Delhi Medical Scam ACB Investigation: दिल्ली के ₹700 करोड़ के कथित स्वास्थ्य घोटाले में एक बड़ा और चौंकाने वाला मोड़ सामने आया है। एंटी करप्शन ब्रांच (ACB) ने दिल्ली की एक विशेष अदालत में जानकारी दी है कि इस मामले से संबंधित अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील फाइलों को साजिश के तहत जानबूझकर नष्ट कर दिया गया है। जांच एजेंसी के अनुसार, यह कदम अपराध के सबूतों को मिटाने और जांच को गुमराह करने की नीयत से उठाया गया है।
इंडियन एक्सप्रेस हिंदी की एक रिपोर्ट के मुताबिक नष्ट की गई फाइलें डायरेक्टरेट जनरल ऑफ हेल्थ सर्विसेज (DGHS) और सेंट्रल प्रोक्योरमेंट एजेंसी (CPA) द्वारा की गई खरीदारी से सीधे तौर पर जुड़ी हुई थीं। CPA दिल्ली सरकार के अस्पतालों और विभिन्न स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए दवाओं, इंजेक्शनों और आवश्यक मेडिकल उपकरणों की खरीद और आपूर्ति के लिए जिम्मेदार नोडल एजेंसी है।

रिपोर्ट के मुताबिक ACB की जांच में यह तथ्य उजागर हुआ है कि इन फाइलों में एक्स-रे मशीन, सी-आर्म मशीन और लिनन की बोलियों (बिड्स) से संबंधित पूरी जानकारी दर्ज थी। इनमें उन अधिकारियों के नाम और हस्ताक्षर भी शामिल थे, जिन्होंने बिड दस्तावेज तैयार किए, निविदा शर्तें तय कीं और तकनीकी तथा वित्तीय मूल्यांकन किया था।
जांच एजेंसी ने इस बहुचर्चित मामले में मुख्य आरोपियों की भूमिका को रेखांकित किया है। मामले में पूर्व DGHS प्रमुख डॉक्टर वत्सला अग्रवाल, पूर्व CPA डिप्टी कंट्रोलर ऑफ अकाउंट्स नीरज चोपड़ा और पूर्व CPA हेड ऑफ ऑफिस डॉक्टर विनोद कुमार रंगा मुख्य आरोपी बनाए गए हैं। कानूनी कार्यवाही के तहत अदालत ने सोमवार, 17 अगस्त को डॉक्टर विनोद कुमार रंगा की नियमित जमानत याचिका को खारिज कर दिया।
इसके अगले ही दिन, मंगलवार 18 अगस्त को विशेष न्यायाधीश विद्या प्रकाश ने डॉक्टर वत्सला अग्रवाल को मेडिकल आधार पर 4 सप्ताह की अंतरिम जमानत प्रदान कर दी। वत्सला अग्रवाल ने अपनी जमानत याचिका में हाइपरटेंशन, डायबिटीज, पैल्पिटेशन और रीढ़ की हड्डी में चोट जैसी स्वास्थ्य समस्याओं का हवाला दिया था। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि आरोपी की वर्तमान चिकित्सीय स्थिति को देखते हुए, मामले के गुण-दोष पर विचार किए बिना, विशुद्ध रूप से मानवीय आधार पर यह अंतरिम जमानत दी जा रही है।
दरअसल यह पूरा मामला सतर्कता (विजिलेंस) विभाग की एक शिकायत पर आधारित है, जिसे 2 जून को औपचारिक प्राथमिक रिपोर्ट (F.I.R.) में तब्दील किया गया था। इस मामले में दवाओं और चिकित्सा उपकरणों के फंड में बड़े पैमाने पर हेरफेर तथा टेंडर प्रक्रिया में गंभीर गड़बड़ी के आरोप लगाए गए हैं। मामले में पहली गिरफ्तारी 18 जून को हुई थी। दवा आपूर्तिकर्ता और मुख्य आरोपियों में शामिल राजीव रंगीला एक अन्य जबरन वसूली के मामले में अग्रिम जमानत मिलने के बाद भारत से फरार हो चुका है।
पूर्व CPA प्रमुख डॉक्टर विनोद कुमार रंगा ने अपनी जमानत याचिका में यह दावा किया था कि रंगीला के लापता हो जाने के कारण जांच प्रभावित हुई है। उन्होंने यह भी तर्क दिया था कि CPA के स्तर पर लिए गए सभी फैसले पूर्व DGHS प्रमुख डॉक्टर वत्सला अग्रवाल की मंजूरी के बाद ही लागू किए गए थे।
ACB द्वारा अदालत के समक्ष प्रस्तुत की गई रिपोर्ट के अनुसार, आरोपियों ने आपस में मिलीभगत करके टेंडर प्रक्रिया में ‘कार्टिलाइजेशन’ (गुटबंदी) की और अपनी मनपसंद कंपनियों को अनुचित लाभ पहुंचाते हुए टेंडर आवंटित किए। अन्य प्रतिस्पर्धी बिडर्स को प्रक्रिया से बाहर रखने के लिए टर्नओवर और अनुभव के मानदंडों को असामान्य रूप से बहुत ऊंचा रखा गया था। इसके अलावा, अन्य वेंडर्स के भुगतानों को लगभग दो साल तक रोक कर रखा गया।
जांच में वित्तीय हेराफेरी के चौंकाने वाले तरीके सामने आए हैं। सरकारी फंड्स को ऐसे हजारों बैंक खातों में ट्रांसफर किया गया, जिनका DGHS या CPA की आपूर्ति प्रक्रिया से कोई सीधा संबंध नहीं था। वहां से करोड़ों रुपये नकद निकाले गए या अन्य खातों में स्थानांतरित कर दिए गए, जिससे ₹700 करोड़ के सरकारी धन का बड़ा गबन किया गया। ACB की टीम इस पूरे मामले की गहन जांच जारी रखे हुए है।


















