Satinder Sartaaj in KSLF 2026: खुशवंत सिंह लिट फेस्ट के दूसरे दिन पंजाबी गायक और शायर सतिंदर सरताज ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। दिन के अंतिम सत्र में उन्होंने अपनी नज़्मों, ग़ज़लों, गीतों और बेबाक बातचीत से श्रोताओं का दिल जीत लिया। “फायरसाइड चैट: शायरी और मौसिकी” सत्र में चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि एक रात पहले जयपुर में कॉन्सर्ट करके सीधे कसौली पहुंचे। बातचीत में उन्होंने बताया कि वे अपना टूर “द फिलॉसफी ऑफ रेज़ोनेंस” शुरू कर चुके हैं, जिसका पहला शो जयपुर में था, अगले पड़ाव करनाल और कुल्लू हैं।
कवि, पत्रकार और अनुवादक निरुपमा दत्त ने इस सत्र की शुरुआत, लेखिका संध्या मृदुल की किताब पर बातचीत से की। यह किताब उन्होंने अपने भाई की याद में लिखी है और इसकी पहली कविता “मज़बूत बनो” है। संध्या ने कहा कि सब “मज़बूत बनो” कहते हैं, पर इस शब्द का मतलब समझना ज़रूरी है। मज़बूत होने का अर्थ है मां की आंखों में उम्मीद लौटाना, भाई की तस्वीर देखकर भी बिखर न जाना और ग़म की लहरों में टिके रहना।

उन्होंने कहा कि जो महसूस हो, उसे महसूस करना चाहिए, क्योंकि यही इंसान को इंसान बनाता है। उनके मुताबिक़ जितनी दरारें होंगी, उतनी रोशनी भीतर आएगी। उन्होंने अपनी छवि का भी ज़िक्र किया कि एक “कूल, बोल्ड, बिंदास” लड़की को रोते देख लोग उसे कमज़ोर समझने लगे, जबकि उस रोने में भी ताक़त होती है।
इसके बाद बातचीत को आगे बढ़ाते हुए सरताज ने कहा कि दोस्तों के बीच हौसला बढ़ाना बहुत ज़रूरी है। उन्होंने बताया कि संध्या और उनकी अभिनेत्री-सहेलियों के ग्रुप ने एक ही कविता चुनी थी। फिर उन्होंने जीवन की नश्वरता पर एक नज़्म पढ़ी, जिसका भाव था कि दौलत और ताज यहीं रह जाते हैं और इंसान के साथ चाहत और यादें जाती हैं। मंच पर उनका स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि जिस ज़ुबान के हम प्रतिनिधि हैं, उसी में बोलना चाहिए।
सरताज ने खुशवंत सिंह लिट फेस्ट में आना सम्मान की बात बताया। उन्होंने कहा कि उनके जीवन का पहला लेख निरुपमा जी ने लिखा था और दिव्या दत्ता के साथ वे कई अवॉर्ड शो होस्ट कर चुके हैं। संध्या के साथ मंच साझा करना पहली बार था। उन्होंने बताया कि वे सत्रों में कम ही जाते हैं क्योंकि कविता के मंच पर लोग गाना सुनने बैठे होते हैं, इसलिए उन्होंने श्रोताओं से सवाल-जवाब की भी गुज़ारिश की। उन्होंने कहा कि ज़रूरत होगी तो गाने भी गाएंगे।
इस दौरान सरताज ने अपनी ताज़ा ग़ज़लों में से एक सुनाई, जिसका संदेश है कि मोह की डोर धागों जैसी नाज़ुक होती है, रस्से जैसी नहीं, इसलिए उसे ज़्यादा कसा नहीं जा सकता। जिन्हें रिश्तों की क़दर है वे उन पर वार नहीं करते, और प्यार के बाग़ वही आबाद करते हैं जो दर्द से डरकर भागते नहीं। इसका एक शेर उन्होंने अपने माता-पिता, बड़ों, भाइयों और बहनों को समर्पित किया, जिन्होंने दूसरों के चेहरों पर मुस्कान बनाए रखने के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी खपा दी।
त्योहारों के मौसम पर दस दिन पहले लिखी अपनी एक नज़्म को सुनाते हुए सरताज ने कहा कि हंसी बांटना सबसे सस्ता काम है। अगर किसी से अनबन हो गई हो तो कोई मौक़ा ढूंढकर बात कर लेनी चाहिए, वरना बाद में पछतावा ही होता है। उन्होंने पश्चिमी व्यक्तिवादी संस्कृति की तुलना करते हुए कहा कि वहां लोग अपने बच्चों के कमरे में भी दस्तक देकर जाते हैं, जबकि हमारे यहां बड़े परिवार साथ रहते हैं और यही हमारी बड़ाई है।
