KSLF 2026: हिमाचल प्रदेश के कसौली में आयोजित खुशवंत सिंह लिटफेस्ट के दौरान पूर्वोत्तर मामलों के विशेषज्ञ और जाने-माने लेखक संजॉय हज़ारिका ने संपादक एवं प्रकाशक प्रीति गिल के साथ आयोजित सत्र “From Battlefield to Ballot Box” में मिज़ोरम के इतिहास और वहां की शांति प्रक्रिया पर विस्तार से बात की। हज़ारिका ने कहा कि देश में शांति और सद्भाव की उपलब्धियों का भी उसी तरह जश्न मनाया जाना चाहिए, जिस तरह अन्य ऐतिहासिक घटनाओं का मनाया जाता है।
उन्होंने मिजोरम के शांति समझौते का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके चार दशक पूरे होने के बावजूद देश के अन्य हिस्सों में इसे लेकर वैसी चर्चा या उत्सव देखने को नहीं मिला। हज़ारिका ने कहा कि मिजोरम की कहानी केवल उग्रवाद, हिंसा और राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिये से नहीं देखी जानी चाहिए। पूर्वोत्तर क्षेत्र पर अपने लंबे अनुभव का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि नई दिल्ली में इस क्षेत्र को देखने का नजरिया अक्सर राष्ट्रीय सुरक्षा, उग्रवाद और हिंसा तक सीमित रहा है, जबकि यहां के समाज, लोगों और उनके अनुभवों की व्यापक कहानी को समझना भी जरूरी है।

उन्होंने कहा कि मिजोरम में 1966 में उग्रवाद भड़का था। उस समय यह क्षेत्र ‘मिजो हिल्स’ जिले के रूप में जाना जाता था। वर्ष 1986 में मिजो शांति समझौता हुआ और लगभग चार दशक बाद भी यह शांति आज तक कायम है। हज़ारिका के मुताबिक, हिंसा से शांति तक पहुँचने की इस यात्रा में कई ऐसे पहलू हैं, जिन्हें देश के बाकी हिस्सों तक पहुँचाया जाना चाहिए।
60 साल पहले विद्रोह, 40 साल से शांति
हज़ारिका ने याद दिलाया कि 1966 में मिज़ो हिल्स में विद्रोह भड़का था। MNF ने लगभग पूरा इलाका अपने कब्जे में ले लिया था। इस साल शांति समझौते के 40 साल पूरे हो रहे हैं और यह समझौता अब तक कायम है। इसलिए मिज़ोरम को भारत का सबसे शांतिपूर्ण राज्य कहा जाता है। उन्होंने खेद जताया कि मिज़ोरम के बाहर इस वर्षगांठ का कोई जश्न नहीं मनाया गया। उन्होंने नई दिल्ली के उस नज़रिए पर भी सवाल उठाया जो पूर्वोत्तर को सिर्फ सुरक्षा, उग्रवाद और हिंसा के चश्मे से देखता है।
ललथनहवला की जीवनी के जरिए मिजोरम की कहानी
हज़ारिका ने मिजोरम के पूर्व मुख्यमंत्री ललथनहवला पर लिखी अपनी पुस्तक के बारे में बताया कि उन्होंने जीवनी के माध्यम से पूरे राज्य के राजनीतिक और सामाजिक बदलावों को सामने लाने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि ललथनहवला का जीवन कई महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़ा रहा और उनके अनुभवों के जरिए मिजोरम की उस यात्रा को समझा जा सकता है, जिसमें संघर्ष से लोकतांत्रिक राजनीति की ओर बदलाव आया।
उन्होंने बताया कि ललथनहवला मिजो नेशनल फ्रंट (MNF) से जुड़े रहे थे, लेकिन बाद में उन्होंने कांग्रेस का रास्ता अपनाया। हज़ारिका के अनुसार, उनके राजनीतिक जीवन में संघर्ष, जेल, पारिवारिक चुनौतियों और सत्ता के बदलाव जैसे कई पहलू शामिल थे, जो मिजोरम के समकालीन इतिहास को समझने में मदद करते हैं।
