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हिमाचल चुनाव से पहले पार्टी में भीतर विद्रोह का सामना कर रही भाजपा

Published on: 11 November 2022
बीजेपी

प्रजासत्ता ब्यूरो।
हिमाचल प्रदेश में दो दिन बाद यानी कि 12 नवंबर को मतदान होंगा। भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने इस पहाड़ी राज्य में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। इस चुनाव में इन पार्टियों ने जीतने के लिए सब कुछ झोंक दिया है।

हालांकि प्रदेश में रिवाज बदलने में जुटी सत्ताधारी पार्टी बीजेपी को अंदरूनी बगावत का सामना करना पड़ रहा है जो कि चिंता का विषय है। सत्ता में दोबारा आने का सपना देख रही बीजेपी के सामने उसकी ही पार्टी के बागी नेता खड़े हो गए हैं, जिससे हिमाचल में बीजेपी के लिए कांग्रेस को रोक पाना मुश्किल हो रहा है।

ऐसे ही दो दिन पहले इस खबर पर मोहर लग गई कि बीजेपी हिमाचल प्रदेश चुनाव से पहले पार्टी के भीतर विद्रोह का सामना कर रही है। ऐसा इसलिए कहा कहा जा रहा है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पार्टी के एक बागी नेता को मनाने की कोशिश की है, लेकिन वो नहीं माने। पीएम मोदी ने बीजेपी के बागी नेता कृपाल परमार को कथित फोन कर मनाया था। लेकिन कृपाल परमार मजबूती से निर्दलीय चुनाव लड़ने के लिए मुकाबले में बने हुए हैं।

कृपाल परमार जैसे बीजेपी के 18 ऐसे नेता हैं जो निर्दलीय चुनाव लड़ सकते हैं। हिमाचल प्रदेश में कुल 68 विधानसभा सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए बहुमत का आंकड़ा 35 है, ऐसे में 18 सीटों से बागियों का उतरना बीजेपी के लिए चुनाव जीतना मुश्किल कर सकता है?

आइए जानते हैं कि वो 18 सीटें कौन सी हैं जिसपर बीजेपी के बागी ताल ठोंक रहे हैं।
1.किन्नौर सीट से तेजवंत सिंह नेगी
2.चंबा सीट से इंदिरा कपूर
3.कांगड़ा सदर सीट से कुलभाष चौधरी
4.धर्मशाला सीट से विपिन नेहरिया
5.कुल्लू की अन्नी सीट से किशोर लाल
6.इंदौरा सीट से मनोहर धीमान
7.नालागढ़ सीट से केएल ठाकुर
8.फतेहपुर सीट से कृपाल परमार
9.सुंदरनगर सीट से अभिषेक ठाकुर
10.कुल्लू की सदर सीट से राम सिंह
11.मनाली सीट से महेंद्र सिंह ठाकुर
12.बंजार सीट से हितेश्वर सिंह
13.बिलासपुर सीट से सुभाष शर्मा
14.झंडूता सीट से राजकुमार कोंडल
15.नाचन सीट से ज्ञानचंद
16.मंडी सीट से प्रवीण शर्मा
17.देहरा सीट से होशियार सिंह

उल्लेखनीय है कि हिमाचल प्रदेश में सत्ता परिवर्तन का नियम रहा है। हिमाचल की जागरूक जनता हर 5 साल बाद सरकार को बदल देती है। वर्ष 2017 में हुए विधानसभा चुनाव हिमाचल प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस में कांटे की टक्कर थी। लेकिन पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह और कांग्रेस के भरपूर प्रयासों से कांग्रेस सत्ता में वापिस नही लौट पाई। हालांकि कुछ हारी गई सीटों पर हार का मार्जन बहुत कम रहा। इसके बाद 5 साल तक भारतीय जनता पार्टी की सरकार हिमाचल की सत्ता पर काबिज रही।

लेकिन भ्रष्टाचार,ओल्ड पेंशन, सवर्ण आयोग, विभिन्न भर्तियों में घोटालें, पुलिस पेपर लीक भर्ती मामले के अलावा, बागवानों का मुद्दा, महंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दे सरकार के गले की हड्डी बने हुए हैं। यही कारण रहा कि केंद्र और हिमाचल में सत्ता में होते हुए भी भाजपा प्रदेश के विधानसभा और लोकसभा उपचुनाव को नहीं जीत पाई और उनकी बुरी तरह से हार हुई।

राजनीतिक जानकारों की बात माने तो हिमाचल प्रदेश के वोटर बहुत ही समझदार है और वहां सत्ता परिवर्तन पर विश्वास रखते हैं हालांकि एजंसियों द्वारा किए गए चुनावी सर्वे कुछ भी कह रहे हो, लेकिन हिमाचल के लोगों का एक रिवाज रहा है कि उन्होंने बड़े-बड़े नेताओं को हरा कर आईना दिखाया है। यही कारण है कि कई दशकों से यहां कोई भी रिपीट नही कर पाया है। ऐसे में जब 5 साल सत्ता में रही भाजपा पूर्ण रूप से लोगों का विरोध झेलना पड़ा, बावजूद इसके उनका दुबारा सत्ता में लौटना का सपना और अपने बागियों से चुनाव में भीतरघात होने से बचाना बहुत मुश्किल होता नज़र आ रहा है।

भाजपा ने अपने दिग्गज नेताओं के दम पर,और हिंदुत्व का कार्ड खेल कर हिमाचल के वोटरों को लुभाने का जरूर काम किया है। लेकिन हिमाचल का इतिहास गवाह रहा है प्रदेश का कोई भी चुनाव रहा हो, खासकर विधानसभा चुनाव हमेशा से ही स्थानीय मुद्दों पर रहा है, और यहां इस बार के चुनाव में बीजेपी की सबसे बड़ी नाकामी रही है कि मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के नाम पर वोट ना मांग कर केंद्र के बड़े नेताओं और हिंदुत्व, राममंदिर, और धारा 370 जैसे मुद्दों के नाम पर जनता से वोट मांग कर जीत के दावे किए जा रहे हैं।

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