Himachal Outsource Employees Policy: हिमाचल प्रदेश में आउटसोर्स कर्मचारियों को रोजगार तो मिल गया, लेकिन उसके रोजगार के साथ उसका भविष्य शायद कहीं आउट ऑफ़ सोर्स हो गया। नौकरी सरकारी दफ्तर में, काम सरकार का, जिम्मेदारी सरकार की और कर्मचारी की चिंता भी सरकार के दरवाजे पर, बस नौकरी की स्थिरता को छोड़कर। जैसे कोई किराए का कमरा दे दे, लेकिन चाबी अपने पास रख ले।
हिमाचल में आउटसोर्स व्यवस्था का विस्तार 2005 से 2007 के बीच शुरू हुआ। स्थायी सरकारी भर्तियों के विकल्प के तौर पर बिजली बोर्ड, स्वास्थ्य, जल शक्ति, शिक्षा और दूसरे विभागों में ठेका और आउटसोर्स मॉडल धीरे-धीरे पैर पसारने लगा। शुरुआत में इसे सीमित अवधि की व्यवस्था माना गया था। शायद तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि यह ‘अस्थायी व्यवस्था’ आगे चलकर हजारों परिवारों के जीवन का स्थायी सहारा बन जाएगी, ठीक वैसे ही जैसे अस्थायी तंबू कभी-कभी स्थायी घर बन जाता है, बस छत पर सरकारी मुहर नहीं लगती।
समय बीतता गया, कर्मचारी आते गए, सेवाएं बढ़ती गईं और आउटसोर्स व्यवस्था सरकारी मशीनरी का ऐसा हिस्सा बन गई, जिसे हटाना भी मुश्किल और स्थायी करना भी मुश्किल दिखाई देता है। जैसे कोई पुराना फर्नीचर जो न फेंका जा सके, न नया खरीदा जा सके…., बस बीच में रख दिया जाए।
साल 2017 में तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वर्गीय वीरभद्र सिंह के कार्यकाल के अंतिम दौर में करीब 32 हजार आउटसोर्स कर्मचारियों का मुद्दा स्थाई निति बनाने की मांग के साथ सामने आया। उस समय सरकार की ओर से यह बात भी कही गई कि किसी कर्मचारी को पूरी जिंदगी आउटसोर्स व्यवस्था पर रखना उचित नहीं है। नीति बनाने की बात हुई, दिशा-निर्देश आए और उम्मीद जगी कि शायद अब अस्थायी नौकरी को कोई स्थायी रास्ता मिलेगा।
लेकिन सरकारी नीति का सबसे खूबसूरत शब्द है—“जल्द।”
यह शब्द इतना लचीला है कि सात दिन से लेकर सात साल और 70 साल तक कहीं भी फिट हो सकता है। जैसे कोई रबर बैंड जो खींचने पर भी टूटता नहीं, बस और लंबा हो जाता है।
फिर प्रदेश में सत्ता बदली और जयराम ठाकुर मुख्यमंत्री बने। आउटसोर्स कर्मचारियों की नीति का मुद्दा फिर उठा। बैठकों और मंचों पर कई बड़े बड़े आश्वासन मिले। तत्कालीन मंत्री महेंद्र सिंह के नेतृत्व में नीति बनाने के लिए कमेटी गठित करने की घोषणा भी हुई।
कर्मचारी ने फिर उम्मीद बांधी। लेकिन शायद सरकारी फाइलों की अपनी गति होती है। कर्मचारी रोज कार्यालय पहुंचता रहा, मगर उसकी स्थायी नीति फाइलों के रास्ते पर ही चलती रही, जैसे कोई ट्रेन जो स्टेशन पर खड़ी रहे, लेकिन समय-सारिणी में “जल्द आएगी” लिखा हो।
साल 2021 में स्थिति का एक और अध्याय खुला। सरकार को आउटसोर्स कर्मचारियों को समय पर वेतन दिलाने के लिए अलग दिशा-निर्देश जारी करने पड़े। सरकारी दस्तावेज में दर्ज हुआ कि कई कर्मचारियों को चार से पांच महीने तक वेतन नहीं मिला। अर्थात कर्मचारी सरकार का काम समय पर करे, लेकिन उसका वेतन सरकारी व्यवस्था की सुविधा के हिसाब से मिले। काम तुरंत, पैसा “जब सुविधा हो।”
