Global Food Fertilizer Financial Crisis: भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में एक बड़ी चेतावनी दी है। थिंक टैंक- एशिया सोसाइटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट के एक कार्यक्रम में बातचीत के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वैश्विक परिस्थितियों और आर्थिक परिदृश्य पर बात करते हुए एक मिनट के भीतर पूरी स्थिति को स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने आधिकारिक तौर पर यह रेखांकित किया है कि वर्तमान में दुनिया ऊर्जा, खाद्य, उर्वरक और वित्तीय संकट की चपेट में है।
वस्तुतः ये संकट केवल आने वाले नहीं हैं, बल्कि दुनिया में पूरी तरह आ चुके हैं और इससे वैश्विक स्तर पर व्यापक असर पड़ रहा है। इस वैश्विक उथल-पुथल से भारत भी अछूता नहीं है। जयशंकर ने कहा है कि दुनिया में आने वाले कुछ महीनों के अंदर एक ‘बड़ा खाद्य संकट’ पैदा होने वाला है। उन्होंने इसकी वजह बताई और साथ ही सलाह दी कि कैसे इस संकट के पैदा होने से पहले ही इसे खत्म किया जा सकता है।
जब खाने की बात आती है तो हम आज वह स्थिति देख रहे हैं, जहां कुछ बड़े अनाज निर्यातक अपना खाद्यान्न भेज नहीं पाएंगे। खासकर काला सागर के जरिए। हम पहले ही फर्टिलाइजर की भारी कमी देख रहे हैं, क्योंकि इसके अधिकतर उत्पादक पश्चिम एशिया और रूस में हैं। उनका फर्टिलाइजर उत्पादन प्रभावित हुआ है। इसके ऊपर हम सुपर-अल नीनो की स्थिति भी देख रहे हैं।”
उन्होंने आगे कहा, “मैं नहीं समझता कि यह जो कुछ हो रहा है वह सोचा-समझा था या नहीं, लेकिन नीति निर्माता यह नहीं कह सकते कि यह स्थिति सोची-समझी नहीं थी। उन्हें अपने आप को उस जगह पर रखकर देखना चाहिए, जहां देश संकट में हैं और सोचना चाहिए कि उनके फैसलों का दुनिया पर क्या असर हो सकता है। देशों को इतना आत्म-केंद्रित नहीं होना चाहिए कि आप अपनी ही दुनिया में रह कर फैसले लेते रहें और कहें कि हमारी मंशा आपका जीवन संकट में डालने की नहीं थी।”
उल्लेखनीय है कि भारत अपनी उर्वरक जरूरतों के लिए व्यापक रूप से आयात पर निर्भर है। देश की लगभग 30 प्रतिशत उर्वरक आपूर्ति, जिसमें सल्फर, अमोनिया और एलएनजी शामिल हैं, सीधे तौर पर प्रभावित क्षेत्रों से आती है। विदेशी निर्भरता अधिक होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस और कच्चे माल की किल्लत का सीधा और गंभीर असर भारत के कृषि और उर्वरक क्षेत्र पर पड़ रहा है।
इसके साथ ही प्राकृतिक आपदाएं और मौसम का बदलता मिजाज इस स्थिति को और ज्यादा विकराल बना रहे हैं। वैश्विक स्तर पर ‘सुपर अल नीनो’ का प्रभाव शुरू हो चुका है, जिसने मानसून चक्र को बुरी तरह प्रभावित किया है। भारत में ही 21 सितंबर तक मानसून की बारिश में 15 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। सुपर अल नीनो का यह नकारात्मक प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे एशिया क्षेत्र में इसके गंभीर परिणाम देखे जा रहे हैं।
एक तरफ जहां अल नीनो और उर्वरकों की कमी के कारण कृषि उत्पादन संकट में है, वहीं वित्तीय बाजारों में भी भारी उथल-पुथल मची हुई है। जब इस तरह के बहुआयामी संकट पैदा होते हैं, तो निवेशक उभरते बाजारों से अपना पैसा निकालना शुरू कर देते हैं। वित्तीय अनिश्चितता के माहौल में निवेशक सुरक्षित ठिकाने की ओर रुख करते हैं, जिसके चलते उभरते बाजारों से पूंजी निकलकर अमेरिका की तरफ जा रही है। शेयर बाजारों में जारी गिरावट और अस्थिरता इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।
वैश्विक खाद्य सुरक्षा के मोर्चे पर सबसे बड़ा खतरा रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध तथा ब्लैक सी क्षेत्र के तनाव के कारण खड़ा हो गया है। विदेश मंत्री के वक्तव्य के अनुसार, ब्लैक सी में चल रही इस जंग की वजह से दुनिया भर में भुखमरी का दायरा तेजी से बढ़ सकता है। आंकड़ों के लिहाज से रूस विश्व में गेहूं का सबसे बड़ा निर्यातक है, जबकि यूक्रेन मक्के के सबसे बड़े निर्यातकों में से एक है।
यदि रूस और यूक्रेन दोनों के आंकड़ों को एक साथ जोड़कर देखा जाए, तो पूरी दुनिया के कुल खाद्यान्न का 27 प्रतिशत हिस्सा केवल इन दो देशों से ही आता है। इन दोनों देशों के बीच छिड़े संघर्ष की वजह से पूरी दुनिया में अनाज की भारी किल्लत पैदा हो रही है। खाद्यान्न आपूर्ति में आने वाली इस बाधा के कारण दुनिया के विभिन्न हिस्सों में पैनिक की स्थिति उत्पन्न हो रही है, जिससे वैश्विक खाद्य संकट का खतरा और बढ़ गया है।
दूसरी तरफ, हमारी सामाजिक और आर्थिक जीवनशैली भी इस तरह की आपातकालीन स्थितियों के लिए तैयार नहीं है। बचपन से ही लोगों को पढ़ाई करने, निवेश करने, म्यूचुअल फंड, शेयर बाजार, सोना और चांदी जैसी संपत्तियों में पैसा लगाने की सीख दी जाती है। नतीजतन, कई लोगों के पास कई मकान, शेयर, सोना और चांदी तो मौजूद हैं, लेकिन आपातकालीन सर्वाइवल की बुनियादी तैयारी शून्य के बराबर है।
यदि किसी आम व्यक्ति से यह पूछा जाए कि उसके घर में नमक, आटा या दाल के कितने पैकेट उपलब्ध हैं और उसके पास आपातकालीन जीवन रक्षा की क्या योजना है, तो अधिकतम जवाब 7 दिन, 10 दिन या 15 दिन का ही मिलता है। समाज का पूरा ढांचा संपत्ति और जायदाद इकट्ठा करने के लिए तैयार किया गया है, जबकि वास्तव में बुनियादी संकट के समय जीवित रहने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने जैसे मूलभूत विषयों पर कभी ध्यान ही नहीं दिया गया।


