उन्होंने चुटकी ली कि दिनभर रील्स देखने वाले, दोस्त के बुलाने पर कहते हैं कि “टाइम नहीं है”। उनके अनुसार फ़िज़ूल खर्च तो हल्के लगते हैं, पर रिश्तों के लिए वक़्त महंगा हो गया है। कसौली पहुंचने का उदाहरण देकर बोले कि मुख्य सड़क बंद हो तो मशोबरा की तरफ़ से भी रास्ता है, यानी भावनाओं का रास्ता बंद लगे तो भी दूसरे रास्ते मौजूद हैं।
इसके बाद सरताज ने दोस्ती पर नज़्म सुनाई। उन्होंने कहा कि जिनकी याद में सब यहां जुटे हैं, उनकी तबीयत में ज़िंदगी जीने की उमंग थी और वही उमंग उन्होंने हाल में अपने दोस्तों के बीच महसूस की। उनका कहना था कि दोस्तों के बीच हम वैसे नहीं होते जैसे दफ़्तर में होते हैं, और यह स्वाभाविक है। नज़्म का सार यह था कि दोस्तों की गवाहियां अलग होती हैं, उनसे लड़ाई भी अलग किस्म की होती है और उनकी दवाइयां डॉक्टर की पर्ची पर नहीं लिखी जातीं।
उन्होंने मज़ाक में कहा कि आइंस्टाइन जैसा वैज्ञानिक भी घर जाकर दोस्तों के साथ पीता होगा। उन्होंने कहा कि बाकी रिश्ते संयोग से मिलते हैं, पर दोस्ती अपनी कमाई होती है। सभागार में बैठे पढ़े-लिखे, सलीक़ेदार लोगों से उन्होंने कहा कि वे भी अपने स्कूल-कॉलेज के दोस्तों के साथ वैसा ही हुड़दंग करेंगे, और करना भी चाहिए।
श्रोताओं की फ़रमाइश पर सरताज ने कई गीत भी गाए। इनमें “गुज़ारिशों पे ग़ौर कीजिए”, पंजाबी विरह गीत “साडा सारियां विसर गइयां राहवां”, सूफ़ियाना प्रार्थना “साईं वे” और कसौली से जोड़कर गाया गया “ना गल्ल मेरे वस्सदी रही” शामिल थे। सभागार में लोगों ने साथ गाया और तालियां बजाईं। उन्होंने अपनी ग़ज़ल “मेरा योग” भी पेश की।
सरताज ने कहा कि उन पर सूफ़ीवाद, तसव्वुफ़ और रहस्यवाद का टैग लग गया है, जबकि वे खुद को इसके क़ाबिल नहीं मानते। लोग समझते हैं कि वे बहुत ध्यान करते होंगे। उन्होंने कहा कि ध्यान करने वाले और रचना करते समय कवि जिस अवस्था में होता है, वह उन्हें एक जैसी लगती है। उन्होंने यह भी समझाया कि संस्कृत का “योग” पंजाबी में “जोग” हो जाता है और वहां के योगी यहां जोगी हो जाते हैं, जैसे रांझा जोगी हुआ।
सवाल-जवाब में लुधियाना के गुरवीर सिंह ने पूछा कि नौजवानों को पंजाबी कविता से कैसे जोड़ा जाए। सरताज ने कहा कि किसी को किसी चीज़ की तरफ़ खींचना हो तो उस चीज़ को सुंदर बनाना चाहिए। उन्होंने बताया कि उनका ‘गुरमुखी दा बेटा’ वाला गीत बिना किसी मक़सद के “आमद” की तरह आया था और आज हज़ारों बच्चों ने गुरमुखी के टैटू बनवा लिए हैं।
नारे लगाने की ज़रूरत नहीं, सुंदर चीज़ें बनाकर स्क्रीन पर लाते रहना ही काफ़ी है। इसी सोच के तहत वे अपने साथ पांच लोगों की टीम लाए, ताकि वे जो पंजाबी में बोलें उसका अनुवाद दर्शकों तक पहुंचे। उन्होंने कहा कि रूपक और प्रतीक समझना आसान नहीं होता, ख़ासकर उन लोगों के लिए जो पंजाबी पृष्ठभूमि के हैं पर मातृभाषा नहीं पढ़ पाते।
इसी दौरान उन्होंने पहली बार घोषणा की कि करीब दो महीने में उनकी नज़्मों, गीतों और ग़ज़लों का संग्रह आएगा, जिसमें कुछ रिकॉर्डेड और कुछ अनरिकॉर्डेड रचनाएं होंगी। उन्होंने बताया कि इसका अंग्रेज़ी अनुवाद भी वे खुद ही कर रहे हैं, ताकि जो वे कहना चाहते हैं, वही पाठकों तक पहुंचे। उन्होंने बताया कि पिछली रात जयपुर के कॉन्सर्ट में भी गैर-पंजाबी दर्शक भी आए थे। इसी बीच विदेश से लौटी एक श्रोता ने कहा कि उनके भीतर पंजाबियत तो थी पर लंबे समय तक दबी रही।
