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Himachal Pradesh: राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के सियासी शोर में खो गए जनता के असली सवाल?

हिमाचल प्रदेश विधानसभा में राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जोरदार राजनीतिक टकराव देखने को मिला। हालांकि, इस भारी हंगामे के बीच प्रदेश के आम नागरिकों से जुड़े शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आपदा राहत जैसे मूलभूत मुद्दे पीछे छूटते नजर आ रहे हैं।
Published on: 22 August 2026
Himachal Pradesh: राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के सियासी शोर में खो गए जनता के असली सवाल?

Himachal Pradesh: हिमाचल प्रदेश विधानसभा का सदन लोकतंत्र का वह मंच है, जहां प्रदेश के लाखों लोगों की उम्मीदें, शिकायतें और सवाल पहुंचने चाहिए। लेकिन जब विधानसभा की कार्यवाही राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के राजनीतिक टकराव में उलझ जाए, तो सवाल केवल यह नहीं रह जाता कि कौन सही है और कौन गलत, सबसे बड़ा सवाल यही है कि, क्या हिमाचल के आम आदमी के असली मुद्दे इस शोर में कहीं पीछे तो नहीं छूट रहे?

राष्ट्रगान का सम्मान देश के हर नागरिक का दायित्व है, और राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ भी भारत के स्वतंत्रता संघर्ष और राष्ट्रीय चेतना से जुड़ा एक ऐतिहासिक गीत है। इन दोनों के सम्मान पर बहस हो सकती है, राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन क्या विधानसभा का कीमती समय इसी बहस की भेंट चढ़ जाना चाहिए?

हिमाचल की जनता शायद उनके चुने हुए विधायकों से इससे कहीं अधिक की उम्मीद करती है। उसे यह जानना है कि उसके गांव का अस्पताल कब डॉक्टरों और दवाइयों से भरेगा?, उसके बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कब मिलेगी?, उसके बेटे-बेटी को सरकारी नौकरी के इंतजार में वर्षों क्यों बैठना पड़ रहा है?, पहाड़ की सड़क हर बरसात में क्यों टूट जाती है?, आपदा में घर खो चुके परिवारों का पुनर्वास कब पूरा होगा?, बढ़ती महंगाई के बीच मध्यम वर्ग अपने परिवार का खर्च कैसे चलाए?, किसान और बागवान की मेहनत का उचित मूल्य कैसे सुनिश्चित होगा?, और सबसे बड़ा सवाल – हिमाचल के सीमित संसाधनों और भारी वित्तीय दबाव के बीच आने वाली पीढ़ियों का भविष्य कैसे सुरक्षित किया जाएगा?

ये सवाल किसी एक पार्टी के नहीं हैं, ये सभी हिमाचल के सवाल हैं। राष्ट्रभक्ति केवल गीत में नहीं, व्यवस्था में भी दिखनी चाहिए। देशभक्ति का अर्थ केवल राष्ट्रगान के समय खड़ा होना नहीं है। देशभक्ति का एक दूसरा और कहीं अधिक कठिन रूप भी है, अपने नागरिक के जीवन को बेहतर बनाना।

अगर किसी दूरदराज गांव की गर्भवती महिला को समय पर अस्पताल नहीं मिलता, अगर किसी मरीज को विशेषज्ञ चिकित्सक के लिए चंडीगढ़, या दिल्ली जाना पड़ता है, अगर किसी बच्चे को शिक्षक की कमी से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिलती, अगर किसी युवा की उम्र प्रतियोगी परीक्षाओं के इंतजार में निकल जाती है, अगर किसी किसान की सड़क बंद होने से उसकी फसल बाजार तक नहीं पहुंचती, तो इन समस्याओं का समाधान भी राष्ट्रसेवा ही है।

राष्ट्रगान पर खड़ा होना सम्मान है, लेकिन जनता के लिए खड़ा होना जनप्रतिनिधि का कर्तव्य है। हिमाचल का असली राष्ट्रवाद शायद इसी में है कि पहाड़ के आखिरी गांव तक सड़क पहुंचे, अस्पताल पहुंचे, इंटरनेट पहुंचे, शिक्षक पहुंचे, रोजगार के अवसर पहुंचें और आपदा के समय सरकार सबसे पहले प्रभावित परिवार के दरवाजे तक पहुंचे।

