DSP Vijay Raghuvanshi Case: डीएसपी विजय रघुवंशी से जुड़े कथित जातिगत उत्पीड़न और संस्थागत प्रताड़ना के मामले में गुरुवार को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक आयोग की ओर से व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के निर्देश के बावजूद हिमाचल प्रदेश के पुलिस महानिदेशक अशोक तिवारी आयोग के समक्ष पेश नहीं हुए। बता दें कि मामले की गंभीरता को देखते हुए आयोग ने सुनवाई की तारीख पर डीजीपी को केस से संबंधित सभी मूल फाइलों, केस डायरी और अब तक की गई कार्रवाई रिपोर्ट सहित आवश्यक अभिलेख प्रस्तुत करने का आदेश दिया था।
सूत्रों के मुताबिक इससे पहले डीजीपी अशोक तिवारी ने 20 अगस्त को होने वाली सुनवाई में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से शामिल होने की अनुमति मांगी थी। डीजीपी ने आयोग के समक्ष दिए गए अपने आवेदन में हिमाचल प्रदेश विधानसभा के चालू मानसून सत्र और राज्य में कानून-व्यवस्था व सुरक्षा संबंधी प्रशासनिक व्यस्तताओं का हवाला दिया था। हालांकि, आयोग ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया था।

चूंकि सुनवाई की निर्धारित तारीख बीत चुकी है और डीजीपी अशोक तिवारी आयोग के निर्देश के बावजूद व्यक्तिगत रूप से राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष उपस्थित नहीं हुए, ऐसे में अब आयोग की अगली कार्रवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है। जानकारों के मुताबिक आयोग मामले में अगली सुनवाई की तारीख तय करने के साथ-साथ डीजीपी की अनुपस्थिति और आयोग के निर्देशों के अनुपालन को लेकर उपलब्ध कानूनी प्रावधानों के तहत आगे की कार्रवाई पर विचार कर सकता है।
सूत्रों के अनुसार, आयोग मामले को गंभीरता से ले रहा है। मामला एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से जुड़े आरोपों और राष्ट्रीय स्तर के संवैधानिक आयोग के समक्ष लंबित होने के कारण महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि सुनवाई के दौरान शिकायत में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो आयोग अपने अधिकार क्षेत्र और संवैधानिक शक्तियों के तहत संबंधित अधिकारियों को आवश्यक निर्देश या सख्त सिफारिशें जारी कर सकता है।
हालांकि, डीजीपी की अनुपस्थिति के आधार पर सीधे अवमानना की कार्रवाई शुरू होगी, ऐसा अभी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। यह आयोग के अगले आदेश और अनुपस्थिति के कारणों के आकलन के बाद ही स्पष्ट होगा। आयोग द्वारा पहले ही व्यक्तिगत उपस्थिति के निर्देश दिया जाना इस मामले की गंभीरता का संकेत जरूर माना जा रहा है।
बता दें कि आयोग ने शिकायत में लगाए गए आरोपों की गंभीरता को देखते हुए डीजीपी को व्यक्तिगत उपस्थिति दर्ज करने के निर्देश दिए थे। शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से पुलिस विभाग पर कथित तौर पर मनगढ़ंत या आधारहीन रिपोर्ट तैयार करने, लक्षित उत्पीड़न, चयनात्मक कार्रवाई, पद के दुरुपयोग और सरकार को कथित रूप से प्रतिकूल रिपोर्ट भेजने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
सरकारी वाहन वापस लेने और वेतन से कटौती का आरोप
मामले में सरकारी वाहन वापस लिए जाने का मुद्दा भी प्रमुखता से सामने आया है। शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि डीएसपी विजय रघुवंशी से उनका संलग्न सरकारी वाहन वापस ले लिया गया। इसके बाद उन्हें करीब छह किलोमीटर पैदल कार्यालय जाना पड़ा। शिकायत में वाहन से संबंधित वेतन से कथित तौर पर 750 रुपये प्रतिमाह की कटौती और इससे जुड़े सरकारी रिकॉर्ड का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि, वाहन वापस लेने की परिस्थितियों, वेतन से की गई कथित कटौती और संबंधित अभिलेखों की वास्तविक स्थिति का अंतिम निर्धारण उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड और आयोग के समक्ष होने वाली कार्यवाही से ही स्पष्ट होगा।
DM को दिया प्रतिनिधित्व भी बना कार्रवाई का आधार
मामले का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू जिला मजिस्ट्रेट, शिमला को दिए गए प्रतिनिधित्व से जुड़ा है। शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि अपनी सेवा, प्रशासनिक स्थिति और संबंधित शिकायत को लेकर डीएम को दिया गया प्रतिनिधित्व भी बाद में कथित तौर पर अनुशासनहीनता के रूप में प्रस्तुत किया गया।
