HP CAG Report: हिमाचल प्रदेश विधानसभा में सोमवार को मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने वर्ष 2019-20 से 2022-23 की अवधि की अनुपालन लेखापरीक्षा (Compliance Audit) रिपोर्ट पेश की। इस रिपोर्ट ने राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) के उपयोग में गंभीर वित्तीय खामियों और प्रशासनिक लापरवाही को उजागर किया है।
कैग (CAG) की इस रिपोर्ट के अनुसार, तय दिशा-निर्देशों का पालन न होने के कारण न केवल राहत कार्यों में देरी हुई, बल्कि राज्य को करोड़ों रुपये के केंद्रीय अनुदान से भी हाथ धोना पड़ा।
आपदा राहत कोष का दुरुपयोग और केंद्रीय कटौती
लेखापरीक्षा में खुलासा हुआ है कि वर्ष 2019-20 में SDRF के अनुचित प्रबंधन के कारण केंद्र सरकार ने 258.30 करोड़ रुपये में से 61.07 करोड़ रुपये की राशि रोक दी थी। रिपोर्ट के मुताबिक, 2020-22 के दौरान SDRF में 745.91 करोड़ और 752.79 करोड़ रुपये की भारी राशि लंबित रही।
इस वित्तीय कुप्रबंधन का सीधा असर NDRF से मिलने वाली सहायता पर पड़ा, जिससे स्वीकृत 254.73 करोड़ रुपये जारी नहीं हो सके। इसके परिणामस्वरूप, प्रभावितों तक राहत पहुंचने में एक से दो साल का विलंब हुआ। साथ ही, शेष राशि के गलत अनुमान के आधार पर केंद्र ने 61.02 करोड़ रुपये की अतिरिक्त कटौती भी की।
वित्तीय प्रबंधन में लापरवाही और ब्याज का नुकसान
रिपोर्ट में निवेश संबंधी नियमों के उल्लंघन का भी उल्लेख है। नियमों के अनुसार आपदा कोष को तय निवेश साधनों में लगाया जाना चाहिए था, लेकिन 122.27 करोड़ रुपये की राशि को केवल बचत खातों में रखा गया। इससे होने वाले ब्याज के नुकसान की भरपाई राज्य सरकार अपने संसाधनों से नहीं कर पाई।
ऑडिट में पाया गया कि जहां जिलों में 69 से 92 प्रतिशत तक निधि का उपयोग हुआ, वहीं खंड स्तर पर यह आंकड़ा महज 34 से 43 प्रतिशत तक सीमित रहा। इसके अलावा, 11.76 करोड़ रुपये ऐसे कार्यों पर खर्च किए गए जो आपदा राहत के दायरे में ही नहीं आते थे।
प्रशासनिक ढांचा और स्टाफ की भारी कमी
आपदा प्रबंधन की तैयारियों पर सवाल उठाते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF) में स्वीकृत 326 पदों में से केवल 193 पद ही भरे गए हैं। तकनीकी कर्मियों के अभाव और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लक्ष्य पूरे न होने से आपदा की स्थिति में प्रतिक्रिया क्षमता प्रभावित हुई है।
चौंकाने वाली बात यह है कि प्रशिक्षण और उपकरणों के लिए जारी 6.07 करोड़ रुपये की राशि का उपयोग ही नहीं किया गया। इसके अतिरिक्त, 9,449 स्वीकृत कार्यों को ऑनलाइन पोर्टल पर अपडेट न करने से उनकी निगरानी और पारदर्शिता पर संकट खड़ा हो गया है।
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय और वन विभाग में भी विसंगतियां
लेखापरीक्षा की आंच शिक्षा और वन विभाग तक भी पहुंची है। विश्वविद्यालय में वर्ष 2020-23 के दौरान 27 से 37 प्रतिशत संकाय पद खाली रहे, जिससे शिक्षण की गुणवत्ता प्रभावित हुई। रिपोर्ट में 186 नियुक्तियों पर सवाल उठाए गए हैं, जहां दस्तावेजों का सत्यापन तक नहीं किया गया। यूजीसी (UGC) नियमों का उल्लंघन करते हुए अयोग्य सहायक प्राध्यापक और अतिथि संकाय की नियुक्तियां की गईं।
वहीं, वन विभाग के तहत चंबा सर्कल में वन भूमि के वर्गीकरण और मूल्य निर्धारण में गड़बड़ी पाई गई है, जिससे सरकारी खजाने को 21.33 करोड़ रुपये की संभावित कम वसूली का नुकसान हुआ है। राज्य और जिला आपदा प्रबंधन योजनाओं को समय पर अपडेट न करना और कई जिलों में आपदा प्रबंधन दलों का गठन न होना प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
















