KSLF 2026: हिमाचल प्रदेश की पर्यटक नगरी कसौली में शुक्रवार से शुरू हुए खुशवंत सिंह लिटफेस्ट (KSLF) 2026 में आयोजित सत्र “गर्ल्स जस्ट वांट टू हैव फ़ंडामेंटल राइट्स” में वकील और लेखिका मिहिरा सूद ने कहा कि बलात्कार मामलों के लिए फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट “छवि पर आधारित समाधान” हैं, जिनसे वास्तविक लाभ नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि देश की न्याय व्यवस्था की असली समस्या संसाधनों का संकट है। सत्र में पत्रकार अन्ना एम.एम. वेट्टीकाड भी मौजूद थीं।
सत्र के दौरान जब एक दर्शक ने सवाल किया कि क्या नारीवादी आंदोलन को सभी बलात्कार मामलों को फास्ट ट्रैक कोर्ट में भेजने की मांग को प्राथमिकता नहीं देनी चाहिए, तो इसके जवाब में सूद ने कहा कि यह उनकी और अधिकांश वकीलों की स्पष्ट राय है कि ये अदालतें व्यावहारिक रूप से कारगर साबित नहीं होती हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि देश की न्यायिक व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा संकट संसाधनों की भारी कमी का है, जिस पर ध्यान देना सबसे ज्यादा जरूरी है।

“देरी कहाँ है, यह देखना होगा”
सूद ने कहा कि इन मामलों में देरी के आँकड़े देखने होंगे। देरी पुलिस के स्तर पर है, जाँच में है या ट्रायल में, और स्थगन कौन माँग रहा है, अभियोजक, प्रतिवादी या जज। उनके मुताबिक़ व्यवस्था में बनी कई समयसीमाएँ ज़रूरी हैं, क्योंकि पुलिस को जाँच और आरोप-पत्र के लिए तथा वकीलों को तैयारी के लिए समय चाहिए। उन्होंने कहा कि अनुचित देरी हटाने के बाद भी बलात्कार के मुक़दमे की असल समयसीमा में बहुत कम फ़र्क़ पड़ेगा, क्योंकि अदालतों पर बोझ ही इतना है।
संसाधनों की कमी
सूद ने कहा, “हमारी न्यायपालिका और क़ानूनी व्यवस्था में संसाधनों का संकट है।” उन्होंने बताया कि कुछ अदालतें स्टेनोग्राफ़र के बिना चल रही हैं, जज कभी-कभी रोज़ 100 से 150 मामले सुनते हैं और वकील 80 से 100 मामलों में बहस करते हैं। उन्होंने इसे शारीरिक रूप से असंभव बताया।
झूठी सज़ा और प्रतिक्रिया का ख़तरा
सूद की चिंता है कि फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट न्याय में कटौती करेंगे। उनके अनुसार जल्दी सज़ा दिलाने के राजनीतिक दबाव में पुलिस किसी को भी आगे खड़ा कर सकती है और सबूत गढ़ सकती है, ख़ासकर उन मामलों में जहाँ अभियुक्त पीड़िता का जाना-पहचाना न हो। उन्होंने कहा कि इससे झूठी सज़ाएँ बढ़ेंगी और फिर इसका ठीकरा महिलाओं और महिला अधिकार आंदोलन पर फूटेगा।
“रेज, रिफ़ॉर्म, रिपीट”
सत्र के दौरान सूद ने अपनी किताब के एक अध्याय “रेज, रिफ़ॉर्म, रिपीट” का हवाला देते हुए कहा कि कोई घटना सुर्ख़ियों में आती है, लोग सड़कों पर उतरते हैं, सरकार पर दबाव बनता है और सज़ाएँ और कठोर कर दी जाती हैं। उनके अनुसार 5 साल की सज़ा 10 साल हो जाती है, 10 साल की 20 साल और 20 साल की मृत्युदंड। फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट भी इसी चक्र का हिस्सा हैं, जो सरकार को “आसान बच निकलने का रास्ता” देते हैं। उन्होंने कहा, “हमें निरंतर दबाव चाहिए।”
क्या होना चाहिए
सूद ने कहा कि अनुचित देरी ज़रूर घटाई जा सकती है, लेकिन असली ज़रूरत शिक्षित जनशक्ति, बुनियादी ढाँचे और पैसे की है। उन्होंने व्यवस्था को ज़्यादा मानवीय और संवेदनशील बनाने की बात भी कही, जैसे पीड़िता की गवाही जल्द से जल्द एक ही बार में ली जाए ताकि उसे दोहराना न पड़े। उनके अनुसार यह काग़ज़ पर मौजूद है और इसे लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि महिला अधिकार शून्य में नहीं होते, वे दलित, आदिवासी और एलजीबीटी समुदाय के अधिकारों से जुड़े हैं। पूरी न्यायिक व्यवस्था का सुधार हर आंदोलन और हाशिये के समुदाय को फ़ायदा पहुँचाएगा।
किताब पर चर्चा
सत्र की शुरुआत में सूद की किताब पर बात हुई, जो 1970 के दशक से पिछले 50 सालों में महिला अधिकारों की लड़ाई को राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक संदर्भ में देखती है। अन्ना एम.एम. वेट्टीकाड ने इसे ऐसी किताब बताया जिसे समझने के लिए वकील होना ज़रूरी नहीं।













