KSLF 2026: कसौली में आयोजित ‘खुशवंत सिंह लिट फेस्ट’ (Khushwant Singh Lit Fest 2026) के दूसरे दिन “मिलिट्री मिथ्स एंड मिस्ट्रीज” सत्र में पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे (सेवानिवृत्त) ने सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम (AFSPA) पर अपना रुख स्पष्ट किया। वरिष्ठ पत्रकार किशालय भट्टाचार्जी से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि AFSPA एक ऐसा कानून है जिसे बहुत गलत समझा गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि असली सवाल इस कानून को हटाने का नहीं, बल्कि यह देखने का है कि इलाके में हालात सुधरे हैं या नहीं।
“गाड़ी को घोड़े के आगे मत लगाइए”
AFSPA की कार्यप्रणाली समझाते हुए जनरल नरवणे ने कहा कि जब किसी इलाके में स्थितियां राज्य प्रशासन या स्थानीय पुलिस के नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं, तब उस क्षेत्र को ‘अशांत’ घोषित कर सेना को बुलाया जाता है। सेना के पास प्राकृतिक रूप से पुलिस अधिकार नहीं होते, इसीलिए संसद कानून के माध्यम से उन्हें आवश्यक शक्तियां प्रदान करती है ताकि वे अपना कार्य कर सकें।

उन्होंने कहा, “आप हालात सुधारिए, तो सेना की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। हम उल्टा क्यों कर रहे हैं?” उनका तर्क था कि बिना कानूनी समर्थन के किसी को सड़क पर रोकना ‘अपहरण’ माना जाएगा और किसी वाहन की तलाशी लेने के लिए कानूनी आधार होना जरूरी है, जो कि AFSPA प्रदान करता है।
“AFSPA अपराध की छूट नहीं देता”
पूर्व सेना प्रमुख ने स्पष्ट किया कि AFSPA किसी को भी अपराध करने की छूट नहीं देता और सेना को भी देश के सभी कानूनों का पालन करना पड़ता है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या पुलिस हिरासत में मौत होने पर पूरे पुलिस बल को भंग कर दिया जाता है? वही तर्क AFSPA पर भी लागू होना चाहिए।
पूर्वोत्तर का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वहां कोई भी घटना होते ही AFSPA हटाने की मांग उठने लगती है, जबकि प्राथमिकता हालात को सुलझाने की होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि रात के दो बजे बारिश में खड़े होकर गाड़ियां जांचना सेना के लिए कोई खुशी का काम नहीं है, सेना बैरक में रहकर अपने मुख्य दायित्व—दुश्मन से मुकाबला करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहती है।
“ज्यादतियां” शब्द पर चर्चा
सत्र के दौरान जब मॉडरेटर ने सेना पर असंगत बल प्रयोग और ‘ज्यादतियों’ के आरोपों का जिक्र किया, तो जनरल नरवणे ने कहा कि यह शब्द उन्होंने इस्तेमाल नहीं किया था, हालांकि ऐसा संभव हो सकता है। इस पर भट्टाचार्जी ने कहा कि इसके दस्तावेजी प्रमाण मौजूद हैं। जनरल नरवणे ने स्वीकार किया कि शुरुआती दौर की तुलना में अब स्थितियों में काफी सुधार हुआ है।
सेना अब बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान चलाने के बजाय सटीक खुफिया जानकारी के आधार पर कार्रवाई करती है, ताकि आम ग्रामीणों को असुविधा न हो। उन्होंने अपने पूर्व कमांडरों का उल्लेख करते हुए बताया कि उनके जनरल ऑफिसर कमांडिंग (किलो फोर्स) का स्पष्ट निर्देश था कि जो भी स्थानीय आतंकवादी आत्मसमर्पण करे, उसे “भटका हुआ युवक” मानकर जिंदा रखना सेना की जिम्मेदारी है। इसी प्रकार, जनरल हुड्डा का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि मणिपुर में कमान संभालते ही उन्होंने सैनिकों को निर्देश दिया था कि वे हताहतों की संख्या को “दोहरे अंक” में नहीं देखना चाहते।
अतीत पर अटकने के बजाय भविष्य पर ध्यान दें
भट्टाचार्जी द्वारा पूछे गए इस सवाल पर कि क्या सेना और सरकार को उन क्षेत्रों के लोगों से माफी मांगनी चाहिए जो खुद को अलग-थलग और “बाहरी” महसूस करते हैं, जनरल नरवणे ने कहा कि अब बहुत समय बीत चुका है। पहले गश्त देख कर ग्रामीण बच्चों के साथ घरों में छिप जाते थे, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है और लोग सेना को देखकर आगे आते हैं क्योंकि उन्हें अहसास है कि सेना उनकी अपनी है। उन्होंने कहा कि अतीत की बातों पर अटके रहने के बजाय वर्तमान में किए जा रहे सकारात्मक प्रयासों पर ध्यान देना चाहिए।
सत्र के दौरान खुशवंत सिंह की उस टिप्पणी का भी उल्लेख किया गया जिसमें कहा गया था कि सेना को बार-बार नागरिक क्षेत्रों में बुला लिया जाता है। जनरल नरवणे ने माना कि इससे सेना का मुख्य ध्यान भटकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सीमाओं की रक्षा करना सेना का मुख्य कार्य है, जबकि नागरिक प्रशासन की सहायता करना दूसरा दायित्व है। यह प्रक्रिया केवल तब लागू होती है जब गृह मंत्रालय से रक्षा मंत्रालय और संबंधित यूनिट तक विधिवत अनुरोध भेजा जाता है; सेना स्वयं स्थानीय कानून-व्यवस्था में कभी हस्तक्षेप नहीं करती।



