फिर सत्ता बदली और मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की सरकार आई। आउटसोर्स कर्मचारियों के भविष्य को लेकर चर्चाओं का एक और दौर शुरू हुआ। लेकिन अप्रैल 2026 में विधानसभा में सरकार का रुख साफ था। सरकार ने कहा कि आउटसोर्स कर्मचारी नियमित सरकारी कर्मचारी नहीं हैं और उनके लिए नौकरी की सुरक्षा अथवा दीर्घकालीन संविदा की अलग नीति बनाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। उस समय करीब 13 हजार आउटसोर्स कर्मचारियों का आंकड़ा सामने आया।
फिर हाईकोर्ट ने भी इस पूरी व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल उठाए। नियमित भर्ती के बजाय आउटसोर्सिंग के सहारे सरकारी व्यवस्था चलाने पर अदालत ने गंभीर टिप्पणियां कीं और आउटसोर्स भर्ती पर रोक तक लगानी पड़ी। अदालत के समक्ष यह सवाल भी आया कि सरकारी काम के लिए स्थायी पदों की जगह आउटसोर्सिंग का रास्ता क्यों अपनाया जा रहा है।
और अब अक्टूबर 2026 में फिर सरकार का सुर बदलता दिखाई दे रहा है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा है कि आउटसोर्स कर्मचारियों के हितों की रक्षा और उनके शोषण को रोकने के लिए नीति जल्द लागू की जाएगी।
बस यही तो हिमाचल की कहानी है।
2005-07 में व्यवस्था शुरू हुई।
2017 में 32 हजार कर्मचारी और नीति का वादा आया।
जयराम ठाकुर के दौर में कमेटी और आश्वासन आए।
2021 में वेतन के लिए दिशा-निर्देश आए।
2026 में विधानसभा में करीब 13 हजार का आंकड़ा आया।
हाईकोर्ट ने सवाल उठाए।
और अब फिर नीति ‘जल्द’ आने वाली है।
कर्मचारी वहीं है।
उसकी नौकरी वहीं है।
उसकी चिंता भी वहीं है।
बस सरकार का आश्वासन हर बार नया है। जैसे कोई पुराना रिकॉर्ड जो हर चुनावी सीजन में दोबारा बजाया जाता है।
आउटसोर्स कर्मचारी अब सिर्फ नियमितीकरण नहीं मांग रहा। वह पूछ रहा है कि सेवा की निरंतरता कौन सुनिश्चित करेगा? समय पर वेतन कौन देगा? ईपीएफ-ईएसआई जैसे अधिकारों की गारंटी कौन देगा? एजेंसी बदलने पर उसकी नौकरी का क्या होगा? वर्षों की सेवा का मूल्य क्या होगा?
क्योंकि सरकारी अस्पताल में मरीज यह नहीं पूछता कि नर्स आउटसोर्स है या नियमित। सरकारी कार्यालय में फाइल यह नहीं पूछती कि उसे आगे बढ़ाने वाला कर्मचारी किस एजेंसी के माध्यम से आया है। बिजली व्यवस्था को भी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कर्मचारी के नियुक्ति पत्र पर किसका नाम लिखा है।
काम सरकारी है तो भविष्य इतना निजी क्यों?
और अब चुनावी वर्ष के अंतिम दौर में एक बार फिर नीति का पासा फेंका गया है।
शायद उम्मीद है कि हजारों आउटसोर्स कर्मचारी इस बार भी उस पासे के पीछे दौड़ पड़ेंगे।
लेकिन सवाल यह है—
क्या इस बार ‘नीति जल्द आएगी’ सचमुच नीति बनेगी, या फिर अगले चुनाव तक यही वाक्य फिर से सरकारी घोषणा का सबसे भरोसेमंद आउटसोर्स कर्मचारी बन जाएगा?
क्योंकि आउटसोर्स कर्मचारी को अब घोषणा नहीं चाहिए।
उसे अपने भविष्य का स्थायी सोर्स चाहिए।
कर्मचारी आउटसोर्स हो सकता है, उसका भविष्य नहीं।


