शिकायतकर्ता पक्ष के अनुसार, इसी आधार पर उनके खिलाफ निलंबन और विभागीय कार्रवाई शुरू करने की सिफारिश की गई। इस घटनाक्रम को लेकर शिकायतकर्ता पक्ष ने सवाल उठाया है कि किसी अधिकारी द्वारा अपनी सेवा या प्रशासनिक स्थिति से संबंधित विषय पर जिला प्रशासन के समक्ष प्रतिनिधित्व करना किन परिस्थितियों में अनुशासनहीनता माना गया। हालांकि, इस संबंध में विभाग का पक्ष और संबंधित कार्रवाई के आधिकारिक आधार भी महत्वपूर्ण होंगे, जिनके सामने आने के बाद ही पूरे मामले की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
डीजीपी की अनुपस्थिति पर आयोग के रुख पर नजर
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत अनुसूचित जातियों के संवैधानिक और वैधानिक संरक्षण से जुड़े मामलों की जांच और निगरानी करने वाला संवैधानिक निकाय है। आयोग द्वारा डीजीपी अशोक तिवारी को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के निर्देश दिए गए थे। निर्धारित सुनवाई के दिन उनके व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं होने के बाद अब आयोग के अगले कदम पर नजर है।
शिकायतकर्ता पक्ष का कहना है कि जब आयोग ने मामले की गंभीरता को देखते हुए व्यक्तिगत उपस्थिति के निर्देश दिए थे, तो संबंधित अधिकारी को आयोग के समक्ष उपस्थित होकर रिकॉर्ड और तथ्यों के आधार पर अपना पक्ष रखना चाहिए था। हालांकि, डीजीपी की अनुपस्थिति के कारणों और आयोग के समक्ष उनकी ओर से कोई प्रतिनिधित्व या स्पष्टीकरण दिया गया है या नहीं, इसकी स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही इस संबंध में कोई अंतिम निष्कर्ष निकाला जा सकता है।
‘आरोपों का जवाब देने के बजाय अनुपस्थिति क्यों?’
शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से सवाल उठाया गया है कि जब राज्य पुलिस के शीर्ष स्तर से जुड़े गंभीर आरोप आयोग के समक्ष विचाराधीन हैं, तो व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर रिकॉर्ड के आधार पर स्थिति स्पष्ट करना अधिक उचित होता। पक्ष का कहना है कि यदि डीजीपी की अनुपस्थिति के पीछे कोई वैधानिक या अपरिहार्य कारण था, तो उसे आयोग के समक्ष विधिवत रखा जा सकता था। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आयोग उनकी अनुपस्थिति और मामले में आगे की कार्यवाही को किस तरह देखता है।
कई घटनाओं को जोड़कर कार्रवाई का पैटर्न होने का दावा
विजय रघुवंशी पक्ष का कहना है कि मामले से जुड़े विभिन्न घटनाक्रमों को अलग-अलग प्रशासनिक फैसलों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। शिकायतकर्ता पक्ष के अनुसार, तबादला आदेश के बाद पांवटा साहिब में कार्यभार ग्रहण करने से कथित तौर पर रोकने का प्रयास, डीजीपी स्तर पर कथित हस्तक्षेप, एसपी सिरमौर और दक्षिणी रेंज के अधिकारियों की कथित भूमिका, निगरानी, निलंबन एवं विभागीय कार्रवाई की सिफारिश, सरकारी वाहन वापस लेना, चिकित्सा स्थिति की कथित अनदेखी और प्रतिकूल रिपोर्ट जैसे घटनाक्रमों को एक साथ देखा जाना चाहिए।
शिकायतकर्ता पक्ष का दावा है कि इन सभी घटनाओं को एक साथ देखने पर लक्षित और चयनात्मक कार्रवाई का कथित पैटर्न सामने आता है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और संबंधित अधिकारियों या विभाग का पक्ष सामने आना भी महत्वपूर्ण है।
अब आयोग की अगली कार्रवाई अहम
अब राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष मुख्य सवाल यह है कि शिकायत में लगाए गए आरोपों और संबंधित प्रशासनिक कार्रवाइयों के बीच कोई ऐसा संबंध है या नहीं, जो जातिगत आधार पर कथित उत्पीड़न, संस्थागत प्रताड़ना अथवा पद के दुरुपयोग के आरोपों की पुष्टि करता हो।
डीजीपी की निर्धारित सुनवाई में व्यक्तिगत उपस्थिति नहीं होने के बाद आयोग की अगली कार्रवाई महत्वपूर्ण हो गई है। आयोग मामले में अगली तारीख तय करता है, संबंधित अधिकारियों से अतिरिक्त रिकॉर्ड या स्पष्टीकरण मांगता है अथवा अपनी शक्तियों के तहत कोई अन्य निर्देश जारी करता है—यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।
हालांकि इस मामले में लगाए गए जातिगत उत्पीड़न, संस्थागत प्रताड़ना, पद के दुरुपयोग और अन्य आरोप फिलहाल शिकायतकर्ता पक्ष के दावे हैं। इन आरोपों की अंतिम सत्यता अभी स्थापित नहीं हुई है। मामले में अंतिम स्थिति आयोग की कार्यवाही, उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड, संबंधित पक्षों के जवाब और सक्षम जांच के आधार पर ही स्पष्ट होगी।


















