने उनके निर्णयों की आलोचना की थी।
ब्रासटैक्स “पाकिस्तान को रोकने का आखिरी मौका”
ऑपरेशन ब्रासटैक्स को उन्होंने नाटो (NATO) के युद्धभ्यास से चार गुना बड़ा बताया, जिसमें लगभग पाँच लाख सैनिक शामिल थे। उनके अनुसार, राजस्थान के रेगिस्तान से होकर पाकिस्तान के कहूटा परमाणु संयंत्र तक पहुँचने का विचार भी शामिल था। उन्होंने कहा कि भारत ने पाकिस्तान को परमाणु शक्ति बनने से रोकने का “आखिरी मौका” शायद यहीं गंवा दिया था। साथ ही उन्होंने यह स्पष्ट किया कि पाकिस्तान में सीधे घुसने की कोई औपचारिक योजना नहीं थी, यह एक ऐसी व्याख्या थी कि पाकिस्तान को पहला कदम उठाने के लिए उकसाया जा सकता था।
श्रीलंका और आईपीकेएफ के मुद्दे “सभी पक्षों ने लिए गलत फैसले”
श्रीलंका और आईपीकेएफ (IPKF) के मुद्दे पर प्रोबल ने जनरल सुंदरजी की “कड़ी आलोचना” की। उनके मुताबिक प्रधानमंत्री, सैन्य प्रमुख और हर हितधारक ने गलत निर्णय लिए। तमिल, सिंहली और भारत के अलग-अलग सरकारी अंग सभी भिन्न-भिन्न धरातल पर काम कर रहे थे। उन्होंने बताया कि प्रभाकरन को भारत लाया गया था और राजीव गांधी से उसकी मुलाकात करवाई गई थी। दिल्ली से लौटते समय राजीव गांधी ने उसे बुलेटप्रूफ जैकेट उपहार में दी थी, और चार साल बाद प्रभाकरन के आदेश पर ही उनकी हत्या कर दी गई। शायद यह वह गतल फैसला था जिसकी वजह से देश ने अपना एक प्रधानमंत्री खो दिया।
स्रोत और जातिगत व्यवस्था पर विचार
सुंदरजी की युवावस्था की डायरी, उनकी भतीजी अरुणा रॉय, और उनके साथ सेवा दे चुके राजनयिकों, जनरलों व वरिष्ठ पत्रकारों से हुई बातचीत को प्रोबल ने अपनी पुस्तक का मुख्य स्रोत बताया। उनका उद्देश्य इस पुस्तक को सैन्य छावनियों से बाहर निकालकर आम पाठकों तक पहुँचाना था। रेजिमेंटों में जातिगत गतिशीलता के सवाल पर उन्होंने कहा कि भारतीय सेना की रेजिमेंटें परंपरा और युद्ध-भावना के आधार पर गठित की गई हैं, और ब्रिगेड या सेना के स्तर पर सभी एकीकृत होकर कार्य करती हैं।



















