Uniform Civil Code SC Hearing: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर देश की संवैधानिक स्थिति और सर्वोच्च न्यायालय के दृष्टिकोण को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान सीजेआई ने दो-टूक शब्दों में कहा कि यूनिफॉर्म सिविल कोड हमारे संविधान का एक प्रमुख लक्ष्य है और इसे किसी भी धर्म के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।
एक नवभारत टाइम्मेंस में प्रकाशित एक खबर के मुताबीक सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को मुस्लिम महिलाओं के विरासत (Inheritance) से जुड़े अधिकारों पर एक रिट याचिका पर सुनवाई हो रही थी। इसी दौरान याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए मुख्य न्यायाधीश ने संवैधानिक भावनाओं को रेखांकित किया। बेंच ने स्पष्ट किया कि यूसीसी का उद्देश्य किसी धर्म विशेष को निशाना बनाना नहीं, बल्कि संवैधानिक लक्ष्यों की प्राप्ति है।
सुनवाई के दौरान वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि आदर्श रूप में एक ऐसी समान आचार संहिता होनी चाहिए जो सभी धर्मों के विरासत अधिकारों को नियंत्रित करे। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि मुस्लिम समुदाय के भीतर एक आशंका व्याप्त है कि प्रस्तावित यूनिफॉर्म सिविल कोड के माध्यम से उन पर हिंदू सिविल कोड थोपा जा सकता है।
इस गंभीर चर्चा के बीच बेंच में शामिल जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने समाज की मानसिक तैयारी पर सवाल उठाए। जस्टिस बागची ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जवाब तो संविधान में ही मौजूद है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या हमारा समाज इस बदलाव के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने मौलिक कर्तव्यों (Fundamental Duties) के महत्व पर भी विशेष जोर दिया।
जस्टिस बागची ने आगे कहा कि देश में एक वैज्ञानिक, तर्कसंगत और मानवतावादी नजरिया विकसित होना अनिवार्य है, जैसा कि हमारे मौलिक कर्तव्यों में वर्णित है। इस पर प्रशांत भूषण ने चिंता जताते हुए कहा कि वर्तमान में स्थितियां विपरीत दिशा में जाती दिख रही हैं। कोर्ट ने इन दलीलों को सुनने के बाद केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर इस पूरे मामले पर जवाब तलब किया है।
दरअसल, यह मामला आर्टिकल 32 के तहत दायर एक रिट याचिका से जुड़ा है, जिसे वकील पॉलोमी पावनी शुक्ला ने ‘न्याय नारी फाउंडेशन’ के साथ मिलकर दाखिल किया है। याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ को मुस्लिम महिलाओं के विरासत अधिकारों के मामले में भेदभावपूर्ण बताया गया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि वर्तमान व्यवस्था महिलाओं के समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है।
इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच कर रही है। गौरतलब है कि मार्च में भी इसी मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने अपनी राय स्पष्ट की थी। तब उन्होंने कहा था कि इस प्रकार के विधिक अंतरालों और भेदभाव का एकमात्र समाधान ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड’ ही है।




















