Vaman Dwadashi Mela Sarahan: हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के पच्छाद क्षेत्र में स्थित सराहां कस्बा प्रतिवर्ष एक अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन का साक्षी बनता है। यहां आयोजित होने वाला राज्य स्तरीय वामन द्वादशी मेला न केवल स्थानीय निवासियों की आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह क्षेत्र की समृद्ध लोक संस्कृति, परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत को भी जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है। तीन दिनों तक चलने वाला यह भव्य आयोजन मुख्य रूप से भगवान विष्णु के पांचवें अवतार, भगवान वामन को समर्पित है।
सराहां में आयोजित होने वाले इस मेले में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ कई सांस्कृतिक और व्यापारिक गतिविधियां भी देखने को मिलती हैं। पच्छाद क्षेत्र और आसपास के ग्रामीण इलाकों से बड़ी संख्या में लोग इस वार्षिक उत्सव में भाग लेने पहुंचते हैं। यह मेला सामाजिक मिलनसारिता और स्थानीय लोकजीवन की जीवंतता को दर्शाता है, जहां देव परंपराओं और आधुनिक सामाजिक सहभागिता का एक अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है।
1928 में मिला मेले को व्यवस्थित स्वरूप
सराहां क्षेत्र में भगवान वामन की पूजा-अर्चना और देव परंपराओं से जुड़ी मान्यताएं अत्यंत प्राचीन काल से चली आ रही हैं। हालांकि, इस मेले के इतिहास में वर्ष 1928 का एक विशेष स्थान है। तत्कालीन सिरमौर रियासत के शासनकाल के दौरान स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों और व्यापारियों के सामूहिक प्रयासों से इस मेले को एक संगठित और बड़े स्वरूप में आयोजित करने की शुरुआत की गई थी।
वर्ष 1928 के बाद से मेले के स्वरूप में व्यापक विस्तार हुआ। धार्मिक पूजा-पाठ के अतिरिक्त, दूर-दराज के क्षेत्रों से व्यापारियों का आगमन, स्थानीय हस्तशिल्प और कृषि उत्पादों की प्रदर्शनियां तथा विभिन्न प्रकार की खेलकूद प्रतियोगिताएं भी इस आयोजन का अभिन्न अंग बन गईं। समय के साथ यह मेला पूरे पच्छाद क्षेत्र के लिए एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र और वार्षिक मिलन स्थल के रूप में स्थापित हो गया।
ऐतिहासिक शिरगुल तालाब और नौका विहार की परंपरा
वामन द्वादशी मेले का सबसे मुख्य और आकर्षण का केंद्र भगवान वामन की पारंपरिक पालकी शोभायात्रा और नौका विहार है। लोक मान्यताओं और रीति-रिवाजों के अनुसार, मेले के दौरान भगवान वामन की भव्य पालकी को पारंपरिक वाद्ययंत्रों और ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच नगर के मध्य स्थित ऐतिहासिक शिरगुल तालाब तक ले जाया जाता है।
शिरगुल तालाब पहुंचने के पश्चात, भगवान की पालकी को अत्यंत सुंदर ढंग से सजाई गई एक नाव में विराजमान किया जाता है। इसके बाद जलक्रीड़ा अथवा नौका विहार की पारंपरिक प्रक्रिया संपन्न की जाती है। इस अलौकिक दृश्य और देव परंपरा का साक्षी बनने के लिए तालाब के चारों ओर हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। आसपास के अनेक गांवों से लोग भगवान वामन के दर्शन और इस ऐतिहासिक परंपरा को देखने के लिए सराहां पहुंचते हैं।
वामन द्वादशी मेले का पौराणिक संदर्भ
इस मेले के आयोजन के पीछे भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुड़ी पौराणिक कथा निहित है। धार्मिक ग्रंथों एवं मान्यताओं के अनुसार, असुर राजा बलि अत्यंत पराक्रमी और दानवीर शासक थे। उन्होंने अपने बल और तपोबल से देवराज इंद्र को पराजित कर स्वर्गलोक पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था।
समस्त देवताओं की रक्षा और स्वर्ग का राज्य पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से भगवान विष्णु ने ‘वामन’ यानी एक बौने ब्राह्मण के रूप में अपना पांचवां अवतार धारण किया। भगवान वामन राजा बलि द्वारा आयोजित किए जा रहे यज्ञ स्थल पर पहुंचे और उनसे दान स्वरूप केवल तीन पग भूमि की याचना की। राजा बलि ने उनकी यह छोटी सी मांग सहर्ष स्वीकार कर ली।
भगवान वामन और राजा बलि की कथा
दान का संकल्प पूरा होते ही भगवान वामन ने अपना विराट स्वरूप प्रकट किया। उन्होंने अपने पहले पग में संपूर्ण पृथ्वी लोक को और दूसरे पग में स्वर्ग लोक को नाप लिया। जब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान शेष नहीं बचा, तो वचनबद्ध और दानवीर राजा बलि ने अपना सिर भगवान वामन के चरणों में आगे झुका दिया।
भगवान वामन राजा बलि की इस निष्ठा, वचनबद्धता और दानशीलता से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा बलि को पाताल लोक का स्वामी बना दिया और उनकी रक्षा का वरदान दिया। इसी पावन पौराणिक घटना के स्मरण में वामन द्वादशी का पर्व मनाया जाता है।
सराहां में वामन अवतार का विशेष धार्मिक महत्व
सराहां स्थित ऐतिहासिक मंदिर में भगवान विष्णु के विविध स्वरूपों के साथ भगवान वामन की विशेष विधि-विधान से पूजा की जाती है। भगवान वामन के प्राकट्य और उनकी पौराणिक कथाओं से जुड़ाव होने के कारण सराहां में वामन द्वादशी का आयोजन अत्यंत श्रद्धा और धूमधाम के साथ किया जाता है।
यह मेला केवल एक धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सिरमौर और पच्छाद की लोक संस्कृति, वाद्ययंत्रों की धुनों, ऐतिहासिक धरोहरों और देव परंपराओं को एक मंच पर प्रस्तुत करता है। वर्तमान में वामन द्वादशी मेला सराहां की सांस्कृतिक पहचान का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है, जो पीढ़ियों से चली आ रही हिमाचल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को निरंतर संजोए हुए है।
पहले यह मेला केवल स्थानीय स्तर पर ही आयोजित किया जाता था। समय के साथ इसका दायरा बढ़ा और यह ब्लॉक स्तर से विकसित होता हुआ जिला स्तरीय मेले का रूप लेने लगा। आज अपनी सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान के कारण इसका स्वरूप राज्य स्तरीय हो चुका है।


















