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जीया लाल ठाकुर व सरगम कला मंच सोलन के कलाकारों ने शोधकर्ताओं के लिए इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला अनुसंधान केंद्र दिल्ली में किया विशुद्ध विरासती संस्कृति का प्रदर्शन

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नई दिल्ली।
इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला अनुसंधान केंद्र में 27,और 28 अप्रैल 2023 दिन जीया लाल ठाकुर व सरगम कला मंच सोलन के कलाकारों द्वारा शोधकर्ताओं के लिए विशुद्ध विरासती संस्कृति का प्रदर्शन किया गया। जिसमे शिव सूत्रों,छ्न्द की उत्पत्ति, छ्न्द से लय की पांच जातियों, लय की पांच जातियों से छंदों पर आधारित डंके की शैली के नौगत् तालों के छंदों, जातियों,मात्राओं,डंकों के रहस्यों को प्रमाणिकता सहित प्रदर्शित किया गया। मुंह बोली,सुनी सुनाई, मंघडन्त दंतकथाओं से बाहर निकालने के लिए नौगत तालों की पारमपरिकता में शास्त्रीय संगीत उत्पन्न करने वाले लोक संगीत को कुतप वाद्यों सहित चार ग्रहों की लोक गाथाओं के प्रदर्शन किए गए।
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देव धनाक्षरी छंद और चतुस्त्र जाती के ताल में कुतप वाद्यों सहित गायत्री मंत्र तथा महामृत्युंजय मंत्र गायन में योग प्रदर्शन किया गया।ये गहन व गंभीर वो रहस्य हैं जो हमारी विशुद्ध विरासती संस्कृति की प्रमाणिकता के सिद्धांत PHD के छात्रों के समक्ष प्रस्तुत किए गए। लय की पांच जातियों डंके की शैली से और लय की पांच जातियों पर आधारित मेंट्रॉनौम सॉफ्टवेयर के सिद्धांत पर गहनता से व्याख्यान किया गया।वर्तमान में कंप्यूटर से संगीत रिकार्डिंग के लिए जो आधुनिक सोफ्टवेयर खोजा है वो लय की पांच जातियों से विकसित है। लय की पांच जातियों छंद शास्त्र से विकसित होने के प्रत्यक्ष प्रदर्शन विशुद्ध विरासती संस्कृति की प्रमाणिकता के लिए किए गए ताकि भावी पीढ़ियां इस विषय से प्रमाणित तथ्यों से अवगत हो सकें। प्रति दिन तीन,तीन घंटों तक के प्रदर्शन में चार ग्रहों की एकल,युगल, व सामूहिक निबद्ध और अनिबद्ध लोक गाथाओं को छंदों,ताल की जाती और ग्रह सहित दर्शाया गया।

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इस बारे जानकारी देते हुए जीया लाल ठाकुर ने कहा कि विशुद्ध विरासती संस्कृति के गर्भ गृह हिमाचल प्रदेश और मात्र हमारे प्रदेश में वैदिक कलाओं के मूल तत्व देव दोष के भय से आज भी जीवित रहने के रहस्यों को उजागर किया गया। बची हुई विशुद्ध संस्कृति को बिगाड़ने वाले भले ही स्टार हैं और इसे बचाने वाले बेकार हैं। फिर भी अपनी 43 वर्षों की खोज और तपस्या भावी पीढ़ियों के लिए अर्पित करना मानव धर्म समझता हूं ताकि विकसित बुद्धि की हमारी वर्तमान और भावी पीढ़ियां सुसंस्कृत और संस्कारी बनने की और अग्रसर हो सकें । असभ्यता, अश्लीलता, नशाखोरी और निजी स्वार्थ की अप्राधिकता को अपना कानूनी अधिकार समझना बंद कर सकें। उन्हें सयम,आदर्श, मर्यादा और चरित्र की प्रेरणा देने वाले सभ्य मनोरंजन वाली संस्कृति उपलब्ध हो सके। हमारे समाज में संस्कृति की परिभाषा असभ्यता अश्लीलता, नशाखोरी या भ्रष्ट संगीत ही बचे हैं। फिर भी प्रयास है कि है इस पर अंकुश लग सके।

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