KSLF 2026: ऐतिहासिक कसौली क्लब मे आयोजित किए जा रहे 15वें खुशवंत सिंह लिट फेस्ट 2026 में मणिपुर हिंसा पर चर्चा ने मीडिया और व्यवस्था, दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया। Manipur: Stories The Fire Could Not Burn सत्र में मणिपुर की पत्रकार-लेखिका होइनु हाउज़ेल ने सवाल रखा कि जिस तस्वीर ने देश की अंतरात्मा को झकझोरा, वह न आती तो क्या मणिपुर को संसद में जगह मिलती। उनके मुताबिक संसद में बहस घटना के बहुत बाद हुई।
अपनी किताब स्टोरीज़ दैट द फायर कुड नॉट बर्न पर बोलते हुए हाउज़ेल ने कहा कि सुरक्षा की गारंटी छिन जाए तो इंसान सवाल करने लगता है। सत्र का संचालन प्रकाशन जगत की वरिष्ठ हस्ती प्रीति गिल ने किया। हाउज़ेल ने सत्र में बताया गया कि मई 2023 में भड़की जातीय हिंसा में 300 से अधिक लोग मारे गए और लगभग 60,000 विस्थापित हुए।

हाउज़ेल ने साफ़ कहा कि यह कुकी-ज़ोमी-मिज़ो समुदाय की कहानी है। यह भले ही प्रमुख नैरेटिव न हो, पर उस समुदाय के जिए हुए अनुभव पर टिकी है जिसे उनके शब्दों में बार-बार चुप कराया गया। हिंसा को साढ़े चार साल बीत चुके हैं और हाउज़ेल के अनुसार शुरुआती कठिनाई अब “गहरे चिंतन, निराशा और मोहभंग” में बदल चुकी है।
इंटरनेट बंद, खबरें नियंत्रित
हाउज़ेल ने कहा कि मणिपुर में तुरंत इंटरनेट बंद कर दिया गया, इसलिए बाहर आई खबरें बहुत नियंत्रित और सेंसर की हुई थीं। वही खबरें दिल्ली के न्यूज़ डेस्क तक पहुंचीं। उनका आरोप था कि पूर्वोत्तर की खबरें दिल्ली के लिए तभी खबर बनती हैं जब वे बहुत हिंसक हों, और हिंसा के आदी न्यूज़रूम कई बार स्रोत समझे या क्रॉस-चेक किए बिना खबर चला देते हैं। इस प्रक्रिया में गलत सूचनाएं फैलीं और एजेंडा-आधारित बातें हुईं।
उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया न होता तो शायद मणिपुर को वह ध्यान न मिलता जो मिला। बलात्कार के बाद नग्न घुमाई गई दो महिलाओं की तस्वीर ने ही देश की अंतरात्मा को छुआ, और इसके बाद ही संसद में बहस हुई। सत्र में यह भी याद दिलाया गया कि यह घटना सामने आने से कुछ महीने पहले हो चुकी थी।
“शब्दों का वज़न होता है”
हाउज़ेल ने कहा कि “नार्को-टेररिस्ट”, “पोस्ता उगाने वाले” और “अवैध प्रवासी” जैसे शब्द मीडिया ने सुविधा से उठा लिए। दूर बैठे कॉपी एडिटर के लिए ये सिर्फ़ शब्द हैं, पर जिन पर चिपकाए जाते हैं उनके लिए ये भारी और विचलित करने वाला बोझ हैं।
एक रिपोर्टर, आठ राज्य
उन्होंने कहा कि संस्थानों में स्टाफ घट रहा है। पहले अलग-अलग राज्यों में रिपोर्टर होते थे, अब अक्सर असम में एक रिपोर्टर से पूरे पूर्वोत्तर को कवर करने की उम्मीद की जाती है, जबकि वहां आठ राज्य हैं और हर राज्य की गतिशीलता अलग है। उन्होंने इसे “खतरनाक रूप से अदूरदर्शी” बताया। उनके अनुसार खबर सिर्फ़ हिंसा से नहीं बननी चाहिए, पर लड़ाई और खून-खराबे के बिना कहानियां पर्याप्त योग्य नहीं मानी जातीं।
