Himachal News: राष्ट्रीय मंच पर कांग्रेस खुद को दलित, ओबीसी और वंचित वर्गों के हक की सबसे बुलंद आवाज़ बताती है। लेकिन देवभूमि हिमाचल में तस्वीर बिल्कुल उलट नज़र आती है। दरअसल, बीते 22 अक्टूबर को सैकड़ों सवर्ण कार्यकर्ताओं ने यूजीसी अधिसूचना वापस लेने और सवर्ण आयोग के गठन की मांग को लेकर शिमला में सचिवालय का घेराव किया। हालात इतने बिगड़े कि पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा।
सरकार की ओर से प्रदर्शनकारियों से संवाद की ज़िम्मेदारी पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास मंत्री अनिरुद्ध सिंह को सौंपी गई। ज्ञापन लेने के बाद शाही परिवार से आने वाले इस मंत्री ने कह दिया कि उनकी निजी राय में सवर्णों के लिए आयोग बनना चाहिए। इतना ही नहीं, उन्होंने कानून हाथ में लेने वालों और दबंगई दिखाने वालों के खिलाफ कार्रवाई न करने की बात भी कही। तो क्या मंत्री जी कानून और न्याय व्यवस्था से भी ऊपर हैं?
मंत्री की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति सरकार की ज़बान बोलता है। उसकी “निजी राय” भी सार्वजनिक संदेश बन जाती है। सवाल यह है कि जिस पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व सामाजिक न्याय की राजनीति का झंडा उठाए घूमता है, उसके मंत्री को सवर्ण आयोग की वकालत करते समय पार्टी की लाइन क्यों याद नहीं रही? और यह रुख पार्टी की घोषित विचारधारा से मेल खाता है या उसे सीधी चुनौती देता है, इस पर संगठन की चुप्पी क्यों नहीं टूट रही?
यही मांग छह बार के मुख्यमंत्री रहे वीरभद्र सिंह के बेटे और मौजूदा कांग्रेस सरकार में मंत्री विक्रमादित्य सिंह भी उठा चुके हैं। यह पहली बार भी नहीं है। पिछली भाजपा सरकार के कार्यकाल में विधानसभा के भीतर सवर्ण आयोग का मुद्दा उन्होंने ही उठाया था। यानी इस मांग पर दोनों मंत्री अपने-अपने समय में एक ही पाले में खड़े दिखे हैं।
आयोग की ज़रूरत किसे है? जवाब आंकड़े नहीं, ज़मीन देती है
हिमाचल को लंबे समय से राजपूतों और ब्राह्मणों का गढ़ माना जाता रहा है। राजनीति, प्रशासन और सत्ता के शीर्ष पदों पर इन्हीं वर्गों की मज़बूत पकड़ रही है। राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्रिमंडल की कुर्सी और अफसरशाही में प्रतिनिधित्व का सवाल कोई भी निष्पक्ष पर्यवेक्षक पूछ सकता है।
दूसरी ओर, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के साथ छुआछूत और भेदभाव की घटनाएं बार-बार सामने आती रही हैं। कहीं मंदिर में प्रवेश से रोका गया, कहीं सार्वजनिक आयोजनों में अलग बैठाया गया, कहीं गांव के श्मशान का इस्तेमाल नहीं करने दिया गया, और शिक्षण संस्थानों में बच्चों तक में भेदभाव की शिकायतें उठीं। ये घटनाएं अलग-अलग मामलों में रिपोर्ट होती रही हैं। आयोग और विशेष कानूनों की ज़रूरत वहीं पड़ती है, जहां हक कागज़ पर तो है, मगर ज़मीन पर नहीं।
बराबरी का तर्क
एक तरफ जहां समर्थकों का कहना है कि हर वर्ग को अपनी बात रखने का अधिकार है। यह बात सही है। लेकिन आलोचकों का जवाब भी उतना ही सीधा है। आयोग का मकसद उन वर्गों को संस्थागत सुरक्षा देना है, जिन्हें इतिहास में हाशिये पर धकेला गया। जिन वर्गों के पास सत्ता और संसाधनों का बड़ा हिस्सा पहले से है, उनके लिए अलग आयोग की मांग कमज़ोरों के लिए बने सुरक्षा-कवच को पतला करने का खतरा पैदा करती है।
अब जवाब की बारी
कांग्रेस नेतृत्व को साफ करना होगा कि हिमाचल में उसकी असली लाइन क्या है। राहुल गांधी की सामाजिक न्याय की बात, या मंत्रियों की “निजी राय”? और जिन वंचित वर्गों के वोट पर पार्टी अपना हक जताती है, उन्हें इसका जवाब कौन देगा?




















