Rahul Gandhi latest allegation on BJP: कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि वह दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के उद्यमियों को बड़े सार्वजनिक अनुबंधों से व्यवस्थागत बहिष्कार कर रही है। उन्होंने दावा किया कि सरकार के पास इन समुदायों की भागीदारी संबंधी कोई आंकड़ा नहीं है।
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि उन्होंने संसद में यह मुद्दा उठाया था। उन्होंने पूछा था कि पिछले वर्ष दिए गए 16,500 करोड़ रुपये के सार्वजनिक निर्माण कार्यों के अनुबंधों में से कितने दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के स्वामित्व वाले व्यवसायों को दिए गए। गांधी ने सरकार के जवाब को “गंभीर चिंता का विषय” बताया। उन्होंने लिखा, “सरकार के पास इस संबंध में कोई डेटा नहीं है।”
कांग्रेस नेता ने मौजूदा खरीद नीति का भी जिक्र किया। नीति के अनुसार सार्वजनिक खरीद का 25 प्रतिशत सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) से किया जाना है, जिसमें से चार प्रतिशत दलित और आदिवासी उद्यमियों के लिए आरक्षित है। लेकिन उन्होंने आरोप लगाया कि बड़े सार्वजनिक निर्माण कार्यों के अनुबंधों में यह प्रावधान अनिवार्य नहीं माना जाता। उन्होंने कहा, “जब सबसे बड़े और सबसे लाभदायक अनुबंधों की बात आती है – सार्वजनिक निर्माण कार्य – तो सरकार कहती है कि यह ‘अनिवार्य’ नहीं है।”
राहुल गांधी ने इसे केवल प्रशासनिक कमी नहीं बताते हुए कहा कि यह मोदी सरकार की नीतियों के माध्यम से जानबूझकर बनाया गया बहिष्कार का सिस्टम है, जो सामाजिक और आर्थिक न्याय को कमजोर करता है। उन्होंने पूछा, “बहुजन उद्यमियों को देश के सबसे बड़े सार्वजनिक अनुबंधों से बाहर क्यों रखा जा रहा है?”
यह मुद्दा सकारात्मक कार्रवाई और आर्थिक नीति में समावेशिता को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के बीच सामने आया है। सार्वजनिक खरीद को पिछड़े समुदायों में उद्यमिता को बढ़ावा देने का प्रमुख माध्यम माना जाता है। हालांकि आलोचक कहते हैं कि क्रियान्वयन में कमी और पारदर्शिता की कमी के कारण इच्छित लाभ सीमित रह जाते हैं। विपक्षी दलों द्वारा सार्वजनिक खर्च में जवाबदेही और डेटा प्रकटीकरण की मांग को लेकर यह मुद्दा आगे भी विवाद का विषय बना रहने की संभावना है।





















