Chintpurni Temple History: रात गहराते ही, चिंतपूर्णी मंदिर की चहल-पहल धीरे-धीरे थमने लगती है और घंटियों की गूंज भी शांत होने लगती है तथा मंदिर के कपाट पूर्ण रूप से बंद होने के पहले मां के दरबार में शयन की बेला आती है, जो हर श्रद्धालु के लिए अत्यंत पवित्र क्षण होता है। इसी शांत और एकांत क्षण में जब पवित्र पिंडी के ऊपर एक विशेष टोकरी रखी जाती है,तो शायद बाहर से देखने वाली आंखों को वहां कुछ खास नजर न आए।
लेकिन चिंतपूर्णी की आस्था को जानने वाले जानते हैं कि यह टोकरी साधारण नहीं है। इसकी हर तील में किसी पुरखे की श्रद्धा है, इसकी हर बुनावट में किसी भक्त का विश्वास है और इसकी छांव में एक ऐसी लोककथा सांस लेती है, जिसे पीढ़ियां अपने दिल में संजोकर आगे बढ़ाती आई हैं। यही कारण है कि मां चिंतपूर्णी को भक्त प्रेम और भक्ति भाव से जिन नामों से पुकारते हैं, उनमें ‘टोकरी वाली माता’ भी प्रमुख है।
श्राद्धालु मां चिंतपूर्णी को ‘टोकरी वाली माता’ के नाम से भी श्रद्धापूर्वक पुकारते हैं। मंदिर में किसी श्रद्धालु द्वारा अत्यंत भाव के साथ चढ़ाई गई एक विशेष चंदन की टोकरी भी मौजूद है। मां चिंतपूर्णी के दरबार में रखी हुई यह चंदन की टोकरी आज भी भक्तों के आकर्षण और आस्था का मुख्य केंद्र बनी हुई है। बताते हैं कि मां चिंतपूर्णी के परम भक्त बाबा माईदास को जब मां ने दर्शन दिए थे, तो मां ने उन्हें एक विशेष संकेत दिया था। मां ने संकेत दिया था कि वट वृक्ष के नीचे टोकरी के नीचे उनका पिंडी स्वरूप विराजमान है।
बाबा माईदास के लिए यह अनुभव जैसे मां का सीधा बुलावा था। वह इस बात का संकेत था कि जिस शक्ति की तलाश में भक्त का मन भटक रहा है, वह स्वयं उसे अपने पास बुला रही है। कहते हैं कि जब बाबा माईदास उस निश्चित स्थान पर पहुंचे, तो वट वृक्ष के नीचे बिल्कुल वही दृश्य सामने था, जिसका संकेत उन्हें स्वप्न में मिला था। वहां टोकरी और उसके ठीक नीचे पवित्र पिंडी स्वरूप में मां के अलौकिक दर्शन हुए।
शायद यही वह मुख्य स्मृति है, जिसने चिंतपूर्णी की इस टोकरी को एक साधारण वस्तु से कहीं ऊपर पहुंचा दिया है। आज भी जब रात के समय मां का शयन होता है, तो पवित्र पिंडी के ऊपर पूरी विधि-विधान और परंपरा के साथ टोकरी रखी जाती है। इसी परंपरा का एक अन्य बेहद भावुक पक्ष चिंतपूर्णी के उन स्थानीय परिवारों से भी जुड़ा हुआ है, जिनके हाथ पीढ़ियों से लगातार मां के लिए टोकरी तैयार करते आए हैं।
बांस की तीलियों को आपस में जोड़ना, उन्हें सही आकार देना और फिर उस टोकरी को पूरी पवित्रता के साथ मां की सेवा के लिए तैयार करना उनके लिए महज कोई काम नहीं है। यह उनके लिए प्रत्यक्ष सेवा है। यह उनके पुरखों से उन्हें मिली एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। यह वह अमूल्य धरोहर है, जिसे उन्होंने केवल अपने हाथों से नहीं, बल्कि अपनी गहरी भावनाओं से संभालकर रखा है।
समय के साथ कई चीजें बदलती चली गईं। पीढ़ियां बदलती रहीं, लोगों के घर बदले और आवागमन के रास्ते भी बदले। इसके अलावा चिंतपूर्णी में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में लगातार भारी वृद्धि हुई है। मंदिर के आसपास आधुनिक बाजार और अन्य सुविधाएं भी काफी बढ़ गई हैं।
लेकिन मां के लिए टोकरी तैयार करने वाले उन स्थानीय परिवारों के हाथों ने अपनी यह पवित्र सेवा कभी नहीं छोड़ी। उन हाथों में आज भी वही पुराना अपनापन है, जो शायद उनके दादा और परदादा के हाथों में रहा होगा। मां के दरबार में एक श्रद्धालु द्वारा श्रद्धापूर्वक अर्पित की गई चंदन की वह विशेष टोकरी आज भी मंदिर के भीतर सुरक्षित रखी हुई है, जो इस प्राचीन परंपरा की गवाही देती है।


















