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कांग्रेस की हिमाचल में जीत के लिए मुसीबत, पार्टी के बीच की बगावत और अंदरूनी बिखराव

कांग्रेस की हिमाचल में जीत के लिए मुसीबत, पार्टी के बीच की बगावत और अंदरूनी बिखराव

प्रजासत्ता ब्यूरो|
हिमाचल प्रदेश में चुनावी बिगुल बज गया है। यहां मुकाबला कांग्रेस और बीजेपी के बीच ही है। मौजूदा समय में भाजपा हिमाचल की सत्ता पर काबिज थी लेकिन हिमाचल के रिवाज के मुताबिक इस बार कांग्रेस की सत्ता में आने की बारी है। हालांकि प्रदेश के पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह के बिना उनकी विरासत को संजोए रखना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती है।

बता दें कि हिमाचल चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस ने 10 गारंटियों का दांव खेला है, लेकिन इन गारंटियों को जनता के बीच ले जाना कांग्रेस के लिए चुनौती है, क्योंकि पार्टी संगठन में बिखराव और गुटबाजी है। प्रदेश में पार्टी की लीडरशिप ही कई गुटों में बंटी नज़र आ रही है। सार्वजनिक मंचों पर हाईकमान उन्हें एक साथ खड़ा करता रहा है लेकिन अंदरूनी विरोध ख़त्म करने में नाकाम रहा है।

हिमाचल कांग्रेस कुलदीप सिंह राठौड़, सांसद प्रतिभा सिंह, वरिष्ठ नेता सुखविंदर सिंह सुक्खू, आशा कुमारी, रामलाल ठाकुर और मुकेश अग्निहोत्री के अपने-अपने गुट हैं। ऐसे में अगर चुनाव जीत भी गए तो आपसी फूट शुरुआत में ही अविश्वास की कगार पर खड़ा कर देगी। हालांकि छोटे से राज्य हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस ने पंजाब और उत्तराखंड की तरह कार्यकारी अध्यक्ष भी नियुक्त किए थे, लेकिन गुटबाजी से निजात नहीं मिली है।

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उल्लेखनीय है कि कांग्रेस ने इसी साल अप्रैल 2022 में संगठन में बड़ा बदलाव करते हुए
प्रदेश के पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह की विरासत को संजोए रखने के लिए भले ही कमान उनकी पत्नी और सीनियर कांग्रेस लीडर प्रतिभा सिंह को सौंपी हो। लेकिन पार्टी में एक बड़ा चेहरा माने जा रहे हैं प्रादेशिक अभियान समिति के मुखिया सुखविंदर सिंह सुक्खू। इससे पहले सुक्खू सूबे में पार्टी अध्यक्ष की कमान भी संभाल चुके हैं। लेकिन राज परिवार से आने वाले वीरभद्र सिंह के सामने उन्हें पार्टी अध्यक्ष रहते हुए वह मान-सम्मान हासिल नहीं कर हुआ, जो बतौर अध्यक्ष मिलना चाहिए था। सुक्खू और राजा एक-दूसरे के धुर विरोधी माने जाते रहे हैं। हाईकमान भी सार्वजनिक मंचों पर उन्हें एक साथ खड़ा करने में नाकाम रहा है।

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बता दें कि पिछले असेंबली चुनावों में दोनों के बीच संवाद ना के बराबर रह गया था। जनवरी 2019 में सुक्खू से प्रदेश की कमान ले ली गई। कहा जाता है कि इस फैसले से दुखी होकर सुक्खू के समर्थक 2019 के आम चुनावों में पार्टी का प्रचार करने के बजाय घर बैठ गए थे।

आज भले ही राजा इस दुनिया में न हों। लेकिन आज भी प्रतिभा सिंह और सुक्खू के बीच रिश्ते सहज नहीं हैं। दोनों के बीच खींचतान अब भी जारी है। हां, यह बात और है कि आज प्रतिभा सिंह के बावजूद सुक्खू कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे के तौर पर सामने आ रहे हैं।

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जहां प्रतिभा सिंह परिवार का प्रभाव शिमला सहित प्रदेश के ऊपरी हिस्सों में है, वहीं सुक्खू हमीरपुर के नादौन से तीन बार के विधायक हैं। उनका प्रभाव हमीरपुर, ऊना और कांगड़ा में माना जाता है। दोनों की अहमियत को देखते हुए कांग्रेस आलाकमान ने जहां प्रतिभा को प्रदेश की कमान दी, वहीं सुक्खू को कैंपेन कमिटि का चेहरा बनाकर शक्ति संतुलन की कवायद को अंजाम दिया।

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