Delhi High Court Justice Swarana Kanta Sharma: दिल्ली हाई कोर्ट में कथित आबकारी नीति मामले की सुनवाई के दौरान एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। हाई कोर्ट की न्यायाधीश जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अपने और अदालत के खिलाफ की जा रही अपमानजनक टिप्पणियों को लेकर बेहद सख्त रुख अख्तियार कर लिया है। गुरुवार को सुनवाई के दौरान उन्होंने स्पष्ट किया कि वह इन टिप्पणियों के खिलाफ अवमानना की कानूनी कार्यवाही शुरू करने जा रही हैं।
जस्टिस शर्मा ने कहा कि उन्होंने इस बात का कड़ा संज्ञान लिया है कि उत्पाद शुल्क नीति मामले से जुड़े कुछ आरोपियों द्वारा उनके खिलाफ बेहद निंदनीय, आपत्तिजनक और मानहानिकारक सामग्री पोस्ट की गई है। दरअसल इस पूरे मामले पर अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अदालत कक्ष में कहा कि उन्हें लगातार यह जानकारी मिल रही है कि कुछ प्रतिवादियों और अवमानना करने वालों द्वारा अदालत की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली सामग्री साझा की जा रही है।
उन्होंने दृढ़ता के साथ कहा कि वह इस स्थिति में चुप नहीं रह सकती हैं। न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि अवमानना की इस कार्रवाई को लेकर उनका आदेश पूरी तरह से तैयार है और वह इसे शाम लगभग 5 बजे सुनाएंगी। आदेश सुनाए जाने के बाद ही यह तय किया जाएगा कि दोषियों के खिलाफ आगे क्या सख्त कानूनी कदम उठाए जाएंगे।
इसी सुनवाई के दौरान, जस्टिस स्वर्णकांता ने एक अन्य महत्वपूर्ण जानकारी भी साझा की। उन्होंने बताया कि कुछ वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल, पार्टी के वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया और पूर्व विधायक दुर्गेश पाठक का कानूनी प्रतिनिधित्व करने के अनुरोध को स्वीकार करने में अपनी उदारता दिखाई है। हालांकि, न्यायाधीश ने इन वरिष्ठ अधिवक्ताओं के नामों या इस विषय से जुड़ी अन्य विस्तृत जानकारी का फिलहाल खुलासा नहीं किया।
गौरतलब है कि वर्तमान में, जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा दायर एक महत्वपूर्ण पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई कर रही हैं। यह याचिका उस आदेश के खिलाफ दायर की गई है जिसमें इस साल फरवरी माह में एक निचली अदालत ने कथित शराब नीति घोटाले के मामले में एजेंसी द्वारा नामजद 23 आरोपियों को बरी कर दिया था।
इस मामले ने अप्रैल 2026 में तब एक नया मोड़ ले लिया था, जब आम आदमी पार्टी के तीनों प्रमुख नेताओं ने कथित तौर पर न्यायमूर्ति शर्मा को संबोधित एक पत्र सार्वजनिक कर दिया था। इस पत्र के माध्यम से उन्होंने अदालत की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए थे। आप नेताओं ने अपने सार्वजनिक पत्र में घोषणा की थी कि अगर जस्टिस शर्मा सीबीआई की याचिका की सुनवाई से खुद को अलग करने से इनकार करती हैं, तो वे कानूनी तौर पर किसी वकील के बिना ही अपना केस लड़ेंगे।
आप नेताओं ने अपनी इस बिना वकील की कानूनी लड़ाई को ‘सत्याग्रह’ का नाम दिया था। इसके साथ ही, तीनों नेताओं ने जस्टिस शर्मा के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कानूनी मोर्चे, जिसे अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के नाम से जाना जाता है, के साथ कथित सार्वजनिक जुड़ाव पर भी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी। आम आदमी पार्टी वैचारिक रूप से इस संगठन का विरोध करने का दावा करती है।
इन तीनों नेताओं ने अपनी दलील में यह आशंका भी जताई थी कि अगर जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा इस मामले की सुनवाई जारी रखती हैं, तो उन्हें पक्षपात होने का डर है। इसके पीछे उनका तर्क यह है कि न्यायाधीश के बच्चे केंद्र सरकार के अधिवक्ताओं के पैनल में शामिल हैं। नेताओं का आरोप है कि उन्हें भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा मामले सौंपे जाते हैं। यह तथ्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता उच्च न्यायालय में जस्टिस शर्मा के समक्ष ही आबकारी नीति मामले में सीबीआई की ओर से प्रमुख रूप से पेश हो रहे हैं।
बता दें कि यह पहली बार नहीं है जब इस तरह की मांग उठी हो। इससे पहले भी, अरविंद केजरीवाल और पांच अन्य लोगों ने आधिकारिक तौर पर न्यायाधीश से इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने का अनुरोध किया था। हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट ने उनके इस अनुरोध को खारिज कर दिया था। इतना ही नहीं, अदालत ने आरोपियों द्वारा न्यायाधीश की निष्पक्षता पर लगाए गए आरोपों और संदेहों की कड़ी निंदा भी की थी। अब कोर्ट की अवमानना का यह नया प्रकरण इस हाई-प्रोफाइल कानूनी लड़ाई में एक और गंभीर अध्याय जोड़ने जा रहा है।
















