Manav Bharti Fake Degree Scam: हिमाचल प्रदेश के बहुचर्चित मानव भारती फर्जी डिग्री घोटाले को लेकर राज्य की कानून-व्यवस्था और पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न उठने लगे हैं। शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े इस संगठित अपराध में दो वर्षों से भी अधिक समय तक पुलिस विभाग द्वारा संस्थागत संरक्षण दिए जाने के गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं। बता दें कि हजारों युवाओं के भविष्य और करियर से जुड़े इस बहु-करोड़ रुपये के घोटाले में जांच को रोके रखने के पीछे वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका पर अब निष्पक्ष जांच की मांग जोर पकड़ रही है।
उल्लेखनीय है कि शिकायत मिलने के बावजूद समय रहते इस तरह के व्यापक आपराधिक तंत्र को क्यों नहीं रोका गया, यह सवाल अब पुलिस महकमे की जवाबदेही पर सीधे तौर पर खड़ा हो चुका है। पुलिस विभाग की इस संदिग्ध निष्क्रियता और ढुलमुल रवैये के कारण पूरी व्यवस्था पर जनविश्वास संकट में पड़ता दिखाई दे रहा है। इस आपराधिक मामले में सबसे बड़ा संशय जांच एजेंसी सीआईडी की भूमिका को लेकर है।

बता दें कि वर्ष 2017 में ही इस फर्जी डिग्री मामले से संबंधित शिकायत प्राप्त हो चुकी थी। इसके बावजूद लगभग दो वर्षों तक इस मामले में कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई और शिकायत की फाइलों को दबा कर रखा गया। हिमाचल प्रदेश पुलिस कांस्टेबल भर्ती पेपर लीक प्रकरण जैसे बड़े घोटालों के बाद अब मानव भारती फर्जी डिग्री घोटाले में भी पुलिस अधिकारियों की शिथिलता और भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। यह प्रश्न लगातार पूछा जा रहा है कि हजारों युवाओं के करियर और भविष्य से जुड़े इतने संवेदनशील मामले में सीआईडी दो वर्षों तक पूरी तरह निष्क्रिय क्यों बनी रही।
इस पूरे प्रकरण के कारण हिमाचल पुलिस विभाग की छवि धूमिल हो रही है और उंगलियां पुलिस महानिदेशक के पद तक उठ रही हैं। जैसा कि पूर्व भाजपा सरकार में मंत्री विक्रम सिंह ठाकुर ने एक पत्रकार वार्ता में सवाल उठाये हैं। उन्होंने भी वर्तमान कार्यवाहक डीजीपी से इस बारे में स्पष्टीकरण माँगा है, क्योंकि वह उस समय एडीजी थे और CID कि कमान उन्ही के पास थी। ऐसी स्थिति में यह आवश्यक हो गया है कि हिमाचल प्रदेश सरकार या पुलिस विभाग स्वयं आगे आकर इस पूरे मामले पर एक पारदर्शी और स्पष्ट रुख अपनाए।
मानव भारती मामले में फर्जी डिग्री मामले में दो साल तक क्यों दबी रही फाइल pic.twitter.com/Bahj4ajKJ0
— Prajasatta (@prajasattanews) August 2, 2026
इस गंभीर मामले में हाईकोर्ट के सिटिंग जज की निगरानी में एक सक्षम और स्वतंत्र जांच टीम के माध्यम से उन सभी पुलिस अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष पड़ताल की जानी चाहिए जिनकी निष्क्रियता या ढिलाई से इस कथित आपराधिक प्रकरण को लंबे समय तक संरक्षण मिलता रहा। यदि किसी भी अधिकारी द्वारा कानून के पालन में कोई चूक या लापरवाही हुई है, तो उसके विरुद्ध विधि के अनुसार तत्काल और उचित कार्रवाई की जानी अनिवार्य है।
घटनाक्रम से जुड़े कई अहम अनुत्तरित प्रश्न पुलिस विभाग से सार्वजनिक स्पष्टीकरण की मांग करते हैं। पुलिस विभाग को निम्नलिखित बिंदुओं पर स्थिति स्पष्ट करनी होगी:
- वर्ष 2017 से 2020 के बीच इस मामले की निगरानी किन वरिष्ठ सीआईडी अधिकारियों द्वारा की जा रही थी?
- वर्ष 2017 में ही शिकायत मिलने के बाद भी लगभग दो वर्षों तक एफआईआर दर्ज न किए जाने के क्या कारण थे?
- इस असाधारण विलंब के लिए किस अधिकारी की जिम्मेदारी निर्धारित की गई और उसके विरुद्ध क्या कार्रवाई हुई? यदि कार्रवाई नहीं हुई, तो उसके क्या कारण हैं?
- जब यह मामला हजारों युवाओं के भविष्य से जुड़ा था, तब सीआईडी वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी के बावजूद जवाबदेही तय करने से क्यों बचती रही?
- क्या इस विलंब के पीछे किसी प्रकार का अनुचित दबाव, बड़ा वित्तीय लेन-देन या अन्य प्रभाव था जिसके कारण जांच को रोका या धीमा किया गया?
शिक्षा के क्षेत्र में पारदर्शिता और जनविश्वास बहाल करने के लिए पुलिस विभाग को इस गंभीर विषय पर अपना पक्ष सार्वजनिक करना चाहिए और हिमाचल प्रदेश पुलिस की जवाबदेही तय होनी चाहिए। इसके साथ ही, मामले से जुड़ी सभी प्रक्रियाओं का निष्पक्ष ऑडिट व सत्यापन होना अत्यंत आवश्यक है, ताकि सत्य आम जनता के सामने आ सके और दोषियों पर नियमानुसार त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।


















