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Himachal News: 71 संगीन मामलों की फाइलें दबाने वाला हिमाचल का ये थाना कैसे बना ‘अव्वल’? SCRB कमेटी पर बड़ा सवालिया निशान..

Baluganj Police Station : जनता का सवाल सीधा है , रैंकिंग किसकी? डेटा की या न्याय की? SCRB और पुलिस मुख्यालय को इस मामले पर जवाब देना चाहिए। वरना यह “अव्वल” थाना सिर्फ कागजों पर ही अव्वल रह जाएगा, हकीकत में नहीं।
Himachal News: 71 संगीन मामलों की फाइलें दबाने वाला हिमाचल का ये थाना कैसे बना ‘अव्वल’? SCRB कमेटी पर लगा सवालिया निशान..

Himachal News: हिमाचल प्रदेश पुलिस इन दिनों मीडिया और सोशल मीडिया में अपनी छवि सुधारने के प्रयासों को लेकर काफी सक्रिय दिखाई दे रही है। प्रेस नोट, डिजिटल उपलब्धियां और रैंकिंग के आंकड़े जारी कर यह संदेश देने की कोशिश हो रही है कि प्रदेश पुलिस व्यवस्था तकनीकी रूप से सशक्त और जवाबदेह हो चुकी है।

देखने और सुनने में यह बात बहुत ही प्रभावी और अच्छी लगती है, लेकिन अगर सही मायने में इनके रिकॉर्ड को खंगाला जाए तो जमीनी सच्चाई कुछ और कहानी कह रही है। दरअसल हिमाचल प्रदेश पुलिस ने हाल ही में वर्ष 2025 की चौथी तिमाही (1 अक्टूबर से 31 दिसंबर) की सीसीटीएनएस (अपराध और अपराधी ट्रैकिंग नेटवर्क एवं प्रणाली) रैंकिंग जारी की है।

एससीआरबी (राज्य अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो) द्वारा तैयार इस रैंकिंग में शिमला का बालूगंज पुलिस थाना 38.80 अंकों के साथ श्रेणी में प्रथम स्थान पर रहा। जिला-वार रैंकिंग में भी शिमला जिला 41.05 अंकों के साथ प्रदेश में पहले नंबर पर रहा। इस रैंकिंग में डिजिटल प्रविष्टि, आईआईएफ (एकीकृत जांच प्रपत्र) और आईसीजेएस खोज प्रदर्शन जैसे मानकों को आधार बनाया गया।

हालांकि यहां सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि एससीआरबी की यह रैंकिंग किस आधार पर तैयार की गई? क्या किसी ने जमीनी वास्तविकता की जांच की, या थानों के रिकॉर्ड की सही से जांच की गई। दरअसल हम यह बात इसलिए कर रहे हैं कि जिस बालूगंज पुलिस थाने को पूरे प्रदेश में अव्वल घोषित किया गया है, लगभग दो सप्ताह पहले वह थाना पूरे प्रदेश की मीडिया की सुर्खियों में था। इसलिए नहीं कि किसी बड़े अपराध को रोकने या अपराधी को पकड़ने के लिए, बल्कि 71 संगीन आपराधिक मामलों की फाइलें वर्षों से दबाने के मामले में।

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उल्लेखनीय है कि दो सप्ताह पूर्व, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्देश पर राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि बालूगंज थाने में 71 संगीन आपराधिक मामलों की फाइलें वर्षों से दबाकर रखी गईं या “पता न चलने योग्य” हैं। इन मामलों में एनडीपीएस, एससी/एसटी अत्याचार निवारण और गंभीर मारपीट जैसे अपराध शामिल बताए गए हैं।

चालान समय पर अदालत में पेश नहीं किए गए, परिणामस्वरूप कई मामले खारिज हो गए। आंतरिक जांच में रिकॉर्ड में हेराफेरी की आशंका भी जताई गई। कुछ दस्तावेजों का संबंध एक सेवानिवृत्त अधिकारी की पदोन्नति से भी जोड़ा गया। अब मूल प्रश्न यह है कि जिस बालूगंज थाने में 71 गंभीर मामलों की फाइलें ही दबा दी गईं, तो वही थाना डिजिटल रैंकिंग में “अव्वल” कैसे हो गया?

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एससीआरबी के अनुसार रैंकिंग पूरी तरह डिजिटल मानकों पर आधारित है, जिसमें आईआईएफ की समयबद्ध प्रविष्टि, आईसीजेएस खोज प्रदर्शन, नागरिक पोर्टल शिकायतों का निस्तारण, आरोपी की फोटो अपलोड, डेटा अद्यतन की गति, अर्थात स्क्रीन पर सब कुछ सुव्यवस्थित और समय पर दर्ज होना चाहिए।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि फिजिकल फाइलें ही गायब हैं, चालान अदालत तक नहीं पहुंचे, तो डिजिटल प्रविष्टि किस आधार पर हुई? क्या केवल कंप्यूटर प्रणाली में दर्ज आंकड़े ही “प्रदर्शन” का प्रमाण हैं? क्या न्यायिक प्रक्रिया का पालन रैंकिंग का हिस्सा नहीं होना चाहिए? यदि डिजिटल पोर्टल पर केस “बंद” दिख रहा है, लेकिन अदालत में वह पेश ही नहीं हुआ—तो यह प्रदर्शन है या प्रबंधन? जब भारी संख्या में फाइलें ही दबा दी गईं, अदालत में चालान नहीं पहुंचे, मामले खारिज होते रहे… फिर सीसीटीएनएस में यह थाना “अव्वल” कैसे?

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एससीआरबी समिति पर उठे सवाल
एससीआरबी की यह रैंकिंग किस आधार पर तैयार की गई? क्या किसी ने बालूगंज थाने की जमीनी वास्तविकता की जांच की? क्या उच्च न्यायालय में चल रहे मामले या फाइल गायब होने की शिकायतों को क्रॉस-चेक किया गया? क्या रैंकिंग जारी करने से पहले थानों का लेखा परीक्षण या भौतिक सत्यापन होता है? जब हिमाचल पुलिस खुद स्वीकार कर चुकी है कि बालूगंज थाने में रिकॉर्ड से छेड़छाड़/दबाने का मामला सामने आया है, तब भी उसी थाने को अव्वल घोषित करना क्या महज संयोग है या प्रणाली में गहरी खामी?

महिला थानों की रैंकिंग में तो शिमला का महिला थाना अंतिम स्थान पर रहा, जबकि नाहन पहले स्थान पर रहा। आईसीजेएस खोज में नूरपुर थाना आगे रहा। लेकिन कुल मिलाकर शिमला जिले की “धाक” बालूगंज थाने पर टिकी हुई है जिसके खिलाफ आपराधिक रिकॉर्ड दबाने का आरोप है। जनता का सवाल सीधा है, आखिर रैंकिंग किसकी? डेटा की या न्याय की? एससीआरबी और पुलिस मुख्यालय को इस मामले पर जवाब देना चाहिए। वरना यह “अव्वल” थाना सिर्फ कागजों पर ही अव्वल रह जाएगा, हकीकत में नहीं।

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