DSP Vijay Raghuvanshi Case: हिमाचल प्रदेश पुलिस विभाग में तैनात डीएसपी विजय रघुवंशी के साथ हुए कथित संस्थागत उत्पीड़न, जातिगत भेदभाव और फर्जी दस्तावेज या संचार तैयार करने के मामले में पुलिस महानिदेशक अशोक तिवारी और तत्कालीन पुलिस अधीक्षक शिमला गौरव सिंह की मुश्किलें लगातार बढ़ती नजर आ रही हैं। राज्य पुलिस बल का सर्वोच्च पद संभालने वाले अधिकारी पर लगे इन गंभीर आरोपों ने पूरे प्रशासनिक तंत्र में पिछले काफी समय से हलचल मचा रखी है।
बता दें कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग द्वारा मामले पर लिए गए कड़े संज्ञान और राज्य सरकार द्वारा गठित चिकित्सा बोर्ड की रिपोर्ट के बाद पुलिस प्रशासन के शीर्ष अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस उच्चस्तरीय प्रकरण में अब आने वाले समय में कानूनी शिकंजा कसता हुआ दिखाई दे रहा है।
चिकित्सा बोर्ड ने प्रमाणित कीं रीढ़ की हड्डी की चोटें
उल्लेखनीय है कि हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा गठित एक उच्चस्तरीय चिकित्सा बोर्ड ने गहन जांच के बाद उप पुलिस अधीक्षक विजय रघुवंशी की स्वास्थ्य संबंधी और रीढ़ की हड्डी की समस्याओं को पूरी तरह से सही और प्रामाणिक पाया है। चिकित्सीय पुष्टि के बाद यह मुख्य प्रश्न उठ खड़ा हुआ है कि जब स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पूरी तरह से वास्तविक और गंभीर थीं, तो इसके बावजूद उन्हें संस्थागत रूप से निशाना क्यों बनाया गया।
इस पूरे मामले में आरोप हैं कि वरिष्ठ अधिकारियों ने न केवल विजय रघुवंशी के प्रति कोई सहानुभूति नहीं दिखाई, बल्कि उन्हें मानसिक रूप से अपमानित और अलग-थलग करने का प्रयास किया। उप पुलिस अधीक्षक विजय रघुवंशी के वेतन से सरकारी वाहन के बदले सात सौ पचास रुपये प्रति माह की कटौती की जा रही थी, जो वेतन विवरण से स्पष्ट सिद्ध होता है। इसके बावजूद पुलिस अधीक्षक शिमला गौरव सिंह ने उनसे आधिकारिक वाहन छीन लिया और आयोग के समक्ष रिकॉर्ड में तथ्य छिपाने का प्रयास किया।
जानबूझकर कठिन तैनाती और अनुशासनहीनता के आरोप
इस मामले में समय बीतने के साथ डीएसपी विजय रघुवंशी की गंभीर चिकित्सा स्थिति के बावजूद, डीजीपी और संबंधित अधिकारियों द्वारा उन्हें जानबूझकर ऐसे कठिन कार्यों और तैनाती पर भेजा गया, जिससे उनकी शारीरिक स्थिति और अधिक बिगड़ सकती थी। उन्हें अनुशासनहीन और अवज्ञाकारी दर्शाने के लिए पुलिस अधीक्षक शिमला ने उनके खिलाफ निलंबन और विभागीय जांच की सिफारिश तक कर दी।
बता दें कि इस पूरे मामले का राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने अत्यंत गंभीरता से संज्ञान लिया है। आयोग के समक्ष महानिदेशक अशोक तिवारी और तत्कालीन पुलिस अधीक्षक गौरव सिंह के खिलाफ जांच चल रही है। हैरानी की बात यह रही कि महानिदेशक स्तर के अधिकारी, जिन पर अपने विभाग के मुद्दों को सुलझाने की नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी होती है , वह स्वयं इस जातिगत उत्पीड़न और प्रताड़ना के केंद्र बिंदु के रूप में कटघरे में खड़े हैं।
गुमराह करने वाले पत्र और आयोग का कड़ा रुख
आरोप में यह भी शामिल है कि पुलिस महानिदेशक अशोक तिवारी और उनके अधीनस्थ अधिकारियों ने राज्य सरकार को भ्रामक व मनगढ़ंत पत्र या संचार भेजे और ऐसी सिफारिशें कीं, जिससे विजय रघुवंशी की पेशेवर प्रतिष्ठा और करियर की प्रगति को गंभीर नुकसान पहुंचाया जा सके। गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव आर. डी. नज़ीम ने भी अशोक तिवारी और अन्य संबंधित अधिकारियों द्वारा विजय रघुवंशी को दी गई मानसिक व प्रशासनिक प्रताड़ना तथा उनके आचरण को लेकर गंभीर टिप्पणी की है।
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने इस पूरे मामले में शीर्ष अधिकारियों के रवैये को घोर कदाचार और मनमाना आचरण माना है। आयोग ने कड़ा रुख अपनाते हुए अधिकारियों को पंद्रह दिनों के भीतर जवाब दाखिल करने और व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के निर्देश जारी किए हैं। इसके साथ ही आयोग ने उप पुलिस अधीक्षक के स्थानांतरण, पदस्थापना तथा वाहन आवंटन और पूल की स्थिति से जुड़े सभी मूल प्रशासनिक रिकॉर्ड भी तलब किए हैं।
कानूनी व आपराधिक कार्रवाई का मंडराता खतरा
चिकित्सा बोर्ड द्वारा बीमारियों की प्रामाणिकता की पुष्टि होने के बाद, पुलिस महानिदेशक अशोक तिवारी और अन्य संबंधित अधिकारियों पर कानूनी शिकंजा कसना तय माना जा रहा है। सरकार के समक्ष गलत व गुमराह करने वाली सूचनाएं प्रस्तुत करने के लिए जहां एक ओर विभागीय कार्रवाई की तलवार लटक रही है, वहीं दूसरी ओर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की प्रासंगिक धाराओं के तहत आपराधिक मुकदमे का सामना भी करना पड़ सकता है।




















