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सिरमौर में देवता के नाम पर ‘पर्ची प्रणाली’ से पंचायत चुनाव, दलित नेता ने उठाए सवाल – कहा, सरकारी खजाने से न हो खर्च

Himachal News: हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के शिलाई क्षेत्र में बिना मतदान के पंचायत चुनाव संपन्न कराने का हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जिसके बाद दलित नेता ने इसे असंवैधानिक बताते हुए जांच की मांग की है।
Himachal Panchayat Election सिरमौर में देवता के नाम पर 'पर्ची प्रणाली' से पंचायत चुनाव, दलित नेता ने उठाए सवाल - सरकारी खजाने से न हो खर्च

Himachal Panchayat Election: सिरमौर जिले के शिलाई क्षेत्र की ग्राम पंचायत टटियाना से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां पंचायत चुनाव कथित तौर पर मतदान के बजाय देवता के नाम पर “पर्ची प्रणाली” से पूरा कर लिया गया। जानकारी के मुताबिक इस प्रक्रिया में गांव के कुल 4 नामी ब्राह्मण परिवारों के नामों की पर्चियां डालकर बीडीसी, प्रधान और उप प्रधान का चयन कर दिया गया, जिसे लेकर अब बड़ा विवाद खड़ा हो गया है।

हिमाचल प्रदेश के दलित नेता रवि कुमार ने इस पूरी प्रक्रिया को असंवैधानिक बताते हुए इस पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह लोकतंत्र की मूल भावना के साथ सीधा खिलवाड़ है, क्योंकि चुनाव में वोटिंग ही नहीं करवाई गई। उनका कहना है कि इस प्रक्रिया में न केवल दलितों के साथ अन्याय हुआ, बल्कि ठाकुर-राजपूत सहित अन्य लोगों को भी उनके अधिकार नहीं मिले।

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जानकारी के मुताबिक इसी प्रक्रिया के तहत कथित तौर पर पूनम शर्मा को प्रधान, दाता राम शर्मा को उपप्रधान और प्रियंका शर्मा को बीसीसी सदस्य के रूप में नियुक्त कर दिया गया। यह पूरा चयन बिना मतदान के किया गया, जिससे पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, गांव में महासू महाराज को साक्षी मानकर चार प्रमुख नामों की पर्चियां डाली गईं और उसी आधार पर पंचायत का गठन कर दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम में न तो आम मतदाताओं को वोट देने का अवसर मिला और न ही पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया अपनाई गई।

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रवि कुमार ने आरोप लगाया कि चयनित सभी नाम सामान्य वर्ग से हैं और अनुसूचित जाति का एक भी प्रतिनिधि पंचायत में शामिल नहीं है। उन्होंने इसे सामाजिक न्याय और संविधान की मूल भावना के खिलाफ बताया। उन्होंने कहा कि लौटे में चावल डालकर और चार पर्चियां डालकर, जिसमें अन्य वर्गों के लोगों को बाहर रखकर चुनाव करना पूरी तरह से असंवैधानिक है।

उन्होंने कहा, “अगर पर्ची ही निकालनी थी तो सभी वर्गों के उन लोगों के नाम शामिल होने चाहिए थे जो चुनाव लड़ना चाहते थे। यह प्रक्रिया आम आदमी को चुनाव से बाहर करने जैसी है।” उनका कहना है कि यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक व्यवस्था के बिल्कुल विपरीत है, क्योंकि पंचायत चुनाव में हर मतदाता को वोट देने और हर इच्छुक व्यक्ति को चुनाव लड़ने का अधिकार होता है।

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दलित नेता का कहना है कि अगर पंचायत का गठन देवता के नाम पर किया गया है, तो फिर उसके खर्च का वहन भी उसी परंपरा के तहत होना चाहिए, न कि सरकारी खजाने से। उन्होंने इस पूरे विवाद के बाद अब हिमाचल प्रदेश राज्य चुनाव आयोग से तत्काल संज्ञान लेने की मांग उठाई है। साथ ही, इस पंचायत को असंवैधानिक घोषित कर दोबारा निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराए जाने चाहिए। उनका कहना है कि अगर सीमित परिवारों तक ही सत्ता का दायरा सिमटता है, तो यह न केवल लोकतंत्र बल्कि सामाजिक समानता के सिद्धांतों के लिए भी खतरनाक संकेत है।

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