पत्रकारों की थकान पर उन्होंने कहा कि उनके पत्रकार मित्रों ने कवरेज से यह कहकर हाथ खड़े किए कि एक पक्ष को कवर करो तो दूसरा पक्षपात का आरोप लगाता है। तब उन्होंने ट्विटर पर अभियान चलाया और देश के सर्वोच्च पद को टैग किया। उन्होंने कहा कि पता नहीं सफल हुईं या नहीं, पर उन्हें लगा कि फ़र्ज़ निभाया, और वे टैग करती रहेंगी।
गुरुग्राम से चलाया आपात अभियान
हिंसा के समय हाउज़ेल गुरुग्राम में थीं। उनका घर जला दिया गया और परिवार को पड़ोसी राज्य भागना पड़ा। उन्होंने बताया कि शोक मनाने का समय नहीं मिला। वे आपात मोड में आ गईं और सशस्त्र बलों व सत्ता में बैठे लोगों को फ़ोन कर बार-बार पुष्टि करती रहीं। उनके माता-पिता सात-आठ घंटे अंधेरे में एक पड़ोसी के घर में इंतज़ार करते रहे। फिर उन्हें टुकड़ियों में सेना शिविरों में ले जाया गया और वहां से लोग विमान से बाहर निकले।
हाउज़ेल ने कहा कि सेना तुरंत हरकत में आई और उसके सभी शिविर राहत शिविरों की तरह इस्तेमाल हुए। उन्होंने बताया कि इस दौरान एक और संकट सामने आया। भागते लोगों के पास पहचान-पत्र नहीं थे और फ़ोन भी पीछे छूट गया था। हाउज़ेल ने अपनी जान-पहचान के लोगों से बात की और कई लोगों के लिए लिखित गारंटी दी, ताकि उन्हें उड़ान की अनुमति मिल सके। उन्होंने दोनों पक्षों की कहानियां दर्ज कीं और कहा कि पीड़ा और नुकसान का एहसास हर समुदाय में एक जैसा है।
पहाड़-घाटी की दरार और केंद्र की दूरी
हाउज़ेल ने कहा कि पूर्वोत्तर चीन, बांग्लादेश, म्यांमार और भूटान से सीमा साझा करता है और रणनीतिक रूप से अहम है। मणिपुर की म्यांमार से सीमा बहुत खुली है। उग्रवाद उनके लिए नई बात नहीं थी, पर इस बार पहाड़ों और घाटी का पूरी तरह बंट जाना अलग था। उनके अनुसार घाटी में मैतेई का दबदबा है और सत्ता का केंद्र वहीं है, जबकि पहाड़ों में कुकी, नागा, मिज़ो जैसी जनजातियां रहती हैं।
उन्होंने बताया कि यह दरार बरसों से चली आ रही थी और उसे कभी ठीक से संबोधित नहीं किया गया। इसके पीछे के कारणों में उन्होंने नेतृत्व का अभाव और केंद्र से भौगोलिक दूरी गिनाई। उन्होंने कहा कि दूरी के कारण पूर्वोत्तर के लोग केंद्र को “मालिक” मान बैठते हैं, जबकि भारत सबका है, और केंद्र की नीतियां ज़मीनी हकीकत से कटी होती हैं।
उन्होंने कहा कि आज़ादी के 79 साल बाद भी पूर्वोत्तर को पाठ्यपुस्तकों में औपचारिक जगह नहीं मिली, तो उसकी अनदेखी पर हैरानी कैसी। श्रोताओं से उन्होंने पूछा, “क्या भारत के किसी भी हिस्से में ऐसा होने दिया जाना चाहिए?” उनके अनुसार विभाजन आज भी साफ़ है, इंफाल से ज़्यादातर कुकी-ज़ोमी लोग जा चुके हैं और चुराचांदपुर से मैतेई भी।
“घर खोना, पहचान खोना है”
कश्मीर, पंजाब, फ़िलिस्तीन और अफ़ग़ानिस्तान का ज़िक्र करते हुए हाउज़ेल ने कहा कि घर खोने का एहसास दुनिया भर के विस्थापितों को जोड़ता है। उन्होंने कहा, “उसे खोना पहचान का खोना है, उम्मीद का खोना भी। यह अस्तित्व का संकट है।” उन्होंने उस पीढ़ी की चिंता जताई जो असुरक्षा और नुकसान के एहसास के साथ बड़ी हो रही है।



