हिमाचल की अर्थव्यवस्था भी गंभीर सवाल पूछ रही है
इन राजनीतिक विवादों के बीच प्रदेश की वित्तीय स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 2026-27 के बजट विश्लेषण के मुताबिक हिमाचल का राजस्व घाटा 6,577 करोड़ रुपये और राजकोषीय घाटा 9,698 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। राज्य की बकाया देनदारियां जीएसडीपी के करीब 40.5 प्रतिशत तक रहने का अनुमान लगाया गया है।

यह केवल आंकड़े नहीं हैं। इनका सीधा संबंध उस हिमाचली परिवार से है जो पूछता है कि सरकार के पास उसके लिए कितने संसाधन उपलब्ध हैं। जब आर्थिक संसाधन सीमित हों, तब विधानसभा में हर मिनट और हर बहस की कीमत बढ़ जाती है। ऐसे समय में राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे प्रतीकात्मक विवादों से आगे बढ़कर नीति, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, पर्यटन, कृषि, बागवानी, जल संसाधन और आपदा पुनर्वास जैसे विषयों पर ठोस बहस करें।

बजट के आंकड़े यह भी बताते हैं कि 2026-27 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के लिए 3,203 करोड़ रुपये और शिक्षा, खेल, कला एवं संस्कृति के लिए 9,806 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया गया है। वहीं सड़कों और पुलों के लिए पूंजीगत व्यय के रूप में 1,322 करोड़ रुपये का अनुमान है। सवाल बजट में रकम होने या न होने का ही नहीं है। सवाल यह है कि इन पैसों का वास्तविक असर जमीन पर कितना दिखाई देता है?

पहाड़ की सड़क सिर्फ सड़क नहीं, जीवन की लाइफलाइन है
मैदानी इलाकों में सड़क खराब होने का मतलब कुछ किलोमीटर का अतिरिक्त सफर हो सकता है। लेकिन हिमाचल में खराब सड़क का अर्थ कई बार अस्पताल तक पहुंचने में देरी, फल-सब्जियों के नुकसान, स्कूल तक पहुंच की मुश्किल और पर्यटन व्यवसाय को नुकसान होता है।

हर मानसून के साथ भूस्खलन, बादल फटना, सड़क टूटना और पुलों को नुकसान हिमाचल की नियति जैसा दिखाई देने लगा है। 2026 के मानसून में 15 अगस्त तक राज्य में मौसम और सड़क हादसों से जुड़ी घटनाओं में 183 मौतें और 972 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान दर्ज किया गया था।

साल 2025 और उससे पहले की आपदाओं ने भी लाखों परिवारों को प्रभावित किया था। सरकारी सहायता के तहत पूरी तरह क्षतिग्रस्त या रहने योग्य न रह गए घरों के लिए किराये की सहायता जारी करनी पड़ी; रिपोर्ट के अनुसार साल 2025 की आपदा से करीब 16,488 परिवार प्रभावित हुए, जबकि 2,246 मकान पूरी तरह और 7,888 मकान आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए थे। ऐसे परिवारों के लिए विधानसभा में सबसे बड़ा राष्टगान और राष्ट्रगीत शायद यही होगा कि उन्हें उनका घर वापस मिले।

बेरोजगार युवा किसी नारे से नहीं, अवसर से संतुष्ट होगा
हिमाचल का युवा पढ़ रहा है, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है, आवेदन कर रहा है, फीस भर रहा है और वर्षों तक परिणाम या भर्ती प्रक्रिया का इंतजार भी कर रहा है। युवा को राजनीतिक भाषण नहीं, पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया, समयबद्ध परीक्षाएं, समय पर परिणाम और रोजगार के वास्तविक अवसर चाहिए।

सरकारी नौकरी महत्वपूर्ण है, लेकिन हिमाचल की अर्थव्यवस्था को केवल सरकारी नौकरियों के सहारे आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। पर्यटन, आईटी, कृषि-प्रसंस्करण, बागवानी, फार्मा, नवीकरणीय ऊर्जा, स्थानीय हस्तशिल्प और छोटे उद्योगों में ऐसे अवसर पैदा करने होंगे जिनसे युवा अपने ही प्रदेश में सम्मानजनक आय कमा सके। अन्यथा पहाड़ की सबसे बड़ी पूंजी, उसकी युवा आबादी लगातार राज्य के बाहर बाहर जाती रहेगी।

