India China Relations: लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक भारत की सीमाओं पर जारी सैन्य गतिरोध और चीनी सामानों के बहिष्कार के दावों के बीच केंद्र सरकार के एक आंतरिक फैसले ने बड़े विरोधाभास को उजागर किया है। दरअसल, केंद्रीय वित्त मंत्रालय के तहत आने वाले डिपार्टमेंट ऑफ एक्सपेंडिचर ने एक विशेष आदेश जारी कर चार प्रमुख चीनी कंपनियों को भारत के बेहद संवेदनशील और अहम क्रिटिकल पावर प्रोजेक्ट्स में सीधे टेंडर लेने की अनुमति दे दी है।
इंडियन एक्सप्रेस हिंदी की इस एक्सक्लूसिव खबर में इस फैसले की जानकारी सामने आने के बाद राजनीतिक और रणनीतिक गलियारों में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। रिपोर्ट के मुताबिक वित्त मंत्रालय की ओर से यह आदेश 24 जून 2026 को जारी किया गया, जिसके तहत इन कंपनियों को पब्लिक प्रोक्योरमेंट नियमों से अगले 2 साल के लिए विशेष छूट दी गई है।

हालांकि, सरकारी फाइल में यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है कि इस फैसले को कोई मिसाल न माना जाए, ताकि अन्य विदेशी कंपनियां इसकी आड़ में ऐसी ही राहत न मांग सकें। इस मंजूरी के बाद अब ये 4 चीनी कंपनियां भारत के सरकारी पावर इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े टेंडरों में सीधे दावेदारी पेश कर सकेंगी। जिन चार चीनी कंपनियों को भारत सरकार ने यह ‘वीआईपी पास’ दिया है, उनकी भारत में भी सहायक इकाइयां मौजूद हैं।
इनमें पहली कंपनी टीबीईए एनर्जी इंडिया है, जो चीनी टीबीईए ग्रुप की पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी है। दूसरी नंजिंग इलेक्ट्रिक इंडिया है, जो चीन की मशहूर पावर इक्विपमेंट निर्माता कंपनी नंजिंग इलेक्ट्रिक से संबद्ध है। तीसरी न्यू नॉर्थ ईस्ट इलेक्ट्रिक इंडिया है, जिसके चीनी कंपनियों के साथ सीधे टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के करार हैं। चौथी कंपनी ताईकाई इलेक्ट्रिक इंडिया है, जो चीन के ताईकाई ग्रुप की सहायक इकाई है।
ये कंपनियां देश के पावर ग्रिड और ट्रांसमिशन लाइनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हिस्से जैसे भारी-भरकम ट्रांसफार्मर तार, हाई वोल्टेज स्विच गियर और गैस इंसुलेटेड स्विच गियर का निर्माण करती हैं। इनमें से न्यू नॉर्थ ईस्ट इलेक्ट्रिक इंडिया की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, यह कंपनी पहले से ही भारत के कम से कम 11 बड़े ट्रांसमिशन लाइन प्रोजेक्ट्स से जुड़ी हुई है। इन उपकरणों की संवेदनशीलता के कारण रणनीतिक स्तर पर सुरक्षा को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
इस फैसले के पीछे सरकारी विभागों की ढांचागत और व्यावहारिक मजबूरियां सामने आई हैं। रिपोर्ट बताती है कि ऊर्जा मंत्रालय ने जनवरी 2026 में ही सरकार से गुहार लगाई थी कि चीनी कंपनियों पर लगे कड़े प्रतिबंधों के कारण देश के कई अहम पावर प्रोजेक्ट्स अधर में लटके हैं और तय समय से काफी पीछे चल रहे हैं। इसके बाद सेक्रेटरी लेवल की कमेटी और डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड की रजिस्ट्रेशन कमेटी के बीच लंबी माथापच्ची हुई, जिसके बाद आखिरकार इन चीनी कंपनियों को हरी झंडी देने का फैसला किया गया।
भारत की चीन पर तकनीकी और औद्योगिक निर्भरता केवल पावर सेक्टर तक सीमित नहीं है। भारत के लगभग 112 अरब डॉलर (करीब 10 लाख करोड़ रुपये) के कुल चीनी आयात में लगभग 60 फीसदी हिस्सा इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रॉनिक सामानों का है, जो भारतीय उद्योगों के एक्सपोर्ट ऑर्डर पूरे करने की रीढ़ हैं। पिछले साल देश के चमड़ा और स्पोर्ट्स फुटवेयर उद्योग ने भी सरकार से चीनी तकनीशियनों के वीजा नियमों में ढील देने की मांग की थी, क्योंकि चीन से मंगाई गई करोड़ों की मशीनें विशेषज्ञों के बिना ठप पड़ी थीं।
