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Arun Khetarpal Birth Anniversary: 1971 युद्ध के परमवीर चक्र विजेता अरुण खेत्रपाल की जयंती पर लॉरेंस स्कूल के 700 छात्रों ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि

Lawrence School Sanawar: लॉरेंस स्कूल, सनावर में 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के परमवीर चक्र विजेता सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेतरपाल की जयंती पर विशेष श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया, जिसमें 700 से अधिक विद्यार्थियों ने भाग लिया।
Updated By Prajasatta
Published on: 14 अक्टूबर 2026
लॉरेंस स्कूल, सनावर में परमवीर चक्र विजेता सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेतरपाल को श्रद्धांजलि

Param Vir Chakra Hero Second Lieutenant Arun Khetarpal Birth Anniversary: लॉरेंस स्कूल, सनावर ने अपने वीर पूर्व छात्र सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की जयंती गर्व और श्रद्धा के साथ मनाई। उन्हें 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। इस अवसर पर उनके नाम पर बने खेत्रपाल स्टेडियम में एक विशेष श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई, जिसमें 700 से अधिक विद्यार्थियों ने एकत्र होकर इस वीर सपूत को नमन किया।

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कार्यक्रम का शुभारंभ विद्यालय की प्रधानाचार्या रुचि प्रधान दत्ता द्वारा अरुण खेतरपाल की प्रतिमा पर पुष्पचक्र अर्पित करने के साथ हुआ। इस दौरान विद्यालय के बिगुल वादकों ने ‘लास्ट पोस्ट’ की धुन बजाई। सभा में प्रेरणादायी संस्कृत प्रार्थनाएँ और भावपूर्ण भाषण प्रस्तुत किए गए, जिनमें इस महान वीर की शौर्यगाथा और देश के प्रति उनके समर्पण को स्मरण किया गया। उनका साहस और निस्वार्थ राष्ट्रभक्ति आज भी सनावर के विद्यार्थियों की पीढ़ियों को कर्तव्य, सम्मान और बलिदान के मूल्यों को आत्मसात करने की प्रेरणा देती है।

इस अवसर पर सभा को संबोधित करते हुए विद्यालय की प्रधानाचार्या रुचि प्रधान दत्ता ने कहा, “आज, जब हम सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल, परमवीर चक्र विजेता और हमारे विद्यालय के 1966 बैच के गौरवशाली पूर्व छात्र की जयंती मना रहे हैं, तब हम उस युवा वीर को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, जिनका असाधारण साहस, अदम्य संकल्प और सर्वोच्च बलिदान पीढ़ियों से सभी को प्रेरित करता आ रहा है। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्ची महानता जीवन की अवधि में नहीं, बल्कि उन मूल्यों में निहित होती है, जिन्हें हम अपनाते हैं, और उस साहस में, जिसके साथ हम राष्ट्र की सेवा करते हैं।

उनके अमर शब्द ‘नहीं, सर, मैं अपना टैंक नहीं छोड़ूँगा’,  हमारे विद्यार्थियों को सदैव हर चुनौती का सामना दृढ़ संकल्प, सम्मान और मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण के साथ करने की प्रेरणा देते रहें। अरुण खेतरपाल की विरासत हमारे विद्यालय के इतिहास का मात्र एक अध्याय नहीं है, बल्कि देशभक्ति, वीरता और कर्तव्यनिष्ठा का एक जीवंत प्रकाशस्तंभ है।”

विद्यालय के वार्षिक संस्थापक दिवस समारोह के साथ-साथ आयोजित इस कार्यक्रम को एक और विशेष गौरवपूर्ण क्षण मिला, जब अरुण खेत्रपाल के 1966 बैच के सहपाठी अपने ही विद्यालय में पुनः एकत्र हुए और उन्होंने अपने डायमंड जुबली मिलन समारोह को मनाया। इस पुनर्मिलन ने अवसर को और भी भावपूर्ण एवं यादगार बना दिया।

प्रधानाचार्या के शब्द सभा में गूँजते रहे और सभी को उस अमर वीर की याद दिलाते रहे, जिसने हमारे कल को सुरक्षित बनाने के लिए अपना आज न्योछावर कर दिया। “हम उस वीर को नमन करते हैं, जिसने हमारे कल के लिए अपना आज बलिदान कर दिया।”

1971 के युद्ध के परमवीर, जिन्होंने 21 वर्ष की उम्र में दुश्मनों के छुड़ा दिए थे छक्के
उल्लेखनीय है कि भारतीय सेना का इतिहास ऐसे वीर सपूतों की गाथाओं से भरा पड़ा है जिन्होंने देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। ऐसे ही असाधारण नायकों में से एक थे सेकेण्ड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल, जिन्हें दुश्मन के सामने अकल्पनीय बहादुरी दिखाने के लिए भारत का सर्वोच्च सैन्य अलंकरण परमवीर चक्र मरणोपरांत प्रदान किया गया था।

खेत्रपाल का जन्म 14 अक्टूबर 1950 को पुणे, महाराष्ट्र में हुआ था। उनके घर में सेना की पृष्ठभूमि थी, क्योंकि उनके पिता लेफ्टिनेंट कर्नल एम एल खेतरपाल भारतीय सेना में कोर ऑफ इंजीनियर्स के अधिकारी थे। बचपन से ही अरुण खेत्रपाल ने खुद को शिक्षा और खेलकूद दोनों क्षेत्रों में एक सक्षम छात्र और खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया था। उन्होंने लॉरेंस स्कूल सनवार से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की थी।

इसके बाद, जून 1967 में वह राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) में शामिल हुए। एनडीए के दौरान वह फॉक्सट्रॉट स्क्वाड्रन से संबंधित थे और 38वें पाठ्यक्रम के स्क्वाड्रन कैडेट कैप्टन के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को निभाया था। उनकी एनडीए संख्या 7498/एफ/38 थी, जिसके बाद उन्होंने भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) में प्रवेश लिया।

अपनी कठिन ट्रेनिंग पूरी करने के बाद, 13 जून 1971 को अरुण खेत्रपाल को आधिकारिक तौर पर 17 पूना हार्स रेजिमेंट में नियुक्त किया गया था। उनका सैन्य जीवन बेहद संक्षिप्त, मात्र छह महीने का रहा, लेकिन इस अल्प अवधि में उन्होंने देश के लिए जो किया वह अमर हो गया। 16 दिसंबर 1971 को भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान 17 पूना हार्स को भारतीय सेना की 47वीं इन्फैन्ट्री ब्रिगेड की कमान के अंतर्गत तैनात किया गया था। इस भयंकर संघर्ष के दौरान 47वीं ब्रिगेड शकगढ़ सेक्टर में मोर्चा संभाले हुए थी।

युद्ध के मैदान में अरुण खेत्रपाल ने अद्भुत पराक्रम और अदम्य साहस का परिचय दिया। मात्र 21 वर्ष की आयु में उन्होंने दुश्मन सेना के दांत खट्टे कर दिए और अपनी वीरता का लोहा मनवाया। इसी संघर्ष और शत्रु का मुकाबला करते हुए उन्होंने देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया और वीरगति को प्राप्त हुए। उनके इस अतुलनीय और अद्वितीय बलिदान व समर्पण को मान्यता देते हुए भारत सरकार ने गणतंत्र दिवस 1972 के अवसर पर उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया, जो 16 दिसंबर 1971 से प्रभावी माना गया।

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