हज़ारिका ने कहा कि वह ललथनहवला को लंबे समय से जानते थे। पुस्तक तैयार करने के दौरान उन्होंने उनसे लगभग 200 बार बातचीत की। इसके अलावा उनके परिवार के सदस्यों, मित्रों और राजनीतिक विरोधियों से भी बात की, ताकि कहानी को केवल एक व्यक्ति के नजरिये से नहीं, बल्कि उसके आसपास के लोगों के अनुभवों के साथ प्रस्तुत किया जा सके। उन्होंने कहा कि ऐसी जीवनी लिखते समय केवल संबंधित व्यक्ति की कहानी पर्याप्त नहीं होती, बल्कि उसके आसपास के लोगों और यहां तक कि उसके विरोधियों के अनुभवों को भी समझना जरूरी है।
दिल्ली के साथ संबंध और राज्य के विकास की चुनौती
मिजोरम जैसे छोटे राज्य के सामने मौजूद आर्थिक और बुनियादी ढांचे की चुनौतियों पर बात करते हुए हज़ारिका ने कहा कि पूर्वोत्तर के कई राज्यों को विकास के लिए केंद्र से वित्तीय सहायता पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे में राज्य के मुख्यमंत्री के लिए केंद्र के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना और अपने राज्य के हितों को मजबूती से उठाना दोनों जरूरी होते हैं। उन्होंने लाल थनहवला के राजनीतिक अनुभवों का जिक्र करते हुए कहा कि वह केंद्र के साथ बातचीत और संपर्क बनाने में माहिर थे।
हज़ारिका ने बताया कि ललथनहवला ने पाँच प्रधानमंत्रियों इंदिरा गांधी से लेकर नरेंद्र मोदी तक के साथ काम किया। एक बार योजना आयोग की बैठक में मोंटेक सिंह अहलूवालिया से असहमति होने पर वे उठकर चले गए और अपनी माँग मनवा कर ही लौटे। राज्य अब पूर्ण साक्षर राज्यों में गिना जाता है। उनके अनुसार, छोटे राज्यों के नेतृत्व के सामने एक बड़ी चुनौती यह होती है कि वे केंद्र से संसाधन हासिल करने के साथ-साथ राज्य के भीतर अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता भी बनाए रखें। उन्होंने कहा कि राज्य के हितों और स्थानीय जनता के भरोसे के बीच संतुलन बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मिज़ोरम ने शरणार्थियों पर केंद्र से कहा, “हम इन लोगों से मुँह नहीं मोड़ सकते
हज़ारिका ने बताया कि म्यांमार से आए हज़ारों शरणार्थियों के मुद्दे पर मिज़ोरम ने केंद्र सरकार की बात मानने से इनकार कर दिया था। उनके अनुसार भारत सरकार ने राज्य को संदेश भेजा था कि इन लोगों की पहचान कर उन्हें वापस भेजा जाए, क्योंकि वे “अवैध प्रवासी” हैं, शरणार्थी नहीं।
हज़ारिका ने बताया कि म्यांमार में सेना और विद्रोही गुटों के संघर्ष से भागकर करीब 50,000 लोग मिज़ोरम आए। मुश्किल से 10 लाख की आबादी वाले छोटे राज्य के लिए यह संख्या बहुत बड़ी थी। कई सालों तक राज्य सरकारों ने उन्हें सहारा और सुरक्षा का भरोसा दिया। लोगों ने उन्हें अपने घरों में जगह दी और कई जगहों पर शिविर बनाने के लिए जमीन भी उपलब्ध कराई।
कुछ साल पहले जब यह मुद्दा चरम पर पहुँचा, तो भारत सरकार ने राज्य को संदेश भेजा कि इन लोगों की पहचान करके उन्हें वापस भेजा जाए, क्योंकि वे “अवैध प्रवासी” हैं, शरणार्थी नहीं। तब मिज़ोरम के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज़ोरमथंगा ने साफ जवाब दिया कि “भारत एक लोकतंत्र के रूप में जाना जाता है। यह हमारे सामने हो रहा है। हम इन लोगों से मुँह नहीं मोड़ सकते।”
