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करोड़ों के ‘कैश कांड’ और महाभियोग के बीच जस्टिस यशवंत वर्मा का इस्तीफा, कानूनी कार्रवाई से बचने की सोची-समझी चाल ?

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा का अपने पद से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा देना, दिल्ली स्थित आवास पर भारी मात्रा में नकदी जलने की घटना और संसद में लंबित महाभियोग की प्रक्रिया के बीच न्यायिक गलियारे में चर्चा का विषय बन गया है।
Justice Yashwant Verma Resignation

Justice Yashwant Verma Resignation: इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से अचानक इस्तीफा दे दिया है। दिल्ली स्थित आवास पर बोरे में मिले करोड़ों के कैश और उसके बाद शुरू हुई महाभियोग की प्रक्रिया के बीच इस इस्तीफे ने न्यायिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल तिवारी ने इसे एक रणनीतिक कदम बताया है।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026 को जस्टिस यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र भेजकर तत्काल प्रभाव से इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया। अपने पत्र में उन्होंने पद पर रहने को एक सम्मान बताया, लेकिन उन कारणों पर चुप्पी साध ली जिन्होंने उन्हें यह कदम उठाने के लिए मजबूर किया।

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उल्लेखनीय है कि 14 मार्च 2025 को उनके दिल्ली स्थित आवास पर आग लगने के दौरान दमकल विभाग को भारी मात्रा में नकदी मिली थी। इस घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस जांच समिति ने उन्हें पद से हटाने की सिफारिश की थी। विपक्ष के 146 सांसदों द्वारा हस्ताक्षरित महाभियोग प्रस्ताव पर लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति की जांच अभी जारी थी, लेकिन उससे पहले ही उन्होंने पद छोड़ दिया।

वरिष्ठ वकील अनिल तिवारी का बड़ा दावा: “सुविधाओं को बचाने की चाल”
समाचार एजेंसी ANI से बात करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व बार प्रेसिडेंट अनिल तिवारी ने इस इस्तीफे के पीछे के तकनीकी पहलुओं को उजागर किया। उन्होंने कहा कि यह उन नागरिकों की जीत है जिनका न्यायपालिका पर अटूट भरोसा है।

तिवारी ने इस्तीफे को एक ‘चालाक चाल’ करार देते हुए कहा:
“जजों पर केवल संदेह ही उनके पद छोड़ने के लिए पर्याप्त होना चाहिए, लेकिन यहाँ इस्तीफा इसलिए दिया गया ताकि भविष्य में मिलने वाले न्यायिक लाभ सुरक्षित रहें। महाभियोग की प्रक्रिया पूरी होने पर सब कुछ छीन लिया जाता है, जबकि इस्तीफा देने से वे उन लाभों को प्राप्त करने के पात्र बने रह सकते हैं।”

उन्होंने आगे कहा कि घर से इतनी बड़ी मात्रा में नकदी मिलने पर “जानकारी न होने” का बहाना स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने इस पूरे प्रकरण की किसी विश्वसनीय केंद्रीय एजेंसी से जांच कराने की मांग की है।

क्या था पूरा मामला? (घटनाक्रम)

14 मार्च 2025: जस्टिस वर्मा के दिल्ली आवास पर आग लगी। दमकलकर्मियों को बोरों में भरी बेहिसाब नकदी और अधजले नोट मिले। उस समय जस्टिस वर्मा मध्य प्रदेश में थे।

तबादला: विवाद बढ़ने पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट से उनके मूल कैडर, इलाहाबाद हाई कोर्ट स्थानांतरित कर दिया गया।

जांच और महाभियोग: तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा गठित समिति की रिपोर्ट के आधार पर संसद में महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई।

10 अप्रैल 2026: संसदीय समिति की रिपोर्ट आने से पहले ही जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा दे दिया।

फिलहाल यह मामला राष्ट्रपति और संबंधित मंत्रालयों के पास है। वरिष्ठ वकीलों का मानना है कि भले ही उन्होंने पद छोड़ दिया हो, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों की आंच अभी ठंडी नहीं हुई है।

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