Himachal News Today: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सोलन जिले के बड़ोग, कुमारहट्टी और इसके साथ लगते इलाकों में बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध निर्माण, अनियंत्रित पहाड़ी कटान और पर्यावरण से जुड़े नियमों की अनदेखी पर सख्त कदम उठाया है। मुख्य न्यायाधीश जीएस संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन सी नेगी की खंडपीठ ने इस मामले में दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए इन प्रभावित क्षेत्रों में छह मंजिलों से अधिक के भवनों के निर्माण पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।
दरअसल यह आदेश ‘अर्थ हीलर्स फाउंडेशन’ नामक एनजीओ की ओर से दायर याचिका पर आया है। हाई कोर्ट ने टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग सोलन को कड़े निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा है कि विभाग यह सुनिश्चित करे कि तय सीमा से ऊपर न तो कोई नया निर्माण कार्य शुरू हो और न ही पहले से बने फ्लैटों की फिनिशिंग का काम किया जाए। मामले की अगली सुनवाई अब 17 अगस्त को तय की गई है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने अदालत के सामने कुछ तस्वीरें पेश कीं, जिनमें पहाड़ियों को बेरहमी से साफ करने और ग्रीन कवर को बड़े पैमाने पर हटाए जाने का सच सामने आया। इन साक्ष्यों को देखने के बाद हाई कोर्ट ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि वन विभाग इस पूरे मामले पर आंखें मूंदे बैठा है, जबकि मौके पर कटे हुए पेड़ों के ढेर साफ तौर पर दिखाई दे रहे हैं।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने प्रदेश के प्रधान सचिव (राजस्व) को वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की एक विशेष टीम गठित करने का आदेश दिया है। यह टीम प्रभावित इलाकों का जमीनी दौरा करेगी और इस बात का पता लगाएगी कि क्षेत्र के ग्रीन कवर में कितनी कमी आई है। साथ ही टीम इस बात की भी जांच करेगी कि जो पेड़ काटे गए, उनकी मार्किंग नियमानुसार की गई थी या नहीं।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि स्थानीय लोग इन जमीनों को विकसित कर बाहरी राज्यों के लोगों को फ्लैट बेच रहे हैं। इसके अलावा नियमों को ताक पर रखकर अवैध बोरवेल खोदे जा रहे हैं। याचिकाकर्ता ने इन बेनामी संपत्तियों और अवैध गतिविधियों की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय एसआईटी (SIT) के गठन की भी मांग की है। अदालत ने राज्य सरकार और मामले से जुड़े अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर इस पूरे प्रकरण पर जवाब मांगा है।
नियमों की अनदेखी और बेनामी सौदों के आरोप
जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि रसूखदार बिल्डरों ने नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए बिना किसी स्वीकृत नक्शे और ‘स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी सर्टिफिकेट’ के इस बेल्ट में 10-10 मंजिल ऊंची इमारतें खड़ी कर दी हैं। अंधाधुंध हिल कटिंग और अवैध रूप से किए जा रहे भारी कमर्शियल बोरिंग के कारण क्षेत्र के तीन गांवों के पारंपरिक जलस्रोत पूरी तरह सूख चुके हैं, जिससे स्थानीय जनता पानी के लिए तरस रही है।
याचिकाकर्ता संस्था की अध्यक्ष डॉ. प्रिया सकलानी ने कोर्ट को बताया कि बाहरी राज्यों के खरीदारों और बिल्डरों को फायदा पहुंचाने के लिए हिमाचल प्रदेश किरायेदारी और भूमि सुधार अधिनियम (HP Tenancy and Land Reforms Act, 1972) की धारा 118 का खुला उल्लंघन किया जा रहा है। स्थानीय लोगों के नाम पर करोड़ों रुपये के बेनामी भूमि सौदे कर फ्लैट्स बनाए जा रहे हैं और उन्हें बाहरी लोगों को बेचा जा रहा है। संस्था का यह भी आरोप है कि इन अवैध बहुमंजिला इमारतों में बिना किसी पंजीकरण के कमर्शियल होमस्टे चलाए जा रहे हैं, जो अनैतिक गतिविधियों और अवैध नशे के कारोबार के केंद्र बनते जा रहे हैं।
जांच के लिए एसआईटी गठन की मांग
संस्था का कहना है कि उन्होंने पूर्व में टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (TCP), वन विभाग और राजस्व विभाग को इस विनाश के खिलाफ लिखित साक्ष्य सौंपे थे, लेकिन अधिकारियों की चुप्पी के कारण उन्हें अदालत की शरण लेनी पड़ी। याचिका में अवैध बोरवेल खोदने और बेनामी संपत्तियों की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय एसआईटी (SIT) के गठन की भी मांग की गई है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सरकार और प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।


















