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Sabarimala Case Supreme Court Hearing: “महिलाओं के लिए महीने में 3 दिन की अस्पृश्यता नहीं हो सकती,” जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की तीखी टिप्पणी

Justice BV Nagarathna: सबरीमाला मंदिर मामले में नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष सुनवाई शुरू हुई। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं को अलग-थलग करने की प्रथा को 'अस्पृश्यता' बताते हुए इस पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
Sabarimala Case Supreme Court Hearing: "महिलाओं के लिए महीने में 3 दिन की अस्पृश्यता नहीं हो सकती," जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की तीखी टिप्पणी

Sabarimala Case Supreme Court Hearing के दौरान आस्था और मौलिक अधिकारों के बीच जारी कानूनी बहस में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कड़ी टिप्पणी की है। मंगलवार को नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान उन्होंने मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं को ‘अछूत’ मानने की सामाजिक प्रथा की आलोचना की।

सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ, समानता और धार्मिक प्रथाओं के बीच संवैधानिक संतुलन की व्याख्या कर रही है। अगले वर्ष देश की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनने वाली जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “एक महिला के तौर पर मैं इस (प्रथा) से सहमत नहीं हूं। महिलाओं के लिए महीने में तीन दिन की अस्पृश्यता नहीं हो सकती, जिसके बाद उन्हें सामान्य मान लिया जाए।”

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यह टिप्पणी तब आई जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ‘इंडियन यंग लॉयर एसोसिएशन बनाम केरल’ मामले में 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की तर्कसंगतता पर सवाल उठा रहे थे। मेहता ने दलील दी कि अनुच्छेद 17, जो अस्पृश्यता को समाप्त करता है, उसे सबरीमाला की परंपरा पर लागू करना न्यायिक सिद्धांतों का अत्यधिक विस्तार है। उन्होंने कहा कि भारत में महिलाएं राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे उच्च संवैधानिक पदों पर आसीन हैं और उन्हें पूजा जाता है।

केंद्र सरकार की ओर से दलील देते हुए सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि सभी आयु वर्ग की महिलाएं अन्य अयप्पा मंदिरों में प्रवेश करती हैं, लेकिन सबरीमाला की प्रथा अद्वितीय है। उन्होंने तर्क दिया कि वहां भगवान अयप्पा ‘नैस्तिक ब्रह्मचारी’ के रूप में विराजमान हैं और देवता की इस विशिष्ट विशेषता को न्यायिक कसौटी पर नहीं कसा जा सकता। उन्होंने चिंता जताई कि पिछले कुछ दशकों में हर धार्मिक मुद्दे को लैंगिक समानता के चश्मे से देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है।

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पीठ के सदस्य जस्टिस एम.एम. सुंदरेश ने केंद्र के तर्कों को संकलित करते हुए कहा कि सरकार का मुख्य पक्ष यह है कि देवता के गुण भक्तों की आस्था से जुड़े हैं, इसलिए अदालत उनकी वैधता का परीक्षण नहीं कर सकती। मेहता ने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार किसी मजार या गुरुद्वारे में सिर ढकने की अनिवार्यता होती है, उसी तरह सबरीमाला की अपनी विशिष्ट परंपराएं हैं, जिन्हें व्यक्तिगत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर चुनौती देना जटिल हो सकता है।

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