स्वास्थ्य व्यवस्था: आंकड़ों से आगे जमीन की हकीकत
हिमाचल में स्वास्थ्य पर खर्च जरूरी है, लेकिन सवाल यह है कि ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों के अस्पतालों में डॉक्टर, विशेषज्ञ, नर्सिंग स्टाफ, जांच सुविधाएं और आवश्यक दवाइयां कितनी उपलब्ध हैं। सरकार ने स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा को प्राथमिकता देने की बात कही है और बजट में चिकित्सा शिक्षा, प्रशिक्षण एवं अनुसंधान के लिए 879 करोड़ रुपये तथा राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के लिए 485 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

लेकिन हिमाचल का नागरिक बजट दस्तावेज नहीं, अस्पताल की वास्तविक सुविधा देखता है। जिस दिन उसे अपने गांव या नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र में समय पर सही इलाज मिलने लगेगा, उस दिन उसे विकास का अर्थ समझाने के लिए किसी भाषण की जरूरत नहीं होगी।

शिक्षा केवल भवन और घोषणाओं का नाम नहीं
हिमाचल लंबे समय से शिक्षा के क्षेत्र में अपनी पहचान रखता है। लेकिन बदलते समय में केवल साक्षरता पर्याप्त नहीं है। अब सवाल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शिक्षक उपलब्धता, डिजिटल शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और रोजगार से जुड़ी शिक्षा का है।

हिमाचल के बच्चे प्रतियोगिता केवल दूसरे पहाड़ी राज्यों से नहीं, देश के महानगरों और दुनिया के युवाओं से कर रहे हैं। इसलिए विधानसभा में यह बहस भी होनी चाहिए कि अगले दस वर्षों में हिमाचल की शिक्षा व्यवस्था को किस स्तर तक ले जाना है।

कर्मचारियों और अपने समर्थकों से आगे भी है हिमाचल
कर्मचारी किसी भी सरकार की व्यवस्था की रीढ़ होते हैं। उनकी जायज मांगों पर चर्चा और समाधान जरूरी है। लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि सरकार की नजर केवल संगठित और प्रभावशाली वर्गों तक सीमित नहीं हो सकती।

उस छोटे दुकानदार की भी सरकार है जो महंगाई में अपना कारोबार बचाने की कोशिश कर रहा है। उस दिहाड़ी मजदूर की भी सरकार है जिसे हर दिन काम मिलने की गारंटी नहीं। उस किसान की भी सरकार है जिसकी फसल मौसम और बाजार दोनों के भरोसे है। उस बागवान की भी सरकार है जिसकी मेहनत सड़क, मंडी और कीमतों के बीच फंस जाती है। उस बेरोजगार युवक की भी सरकार है जिसके हाथ में डिग्री है लेकिन नौकरी नहीं। और उस आपदा प्रभावित परिवार की भी सरकार है जो आज भी अपने उजड़े आशियाने को देखकर पूछता है, क्या मेरा दर्द विधानसभा तक पहुंचा है?

विपक्ष की भी उतनी ही जिम्मेदारी है
यह सवाल केवल सत्ता पक्ष से नहीं पूछा जाना चाहिए। विपक्ष लोकतंत्र की आंख और कान है। लेकिन विपक्ष की भूमिका केवल हंगामा, नारेबाजी और सरकार को घेरने तक सीमित नहीं हो सकती। उसे वैकल्पिक नीति, ठोस आंकड़े और समाधान के रास्ते भी सदन के सामने रखने होंगे।

इसके अलावा सत्ता पक्ष को विपक्ष की आलोचना सुननी होगी और विपक्ष को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि आलोचना के नाम पर सदन का समय ऐसे विवादों में न चला जाए जिनसे आम आदमी की जिंदगी में कोई ठोस बदलाव नहीं आने वाला।

लोकतंत्र में शोर आसान है, समाधान कठिन।
आम जनता ने अपने विधायकों को शोर के लिए नहीं, समाधान के लिए चुना है। ऐसे में विधानसभा का असली एजेंडा क्या होना चाहिए?, विधानसभा में राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का सम्मान हो इसमें कोई विवाद नहीं होना चाहिए। लेकिन उसी सदन में यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि हिमाचल के मूल सवालों पर पर्याप्त समय मिले।
विधानसभा को पूछना चाहिए—