हज़ारिका ने कहा कि भारत अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी कन्वेंशन का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, फिर भी मिज़ोरम ने असाधारण रुख अपनाया। एक छोटे राज्य ने तय किया कि वह इन लोगों को वापस नहीं धकेलेगा। मिज़ो लोग खुद को एक बड़े समुदाय का हिस्सा मानते हैं जो सीमाओं से परे फैला है। सीमा के दोनों तरफ रिश्तेदारी, शादियाँ और संपत्ति के रिश्ते हैं।
हज़ारिका ने असम राइफ़ल्स के पूर्व प्रमुख लेफ़्टिनेंट जनरल शोकिन चौहान का एक संस्मरण भी पढ़ा। चौहान ने लिखा कि वे ललथनहवला को चिन शरणार्थियों की बढ़ती आमद और रोहिंग्या शरणार्थियों के मिज़ोरम में घुसने की संभावना की जानकारी देने गए थे, जो उनके अनुसार संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय सीमा पर जायज़ सुरक्षा चिंता थी। लालठनहवला ने सुनकर उन्हें हल्के से झिड़का कि वे मिज़ो लोगों से अपने भाइयों की मदद न करने को कैसे कह सकते हैं।
चौहान के अनुसार लालठनहवला ने नक़्शे पर दिखाया कि मिज़ो परंपराओं से जुड़े पवित्र वन और पत्थर सीमा पार म्यांमार के चिन राज्य में हैं। चौहान ने लिखा, “मैं एक अंतरराष्ट्रीय सीमा देख रहा था, वे एक सांस्कृतिक भू-दृश्य देख रहे थे।” हज़ारिका ने कहा कि म्यांमार के साथ भारत की 1,643 किमी लंबी सीमा के बारे में शायद ही कोई बात करता है, जबकि वह भी संवेदनशील है, क्योंकि वहाँ से नशीले पदार्थ भी आते हैं।
उन्होंने कहा कि मिज़ो लोग ख़ुद को ऐसे बड़े समुदाय का हिस्सा मानते हैं जो सीमाओं से परे फैला है, और सीमा के दोनों ओर रिश्तेदारियाँ, संपत्ति और आना-जाना है। पर उनके अनुसार मिज़ो-ज़ो-कुकी समुदाय के एक राष्ट्र होने का विचार कोई राजनेता वास्तव में नहीं चाहता, क्योंकि राष्ट्र क्षेत्र को अपने अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा मानते हैं। मणिपुर पर हज़ारिका ने सीमित बात की। उन्होंने कहा कि वहाँ के क़रीब कई हज़ार कुकी ने म्यांमार और मिज़ोरम में शरण ली थी और बाद में उनमें से कई वापस चले गए।
राजीव गांधी के मिज़ोरम दौरे की हुई चर्चा
सत्र के दौरान राजीव गांधी के मिज़ोरम दौरे के कुछ रोचक किस्से साझा किए गए। हज़ारिका ने बताया कि राज्य उद्घाटन के बाद परिवार (सोनिया, राहुल, प्रियंका) संग ब्रेक लेते हुए राजीव ने ईगल्स व बीटल्स जैसे बैंड्स के गाने सुनते हुए बेहद तेज़ गाड़ी चलाई, जिस पर पीछे बैठी सोनिया गांधी ने उन्हें धीरे चलाने की हिदायत भी दी। उन्होंने कहा कि मणिशंकर अय्यर के अनुसार, यह राजीव गांधी की सबसे बेफ़िक्र और तनावमुक्त रोड ट्रिप थी।
एक अन्य मज़ेदार वाकये में, मिज़ोरम के एक स्थानीय व्यक्ति ने राजीव गांधी को भारत का प्रधानमंत्री मानने से इनकार कर दिया क्योंकि उनकी मूँछें नहीं थीं। दरअसल, उस इलाके में भारतीय दूरदर्शन के बजाय बांग्लादेश टीवी आता था, जिस पर मूँछों वाले जनरल इरशाद दिखते थे। यह बात पता चलते ही राजीव गांधी ने तुरंत मिज़ोरम में दूरदर्शन का टावर लगवाने के निर्देश दिए।


