उल्लेखनीय है कि साल 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद, जिसमें भारत के 20 जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे, सरकार ने प्रेस नोट 3 लागू किया था। इसके तहत भारत के साथ जमीनी सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले निवेश पर सख्त पाबंदियां लगाई गई थीं और सरकारी ठेकों के लिए गृह व विदेश मंत्रालय से अनिवार्य पॉलिटिकल और सिक्योरिटी क्लीयरेंस का नियम बनाया गया था।
भारतीय पावर सेक्टर में चीन की घुसपैठ कोई आज की बात नहीं है, यह खेल साल 2000 से चल रहा है। चाइना डोंगफेंग, शंघाई इलेक्ट्रिक और हार्बिन इलेक्ट्रिक जैसी तीन बड़ी चीनी कंपनियाँ हमारे थर्मल पावर प्लांट्स के लिए उपकरणों की मुख्य सप्लायर रही हैं। साल 2020 में भारत ने इन पर लगाम कसना शुरू किया, जिससे 2021 में चीनी प्रोजेक्ट्स में 27% की गिरावट आई। मगर कहानी यहीं खत्म नहीं होती, पहले से चल रही चीनी मशीनरी को दुरुस्त रखने और पहिया घुमाते रहने के लिए आख़िरकार भारत को फिर से उन्हीं के गियर्स और पार्ट्स का सहारा लेना पड़ा।
भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश में मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई सरकार की पीएलआई (PLI) स्कीम वियतनाम और चीन के मुकाबले पिछड़ रही है। भारत में पुर्जों पर इंपोर्ट ड्यूटी 27.7% है। उद्योग जगत का साफ कहना है कि यदि चीन से आने वाले सस्ते पुर्जों और कुशल कारीगरों पर पूरी तरह रोक लगी रही, तो भारतीय इंडस्ट्री वैश्विक बाजार में टिक नहीं पाएगी। इसी जमीनी हकीकत को देखते हुए सरकार ने पहले एफडीआई नियमों में नपी-तुली ढील दी और अब पावर सेक्टर के दरवाजे खोले हैं।
इस फैसले पर विपक्ष ने सरकार की नीतियों को आड़े हाथों लिया है। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने इसे चीन के सामने ‘कैलिब्रेटेड कैपिटुलेशन’ यानी नपा-तुला आत्मसमर्पण करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि एक तरफ चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा रिकॉर्ड स्तर पर है और वह अरुणाचल में उकसावे की कार्रवाई के साथ तिब्बत में भारत की जल सुरक्षा के लिए खतरा बनने वाला सबसे बड़ा हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट बना रहा है, वहीं दूसरी तरफ सरकार चीनी कंपनियों पर मेहरबान हो रही है। इंडियन एक्सप्रेस द्वारा वित्त मंत्रालय से इस पर मांगी गई आधिकारिक टिप्पणी का अभी इंतजार है।
रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जब वैश्विक स्तर पर भारत और चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच संतुलन बनाने की बात आती है, तो पूरी तरह से आर्थिक रिश्ते तोड़ना व्यावहारिक नहीं होता। भू-राजनीति में कोई भी स्थाई शत्रु या मित्र नहीं होता। रणनीतिक स्तर पर, बीते वर्ष चीन के तियांजन में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात हुई थी, जिसमें सीमा विवादों को सुलझाने पर चर्चा हुई थी।
वर्तमान में, भारत वैश्विक राजनीति में नए सिरे से संतुलन बनाने का प्रयास कर रहा है, हाल ही में जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची के तीन दिवसीय भारत दौरे को भी इसी चीनी प्रभाव को काउंटर करने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, लोकतंत्र होने के नाते नागरिकों और विपक्ष के सवालों के बीच सरकार के लिए सुरक्षा और आर्थिक प्रगति में संतुलन साधना एक बड़ी चुनौती है।

















