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Bhang Ki Kheti: अब ‘अवैध’ नहीं, हिमाचल को ‘गोल्ड’ बना कर देगी “भांग की खेती”, नौनी यूनिवर्सिटी ने शुरू की वैध खेती के लिए बड़ी वैज्ञानिक तैयारी

Nauni University Cannabis Research: हिमाचल प्रदेश को 'ग्रीन टू गोल्ड' मिशन के तहत एक बड़ी कामयाबी मिली है। डॉ. वाईएस परमार विश्वविद्यालय, नौनी ने औद्योगिक और औषधीय भांग के अनुसंधान के लिए राज्य की पहली अत्याधुनिक लैब स्थापित की है।
Published on: 13 July 2026
Bhang Ki Kheti: अब 'अवैध' नहीं, हिमाचल को 'गोल्ड' बना कर देगीभांग की खेती ! नौनी यूनिवर्सिटी ने शुरू की वैध खेती के लिए बड़ी वैज्ञानिक तैयारी

Bhang Ki Kheti: हिमाचल प्रदेश सरकार के महत्वाकांक्षी ‘ग्रीन टू गोल्ड’ मिशन को रफ्तार देने के लिए डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी ने एक बड़ा कदम उठाया है। विश्वविद्यालय ने राज्य में औद्योगिक भांग की वैध और नियंत्रित खेती को बढ़ावा देने के लिए एक अत्याधुनिक ‘कैनबिस क्वालिटी टेस्टिंग एंड रिसर्च लेबोरेटरी’ की स्थापना की है।

यह प्रयोगशाला हिमाचल प्रदेश में भांग को अवैध व्यापार से निकालकर एक वैध, अनुसंधान-आधारित और आर्थिक रूप से मूल्यवान संसाधन में बदलने का मुख्य वैज्ञानिक आधार बनेगी। यह उपलब्धि ऐसे समय में मिली  है जब राज्य सरकार औद्योगिक भांगकी नियंत्रित खेती के लिए नियम और नीतियां तैयार कर रही है। सरकार का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हिमाचल में उगाई जाने वाली भांग में टेट्राहाइड्रोकैनाबिनोल (THC) की मात्रा 0.3 प्रतिशत से कम हो।

अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार, 0.3 प्रतिशत से कम टीएचसी वाली भांग गैर-नशीली होती है और इसका उपयोग किसी भी तरह के नशे के लिए नहीं किया जा सकता है। हालांकि, यह फाइबर, बीज, दवाओं और वेलनेस उत्पादों के निर्माण के लिए बेहद उपयोगी मानी जाती है।

बता दें कि पारंपरिक रूप से भांग को केवल अवैध नशीले पदार्थों के व्यापार से जोड़कर देखा जाता रहा है, लेकिन अब वैश्विक स्तर पर इसके औषधीय गुणों को पहचान मिल रही है। दर्द प्रबंधन, सूजन नियंत्रण और विभिन्न प्रकार की दवाओं के निर्माण में भांग का बड़े पैमाने पर उपयोग हो रहा है। इसके साथ ही औद्योगिक भांग का उपयोग कपड़ा, परिधान, कागज, पैकेजिंग और कई अन्य पर्यावरण-अनुकूल उद्योगों में तेजी से बढ़ रहा है।

राज्य सरकार का अनुमान है कि इस खेती को वैध और पारदर्शी बनाकर हिमाचल प्रदेश सालाना 1,000 करोड़ रुपये से लेकर 2,000 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व कमा सकता है। इस बदलाव को वैज्ञानिक मजबूती देने के लिए नौनी विश्वविद्यालय को औषधीय भांग अनुसंधान, गुणवत्ता परीक्षण और जर्मप्लाज्म मैपिंग के लिए प्रमुख संस्थान के रूप में नामित किया गया है।