  • कितने युवाओं को अगले एक साल में रोजगार मिलेगा?
  • कितने अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध होंगे?
  • कितनी सड़कों का स्थायी समाधान होगा?
  • कितने आपदा प्रभावित परिवारों का पुनर्वास पूरा होगा?
  • किसान और बागवान की आय बढ़ाने के लिए कौन-सी नई नीति लागू होगी?
  • राज्य के बढ़ते कर्ज और सीमित संसाधनों के बीच वित्तीय अनुशासन कैसे कायम होगा?
  • पलायन रोकने के लिए पहाड़ में रोजगार के कौन-से नए मॉडल तैयार होंगे?
  • पर्यटन को केवल होटल और सीजन तक सीमित रखने के बजाय पूरे साल की अर्थव्यवस्था कैसे बनाया जाएगा?
  • और सबसे महत्वपूर्ण—हिमाचल के पर्यावरण, जल, जंगल और जमीन के साथ विकास का संतुलन कैसे बनाया जाएगा?

यही वे सवाल हैं जिनका जवाब आने वाली पीढ़ियां मांगेंगी।

इतिहास नेताओं के नारों से नहीं, फैसलों से लिखा जाता है
विधानसभा की कार्यवाही कुछ दिनों की होती है, लेकिन उसके फैसलों का असर वर्षों तक रहता है। आज अगर सदन का समय राष्ट्रगान बनाम राष्ट्रगीत की राजनीतिक बहस में गुजर जाता है, तो कल इतिहास यह भी पूछेगा कि उस समय जब हिमाचल सड़क, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, महंगाई, आपदा और वित्तीय संकट जैसी चुनौतियों से जूझ रहा था, तब उसके निर्वाचित प्रतिनिधि किस मुद्दे पर बहस कर रहे थे?

देशभक्ति की परीक्षा केवल इस बात से नहीं होती कि हम राष्ट्रगान के दौरान कितनी देर खड़े रहे। देशभक्ति की एक परीक्षा यह भी है कि हम अपने नागरिक को कितनी मजबूती से खड़ा करते हैं। किसी आपदा में अपना घर खो चुके परिवार को दोबारा घर देना राष्ट्रसेवा है। किसी बेरोजगार युवा को रोजगार के अवसर देना राष्ट्रसेवा है।किसी गरीब मरीज को समय पर इलाज देना राष्ट्रसेवा है। किसी पहाड़ी गांव को सालभर सड़क से जोड़ना राष्ट्रसेवा है। किसी बच्चे को बेहतर शिक्षा देना राष्ट्रसेवा है। और सरकारी खजाने के हर रुपये का ईमानदारी और समझदारी से इस्तेमाल करना भी राष्ट्रसेवा है।

राष्ट्रगान पर विवाद खत्म हो जाएगा। राष्ट्रगीत पर बहस भी किसी दिन थम जाएगी। लेकिन हिमाचल की समस्याएं तब तक नहीं थमेंगी, जब तक उनके स्थायी समाधान नहीं निकलते। इसलिए आज सबसे जरूरी सवाल यही है, क्या हिमाचल की विधानसभा प्रतीकों की राजनीति से ऊपर उठकर हिमाचल के भविष्य की राजनीति करेगी?, क्योंकि पहाड़ की जनता को अब केवल तालियों, नारों और हंगामे की जरूरत नहीं है।

उसे सड़क चाहिए, अस्पताल चाहिए, शिक्षा चाहिए, रोजगार चाहिए, सुरक्षित भविष्य चाहिए और आपदा के बाद अपने पैरों पर खड़े होने का भरोसा चाहिए, और शायद यही वह बिंदु है जहां राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा अर्थ निकलता है—राष्ट्र के प्रतीकों का सम्मान करते हुए राष्ट्र के नागरिकों के जीवन का सम्मान करना भी जरुरी है।

विधानसभा में राष्ट्रगान गूंजे, राष्ट्रगीत गूंजे—लेकिन उसके साथ जनता की आवाज भी गूंजनी चाहिए। वरना सदन के भीतर शोर बहुत होगा, मगर सदन के बाहर खड़ा हिमाचल फिर भी पूछता रहेगा—“मेरे सवालों का जवाब कौन देगा?”

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