Himachal News: क्या हिमाचल में FIR दर्ज होना अब किसी मंत्री या बड़े नेता की मर्जी पर निर्भर है?, सवर्ण आयोग के गठन और UGC के विरोध में राष्ट्रीय देव भूमि पार्टी के शिमला में हुए प्रदर्शन के बाद यही सवाल हिमाचल प्रदेश सहित देश में भी गूंज रहा है। दरअसल, दलित समाज से जुड़े संगठन और अन्य सामाजिक संगठन मांग कर रहे हैं कि सचिवालय के बाहर कथित तोड़फोड़ और पुलिस से धक्का-मुक्की के मामले में तुरंत FIR दर्ज हो। इस मांग को लेकर सोशल मीडिया के माध्यम से आवाज उठने लगी है।
उनका सवाल सीधा है कि सचिवालय के बाहर हुई कथित तोड़फोड़ और पुलिस से धक्का-मुक्की पर मामला क्यों दर्ज नहीं हुआ? प्रदेश के अलग अलग हिस्सों में कई दिन की यात्रा और राजधानी शिमला में हुए इस प्रदर्शन के दौरान अन्य जगहों से खुलेआम हथियार लहराने की तस्वीरें भी सामने आई हैं। ऐसे में क्या हिमाचल पुलिस का फर्ज नहीं बनता कि इस पर कानूनी कार्रवाई हो? क्या समाज को बाँटने वाले चंद ठेकेदार बाहरी लोगों के साथ मिलकर कानून को धत्ता बता रहे हैं?

न्याय प्रक्रिया और कानून व्यवस्था को बचाने के लिए आंदोलन का रास्ता
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर गदर फ्रंट हिमाचल के संयोजक रवि कुमार दलित ने कहा, “जब हमने आम जनता की मूलभूत सुविधाओं को लेकर कमला नेहरू अस्पताल में महिलाओं और साथियों के साथ प्रदर्शन किया था, तब हमारे ऊपर मामले दर्ज किए गए थे। हमारा पूरा प्रदर्शन शांतिपूर्ण था और हमारी मांगें जायज थीं, फिर भी हम पर FIR दर्ज की गई।
जबकि प्रदेश के मुख्यालय हिमाचल सचिवालय में तोड़फोड़ हुई, पुलिस के साथ हाथापाई और धक्का-मुक्की हुई, बोतलें मारी गईं, वर्दी फाडी गई और सरकार के पोस्टर फाड़े गए। इसके बावजूद FIR दर्ज न होना हिमाचल पुलिस के दोहरे मापदंड को दिखाता है।” उन्होंने चेतावनी दी कि अगर हिमाचल पुलिस इसी तरह दोहरे मापदंड अपनाती रही, तो न्याय प्रक्रिया और कानून व्यवस्था को बचाने के लिए उन्हें आंदोलन का रास्ता अख्तियार करना पड़ेगा, जिससे वे कभी गुरेज नहीं करेंगे।
मर्यादा और कानून का उल्लंघन, भविष्य के लिए एक खतरनाक मिसाल
वहीं देवभूमि संघर्ष समिति के सह-संयोजक मदन ठाकुर ने सचिवालय के बाहर हुए घटनाक्रम और प्रदर्शन के दौरान कथित तोड़फोड़ और यूजीसी के मुद्दे पर राजनीतिक दलों की भूमिका को लेकर बेबाक टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन विरोध के नाम पर सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और कानून-व्यवस्था को चुनौती देना किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराया जा सकता।
ठाकुर ने कहा कि यदि शिमला में शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें उठा रहे गैर-राजनीतिक लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो सकती है, तो सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के खिलाफ भी नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। उनके मुताबिक, कानून का पैमाना सभी के लिए एक समान होना चाहिए, चाहे प्रदर्शन करने वालों की संख्या सौ हो, पांच सौ हो या पांच हजार। उन्होंने कहा कि सचिवालय या विधानसभा के बाहर प्रदर्शन करने की एक मर्यादा और सीमा रही है। कोई भी गेट तोड़कर अंदर नहीं घुस सकता और सरकारी संपत्ति को नुकसान नहीं पहुँचा सकता, क्योंकि वह जनता की संपत्ति है और जनता के टैक्स के पैसे से बनी है।
धर्मशाला में हुए विधानसभा घेराव के घटनाक्रम और सचिवालय के घेराव की चेतावनियों पर उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान मर्यादा और कानून की सीमाएं लांघने की प्रवृत्ति खतरनाक साबित हो सकती है। उन्होंने आगाह किया कि यदि एक समूह सरकारी परिसर के भीतर जाने या हंगामा करने को अपनी ताकत का प्रदर्शन मानता है, तो इससे भविष्य में दूसरे समूहों को भी ऐसा करने का प्रोत्साहन मिल सकता है।