विश्वविद्यालय ने इस फसल पर आधिकारिक रूप से शोध कार्य शुरू करने के लिए आवश्यक वैधानिक लाइसेंस के लिए भी आवेदन कर दिया है। नवनिर्मित प्रयोगशाला में उन्नत विश्लेषणात्मक उपकरण लगाए गए हैं, जो कैनबिनोइड्स, टेरपेन्स और फ्लेवोनोइड्स जैसे फाइटोकेमिकल्स की सटीक प्रोफाइलिंग करने में सक्षम हैं। वैज्ञानिक अब हिमाचल के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में पाई जाने वाली स्वदेशी भांग की किस्मों का दस्तावेजीकरण और संरक्षण करेंगे।

मीडिया  रिपोर्ट के मुताबिक अनुसंधान निदेशक डॉ. देवीना वैद्य ने बताया कि इस परियोजना का एक मुख्य उद्देश्य मुख्य कैनबिनोइड्स—टीएचसी (THC) और कैनाबीडियोल (CBD) की सांद्रता और अनुपात के आधार पर उत्कृष्ट भांग के जर्मप्लाज्म की पहचान करना है। इसके लिए वैज्ञानिक टीमों द्वारा विस्तृत फील्ड सर्वे, जियो-टैगिंग और प्राकृतिक रूप से उगने वाली भांग का रासायनिक विश्लेषण किया जा रहा है।

शोधकर्ता इन जानकारियों के आधार पर भांग की किस्मों को सीबीडी-प्रधान, टीएचसी-प्रधान, संतुलित टीएचसी-सीबीडी और कम टीएचसी वाली औद्योगिक किस्मों में वर्गीकृत करेंगे। इसके अलावा, विश्वविद्यालय भांग की किस्मों का विस्तृत रूपात्मक (Morphological) और आणविक (Molecular) लक्षण वर्णन भी करेगा। इस पूरी कवायद से हिमाचल प्रदेश को अपनी पहली व्यापक डेटाबेस रिपोर्ट मिलेगी, जिसमें भांग के कैनबिनोइड प्रोफाइल, आनुवंशिक विविधता और भौगोलिक वितरण की जानकारी होगी। यह डेटा भविष्य की नीतियों और शोध के लिए एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक आधार प्रदान करेगा।

रिपोर्ट के मुताबिक  विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एच.एस. बवेजा ने कहा कि उत्कृष्ट टीएचसी और सीबीडी युक्त जर्मप्लाज्म की पहचान से भविष्य में औषधीय और औद्योगिक भांग की नई किस्में विकसित करने में मदद मिलेगी। इन अनूठी आनुवंशिक संपत्तियों को राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (NBPGR) के पास पंजीकृत कराया जाएगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस शोध से मिलने वाले वैज्ञानिक साक्ष्य सरकार को सही नीतिगत निर्णय लेने में मदद करेंगे और किसानों के लिए उच्च मूल्य वाली खेती के जरिए आजीविका के नए अवसर पैदा करेंगे।

नौनी विश्वविद्यालय औद्योगिक भांग के लिए एक सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) आधारित ‘रिसर्च-टू-मार्केट’ मॉडल पर भी काम कर रहा है। इस व्यवस्था के तहत विश्वविद्यालय भूमि, आनुवंशिक संसाधन, अनुसंधान विशेषज्ञता और परीक्षण सुविधाएं प्रदान करेगा, जबकि निजी भागीदार निवेश, आधुनिक प्रसंस्करण बुनियादी ढांचा, उन्नत तकनीक और बाजार तक पहुंच सुनिश्चित करेंगे।

कुलपति डॉ. बवेजा ने वैश्विक बाजार का हवाला देते हुए कहा कि वर्ष 2030 तक वैश्विक औद्योगिक भांग और कैनबिस बाजार के 125 बिलियन डॉलर से अधिक होने का अनुमान है। ऐसे में हिमाचल प्रदेश का यह कदम मूल्य श्रृंखला में रोजगार के अवसर पैदा करेगा, किसानों की आय बढ़ाएगा और राज्य को वैज्ञानिक भांग अनुसंधान के क्षेत्र में देश का अग्रणी केंद्र बनाकर स्थापित करेगा।

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