Chamba Health Crisis: हिमाचल प्रदेश के सबसे दुर्गम क्षेत्रों में शामिल चंबा जिले में स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर सामने आ रही गंभीर तस्वीरें केवल किसी एक अस्पताल की अव्यवस्था या डॉक्टरों की कमी तक सीमित नहीं हैं। यह उस पूरे स्वास्थ्य मॉडल पर बड़ा सवाल खड़ा करती है, जिसे प्रदेश के सभी जिलों में लगभग एक जैसी परिस्थितियों के तहत लागू करने की कोशिश की जाती रही है।
चंबा की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियां बेहद कठिन हैं, जिसके कारण यहां की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए सामान्य नियमों से हटकर एक अलग सोच और विशेष नीति की सख्त आवश्यकता महसूस की जा रही है। हाल ही में चंबा मेडिकल कॉलेज में हुई डेढ़ वर्षीय बच्ची की मौत के मामले में परिजनों द्वारा समय पर उपचार न मिलने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
हालांकि, इस मामले की जांच के लिए समिति का गठन किया जा चुका है और अंतिम निष्कर्ष जांच रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट होगा। लेकिन यह दर्दनाक घटना एक बार फिर उस गंभीर सवाल को ज़ोर देकर उठाती है कि क्या चंबा में गंभीर रोगियों को वक्त पर विशेषज्ञ उपचार देने की व्यवस्था सचमुच काफ़ी है?,
सरकारी आंकड़े और रिपोर्ट इस पूरी स्थिति की भयावहता को स्पष्ट रूप से बयां करते हैं। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2023 तक चंबा के प्राथमिक और माध्यमिक स्वास्थ्य संस्थानों में स्वीकृत मानव संसाधन के मुकाबले करीब 55 प्रतिशत की भारी कमी दर्ज की गई थी। इसके अलावा, नवंबर 2025 में आरटीआई के माध्यम से सामने आए आंकड़ों से यह भी खुलासा हुआ कि जिले में 59 मेडिकल ऑफिसर और 85 स्टाफ नर्स के पद लंबे समय से रिक्त चल रहे हैं।
चंबा जिला का यह संकट केवल पदों के खाली होने तक सीमित नहीं है, बल्कि मूल समस्या यह है कि डॉक्टर दुर्गम क्षेत्रों में जाना क्यों नहीं चाहते और यदि पहुंच भी जाते हैं, तो वहां टिकते क्यों नहीं हैं। इस बात को खुद हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू भी विधानसभा में कह चुके हैं, उनके अनुसार हिमाचल सरकार 5 लाख वेतन देने को तैयार फिर भी डॉक्टर चंबा नहीं जाते।
चंबा की दूरदराज की पंचायतों से जिला मुख्यालय तक का सफर तय करने में ही कई घंटे लग जाते हैं। खराब मौसम, भारी भूस्खलन और सड़कों के बंद होने जैसी आपातकालीन परिस्थितियों में मरीज को समय पर हायर सेंटर रेफर करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होता है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने भी किलाड़ स्वास्थ्य केंद्र में कर्मचारियों की भारी कमी का स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार को रिक्तियों को तुरंत भरने के निर्देश दिए थे।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, वहां स्वीकृत 12 मेडिकल ऑफिसर के पदों में से केवल छह पर ही तैनाती थी, जबकि सात स्टाफ नर्स के पद भी रिक्त पड़े थे। मेडिकल कॉलेज की स्थिति भी इससे अलग नहीं है, जहां मई 2026 की रिपोर्ट बताती है कि स्वीकृत पदों के मुकाबले लगभग आधे डॉक्टरों के सहारे ही काम चलाया जा रहा है।
सरकार की तरफ से चंबा मेडिकल कॉलेज को आधुनिक सुविधाओं से लैस करने के लिए कई बड़े कदम उठाए गए हैं। लगभग 400 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले 500 बिस्तरों वाले नए स्थायी परिसर का निर्माण कार्य भी अब अपने अंतिम चरण में है। इसके अलावा, अस्पताल में नई सीटी स्कैन मशीन, 3-टेस्ला एमआरआइ, एक्स-रे, लैप्रोस्कोपिक उपकरण और अतिरिक्त स्टाफ उपलब्ध कराने की घोषणाएं भी की गई हैं।
बावजूद इसके, बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि क्या केवल भव्य इमारतें और महंगी मशीनें चंबा की इस गहरी स्वास्थ्य समस्या का स्थाई समाधान कर सकती हैं। जानकारों और स्थानीय लोगों का मानना है कि जब तक जमीनी स्तर पर डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, तकनीकी विशेषज्ञ और जरूरी जांच सुविधाएं नियमित रूप से उपलब्ध नहीं होंगी, तब तक ये आधुनिक मशीनें अपेक्षित परिणाम देने में असमर्थ रहेंगी। चंबा को अब केवल घोषणाओं की नहीं, बल्कि धरातल पर उतरने वाली एक मजबूत व्यवस्था की जरूरत है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को अब ‘एक नीति, सभी जिलों के लिए’ वाले पारंपरिक नजरिए से बाहर निकलना होगा। चंबा की भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए एक ऐसी विशेष स्वास्थ्य नीति की आवश्यकता है, जिसमें डॉक्टरों को केवल आकर्षक वेतन ही नहीं, बल्कि सरकारी आवास, बच्चों की बेहतर शिक्षा, कार्यस्थल पर अनुकूल वातावरण और दुर्गम क्षेत्रों में लंबे समय तक सेवाएं देने के लिए विशेष प्रोत्साहन भत्ते दिए जाएं। यदि अधिक वेतन के बावजूद डॉक्टर वहां जाने से कतराते हैं, तो इसके मूल कारणों का गहराई से अध्ययन करना होगा।
भविष्य की योजनाओं को लेकर यह भी जरूरी है कि सरकार हर पांच साल में नीतियां बदलने के बजाय अगले 10 से 15 वर्षों का एक स्पष्ट रोडमैप तैयार करे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किस क्षेत्र में कितने डॉक्टर चाहिए, कौन-कौन से विशेषज्ञ अनिवार्य हैं, किन स्वास्थ्य संस्थानों को मजबूत करना है और गंभीर मरीज को जिला मुख्यालय तक पहुंचने से पहले कौन-सी सेवाएं उपलब्ध करानी हैं।
चंबा के लोगों की समस्या आज की नहीं है। वर्षों से चली आ रही कमियां धीरे-धीरे ऐसी स्थिति तक पहुंची हैं जहां छोटी-सी कमी भी किसी परिवार के लिए जीवन-मृत्यु का सवाल बन सकती है। सरकारों को अब यह समझना होगा कि चंबा को शिमला, सोलन या ऊना के पैमाने पर मापकर स्वास्थ्य व्यवस्था नहीं दी जा सकती। चंबा की परिस्थितियां अलग हैं, इसलिए समाधान भी अलग होना चाहिए।
किसी अस्पताल की नई इमारत का उद्घाटन करना आसान है, लेकिन उस इमारत में हर दिन डॉक्टर, नर्स, विशेषज्ञ, दवाइयां और जांच की सुविधा उपलब्ध रखना असली चुनौती है। चंबा को अब घोषणाओं से अधिक स्थायी व्यवस्था चाहिए। क्योंकि आखिरकार सवाल बजट का ही नहीं है, सवाल यह है कि दुर्गम पहाड़ में रहने वाले नागरिक की जिंदगी की कीमत मैदानी क्षेत्र के नागरिक से कम तो नहीं है?


