मदन ठाकुर ने ये भी कहा कि ऐसी परिस्थितियों में यदि हिंसा भड़कती है या गोली चलने जैसी स्थिति बनती है, तो नुकसान किसी बड़े नेता का नहीं, बल्कि उस आम और गरीब व्यक्ति का होता है, जो किसी विचार या विश्वास के आधार पर आंदोलन में शामिल होता है। यूजीसी के विरोध पर अपना पक्ष रखते हुए ठाकुर ने कहा कि वह स्वयं भी इसके विरोध में हैं, लेकिन इस मुद्दे को राजनीतिक लाभ हासिल करने का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए।
सुक्खू सरकार में दो मंत्रियों अनिरुद्ध सिंह और विक्रमादित्य सिंह के बयानों पर प्रतिक्रिया देते हुए ठाकुर ने आरोप लगाया कि कुछ नेता समय-समय पर जनभावनाओं से जुड़े मुद्दों पर मुखर होते हैं, लेकिन उन मुद्दों के समाधान के लिए ठोस कदम उठाने में अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाते। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों को विरोध प्रदर्शनों और संवेदनशील सामाजिक मुद्दों का इस्तेमाल केवल अपना जनाधार बढ़ाने के लिए नहीं करना चाहिए।
मंत्री अनिरुद्ध के बयान पर सवाल उठाते हुए ठाकुर ने आरोप लगाया कि राजनीतिक नेता सत्ता में रहते हुए अलग और विपक्ष में रहते हुए अलग रुख अपनाते हैं। उन्होंने कहा कि वर्ष 2021 में जब तत्कालीन मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने इस मुद्दे पर बात की थी, तब आज सवाल उठाने वाले नेता कथित तौर पर इस पर हंसते थे और इसे संभव नहीं मानते थे। मदन ठाकुर के मुताबिक, अब जब यूजीसी का मुद्दा देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है, तो कुछ नेता इसे राजनीतिक लाभ हासिल करने के अवसर के रूप में देख रहे हैं। उन्होंने भी जोर देकर कहा कि शिमला में हुए इस प्रदर्शन में कायदे-कानून और नियमों को ताक पर रखने वालों के खिलाफ नियमानुसार FIR दर्ज कर कार्रवाई हो।
“मंत्री कानून से ऊपर कैसे?”
उल्लेखनीय है कि बीते 22 अक्टूबर को मंत्री अनिरुद्ध सिंह सवर्ण आयोग के गठन और UGC के विरोध में प्रदर्शन कर रहे लोगों के बीच पहुंचे और मांगों का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि अपनी बात रखना हर किसी का अधिकार है, और भरोसा दिया कि प्रदर्शनकारियों पर कोई पुलिस कार्रवाई या FIR नहीं होगी। इसके बाद धरना खत्म हुआ और यातायात बहाल हो गया।
अब इसी आश्वासन पर सवाल उठ रहे हैं। कई अन्य संगठनों से जुड़े लोगों का भी कहना है कि FIR दर्ज करना पुलिस का कानूनी दायित्व है, किसी मंत्री की मर्जी नहीं। उनका सवाल है कि क्या कोई मंत्री यह तय कर सकता है कि किस पर कार्रवाई होगी और किस पर नहीं। उन्होंने हिमाचल पुलिस से भी यह प्रशन पूछा है कि क्या मंत्री और समाज को जाति के नाम पर बाँटने वाले चंद ठेकेदार और बाहरी लोग कानून और संविधान से ऊपर हो गए हैं।
गौरतलब है कि शिमला में प्रदर्शन के दौरान राष्ट्रीय देव भूमि पार्टी संयोजक और सवर्ण आयोग की मांग कर रहे रूमित सिंह ठाकुर का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल है। वीडियो में वे कहते सुने जा रहे हैं कि “धर्मशाला का नजारा भूल गए हो, वैसा ही हिमाचल सचिवालय का भी होगा।” यह बयान सीधे तौर पर चेतावनी और धमकी की भाषा में है। सवाल उठता है कि क्या इसका मतलब हिमाचल सचिवालय और विधानसभा पर दबाव बनाकर कब्जा करने की कोशिश था?
हिमाचल सचिवालय और विधानसभा प्रदेश की जनता की सार्वजनिक संपत्ति हैं, किसी की निजी जमीन का टुकड़ा नहीं, जिस पर जोर-जबरदस्ती से कब्जा किया जा सके। ऐसी भाषा के बाद भी अगर कार्रवाई नहीं होती, तो कानून-व्यवस्था और न्याय व्यवस्था का क्या होगा? करोड़ों रुपये खर्च होने पर चलने वाला पुलिसिया तंत्र आखिर कानून-व्यवस्था बनाए रखने में नाकाम क्यों दिखा? क्या धमकी भरे बयान और सरकारी संपत्ति को नुकसान के बाद भी FIR न होना, कानून के सबके लिए बराबर होने पर सवाल नहीं खड़ा करता?



