भारत से जाते समय उन्हें गुरमुखी पढ़नी नहीं आती थी, तब उन्होंने अकेले बैठकर पंजाबी कविता का पहला संग्रह लिखा। संगीत की एक छात्रा ने बताया कि सरताज का इंटरव्यू सुनकर उन्होंने बीए, एमए संगीत और फिर पंजाब यूनिवर्सिटी से आगे पढ़ने का फ़ैसला किया। सरताज ने गर्व जताया कि वे पंजाब यूनिवर्सिटी कैंपस के ग्लोबल ब्रांड एंबेसडर हैं। उन्होंने बताया कि उनका संगीत का सफ़र “संगीत विशारद” से शुरू हुआ था, जिसकी शुरुआत उन्होंने जालंधर कैंट से की थी, जबकि उसका मुख्यालय चंडीगढ़ के सेक्टर 35 में है।
खुशवंत सिंह को याद करते हुए सरताज ने बताया कि उनकी एल्बम “चीरे वाला सरताज” 2011-12 में रिलीज़ हुई थी। लॉन्च उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की पत्नी सलमा अंसारी के आवास पर हुआ, जहां आमिर खान ख़ास तौर पर आए थे। शाम को कॉन्सर्ट था, पर बीच के दो घंटों में उन्हें सरदार खुशवंत सिंह के घर जाने का मौक़ा मिला। उन्होंने कहा कि उस समय खुशवंत सिंह बहुत बुज़ुर्ग थे, फिर भी जितना समय दिया, खूब बातें कीं।
सरताज ने बताया कि पंजाब यूनिवर्सिटी में पीएचडी के दौरान उन्होंने उनकी पाकिस्तान वाली किताब पहली मंज़िल पर बैठकर पढ़ी थी। अपने विषय से ऊबकर वे साहित्य पढ़ने लगे थे और इसी तरह कविता से उनका परिचय हुआ। उस किताब ने उन्हें भीतर तक भर दिया, क्योंकि बंटवारे से पहले का साझा पंजाब उन्हें बहुत अज़ीज़ है और दोनों तरफ़ उनके चाहने वाले रहते हैं।
उन्होंने बताया कि शाम साढ़े सात बजे सीढ़ियां उतरकर बाहर आए तो अंधेरा था, आंखें नम थीं और वे अकेले रो लिए। उसी से प्रेरित एक नज़्म उन्होंने बाद में खुशवंत सिंह को सुनाई, जिसका सार है कि हमारी ख़ूबी है कि हम रो सकते हैं और इसी गुण से हम इंसान बने।
सरताज ने कहा कि मानव सभ्यता की तीन सबसे बड़ी खोजों में पहली भाषा है, दूसरी बिजली और तीसरी चाहे एआई मान ली जाए। उनके लिए भाषा बहुत अहम है, क्योंकि जो कुछ भी हम कहते हैं, उसका ज़रिया भाषा ही है। उन्होंने कहा कि उनके ज़्यादातर गीत कुदरत पर हैं और प्रकृति उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा है, उसके बाद आसपास का समाज।
सरताज ने कहा कि वे कसौली अक्सर आते हैं और इस जगह को देखकर रहने का मन करता है। उन्होंने कहा कि शायद इसी वजह से खुशवंत सिंह यहां आकर बसे और उनकी दोस्तियां यहीं पनपीं। लेखन की प्रेरणा पर उन्होंने कहा कि चंडीगढ़ से कार में आते हुए वे शीशा नीचे करके न संगीत सुनते हैं, न कुछ पढ़ते हैं और न किसी से बात करते हैं। बस देखते हैं कि सड़क पर मज़दूर क्या कर रहे हैं, कोई दुकान का शटर गिरा रहा है और कोई बिजली मिस्त्री खंभे पर चढ़ा है। उन्होंने कहा, “यही असली किताब है। आपके आसपास जो घट रहा है, उसे पढ़ना आ जाए तो यही ज़िंदगी की किताब है।”
गायकी “ख़ून में आती है या सीखी जाती है” वाले सवाल पर, जिसमें गुरदास मान के साथ उनकी तस्वीर का हवाला भी दिया गया, सरताज ने अपने सफ़र को याद किया। उन्होंने कहा कि स्टेज उनका सबसे पसंदीदा काम है। वे फ़िल्म और रिकॉर्डिंग भी करते हैं, पर स्टेज उनकी “डार्लिंग” है। उन्होंने बताया कि वे दोआबा के एक किसान परिवार से हैं, जहां कनालों में भी ज़मीन नहीं होती। वहां के लोगों के पास दो ही रास्ते होते हैं, पढ़ाई या परदेस, और उन्होंने पढ़ाई चुनी।
उनका सपना प्रोफ़ेसर बनना, नाम के आगे “डॉक्टर” लगना और किसी कॉलेज-यूनिवर्सिटी में संगीत पढ़ाना था। आज जो भी मिला है, उसे वे मां-बाप की दुआओं और पुरखों की कमाई का नतीजा मानते हैं। उन्होंने कहा कि जो चीज़ उनके पास आती गई, वे उसे संभालते, सजाते और पॉलिश करते रहे, फिर धीरे-धीरे बात लोगों तक पहुंची और उन्होंने नवाज़ा।



















