E20 Petrol Mileage: देश भर के पेट्रोल पंपों पर इस समय जो ईंधन वाहनों में भरा जा रहा है, उसमें 20 फीसदी तक एथेनॉल मिश्रित है। सरकार का कहना है कि यह कदम समय की मांग है, लेकिन ऑटोमोबाइल सेक्टर के विशेषज्ञों का दावा है कि यह मिश्रण वाहनों के इंजन और उनके एवरेज के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है। राजनीतिक गलियारों में भी इस पर तीखी प्रतिक्रिया हो रही है और नेताओं का आरोप है कि सरकार ने देश को एक ऐसी प्रयोगशाला बना दिया है जहां जनता के नफा-नुकसान की चिंता किए बिना अचानक प्रयोग किए जा रहे हैं।
दरअसल, इस पूरे विवाद को हवा तब मिली जब सुप्रीम कोर्ट में सरकार की तरफ से एक बड़ा बयान सामने आया। सरकार ने अदालत को सूचित किया कि पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने से गाड़ियों के इंजन पर क्या असर पड़ता है, इसकी कोई प्रामाणिक या प्रमाणित स्टडी फिलहाल सरकार के पास उपलब्ध नहीं है और इसकी जांच अभी जारी है। अटॉर्नी जनरल के कार्यालय के हवाले से आई इस खबर के बाद सोशल मीडिया पर हड़कंप मच गया और लोग बिना पूरी जांच-पड़ताल के इस नीति को लागू करने पर सवाल उठाने लगे।

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक जनता के बीच बढ़ती चिंताओं के बीच भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (BPCL) के कार्यकारी निदेशक अनुराग सरावगी का एक बयान सामने आया, जिसने इस बहस को और तेज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि रासायनिक रूप से एथेनॉल का माइलेज सामान्य ईंधन के मुकाबले 30 फीसदी कम होता है, जिसके कारण गाड़ियों के ओवरऑल एवरेज पर सीधा असर पड़ता है। इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं शुरू हो गईं।
बढ़ते विवाद को देखते हुए सरकार ने स्थिति को संभालने की कोशिश की। अटॉर्नी जनरल के कार्यालय से स्पष्टीकरण जारी कर कहा गया कि कोर्ट में E20 प्रोग्राम को कोई अस्थाई प्रयोग नहीं बल्कि एक मजबूत नीतिगत फैसला बताया गया है, जो पूरी तरह सुरक्षित और उपभोक्ता के अनुकूल है। हालांकि, इस स्पष्टीकरण में भी इंजन की लाइफ और माइलेज पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर सीधे तौर पर कोई ठोस आश्वासन नहीं दिखा।
इसके बाद पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने मोर्चा संभाला और सिलसिलेवार ढंग से एथेनॉल नीति के फायदे गिनाए। उन्होंने कहा कि एथेनॉल का इस्तेमाल रेसिंग कारों तक में किया जाता है, जिससे गाड़ियों का एक्सीलरेशन बढ़ता है और तेल का नॉकिंग नंबर सुधरता है। हालांकि, माइलेज के सवाल पर उन्होंने भी स्वीकार किया कि इसमें थोड़ी कमी आ सकती है, लेकिन इसके पीछे अन्य कारण भी जिम्मेदार हो सकते हैं। उनके इस बयान को विरोध कर रहे धड़े ने लपक लिया और सरकार की नीति पर सवाल दागने जारी रखे।
सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो की भरमार है जहां लोग अपनी गाड़ियां स्टार्ट न होने, रेस दबाने पर बंद होने और फ्यूल टैंक चोक होने की शिकायतें कर रहे हैं। इन सब के बीच केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ई-20 पेट्रोल के सबसे बड़े समर्थक बने हुए हैं। उन्होंने जून 2026 में देश में 100% एथेनॉल ईंधन को वैध बनाने वाली फाइल पर दस्तखत भी किए हैं। गडकरी का कहना है कि इंजन खराब होने की खबरें महज एक झूठा प्रचार हैं, जिसे 22 लाख करोड़ रुपये के कच्चे तेल का आयात करने वाली एक बड़ी पेट्रोलियम लॉबी हवा दे रही है।
दूसरी तरफ, सरकार एथेनॉल के किसानों को होने वाले फायदे गिना रही है। सरकार के मुताबिक, एथेनॉल फैक्ट्रियों के कारण यूपी-बिहार में मक्के का भाव ₹1200 से बढ़कर ₹2600 क्विंटल तक पहुंच गया है, हालांकि सरकारी आंकड़ों के अनुसार बिहार में मक्के की एमएसपी वर्ष 2024 में ₹2090 और 2026 में ₹2410 प्रति क्विंटल थी। सरकार का दावा है कि टोयोटा, सुजुकी, मारुति और हुंडई जैसी कंपनियां जल्द ही 100% एथेनॉल पर चलने वाले मॉडल लाने वाली हैं। सरकार E85 नीति और एथेनॉल पर 18% जीएसटी को कम करने का प्रयास भी कर रही है।
पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी के अनुसार, बीते 11 वर्षों में इथेनॉल खरीद से किसानों को 12,21,000 करोड़ रुपये की आय हुई है, कच्चे तेल के आयात में 238 लाख मीट्रिक टन की कमी आई है और 14,000 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बची है। भारत के अलावा ब्राजील में E27 मॉडल अनिवार्य है और वहां 100% एथेनॉल का विकल्प भी है। इसके अलावा अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, ब्रिटेन, चीन और जापान जैसे देशों में भी एथेनॉल मिलाया जाता है।
पर्यावरण के लिहाज से नीति आयोग की रिपोर्ट कहती है कि 20% एथेनॉल मिश्रण से दोपहिया वाहनों में 50% और चार पहिया वाहनों में 30% तक कार्बन मोनोऑक्साइड एमिशन घटता है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि भारत में ज्यादातर एथेनॉल गन्ने से बनता है, जो अत्यधिक पानी सोखने वाली फसल है। 1 लीटर एथेनॉल के लिए 8 से 10,000 लीटर पानी की खपत होती है, जो महाराष्ट्र और यूपी जैसे राज्यों के भूजल स्तर के लिए बेहद खतरनाक है। अब जनता के बीच फैले इस भ्रम और आशंकाओं को दूर करने की पूरी जिम्मेदारी सरकार की है, क्योंकि शासन भरोसे से ही चलता है।

















