Story of Pedongi: हिमाचल प्रदेश की ऐतिहासिक पर्यटक नगरी कसौली की वादियों में चल रहे खुशवंत सिंह लिटफेस्ट 2026 के दूसरे दिन मंच पर पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे बैठे थे। निरुपमा दत्त के साथ अपनी किताब ‘द क्यूरियस एंड द क्लासिफाइड: अनअर्थिंग मिलिट्री मिथ्स एंड मिस्ट्रीज’ पर बात करते हुए उन्होंने एक ऐसा नाम लिया जिसे सुनकर मंच के सामने बैठा हर कोई उत्सुक हो उठा, “पेडोंगी।”
सबके मन में एक ही सवाल था कि आखिर यह कौन सा जांबाज़ है, कौन सी टुकड़ी है? जवाब आया तो लोग हैरान रह गए, क्योंकि पेडोंगी न तो कोई मानव सिपाही थी, न ही कोई सेना की टुकड़ी। दरअसल वह तो भारतीय सेना की एक जांबाज खच्चर थी, जिसकी बहादुरी के आगे बड़े-बड़े सूरमा भी सलाम ठोकते हैं।

नरवणे ने बताया कि भारत-पाक युद्ध के दौरान जम्मू-कश्मीर सेक्टर में भारतीय सेना का एक एनिमल ट्रांसपोर्ट काफिला पाकिस्तानी गोलाबारी की चपेट में आ गया था। पाकिस्तानी सेना ने भारतीय खच्चरों को अपने कब्जे में ले लिया, जिसमें पेडोंगी भी शामिल थी। पाकिस्तानी सेना ने पेडोंगी को मामूली मालवाहक खच्चर समझकर अपनी मीडियम मशीन गन व अन्य असलहा लाद दिया ताकि वे इसे अपनी चौकियों तक पहुंचा सकें। लेकिन कई दिन पाकिस्तानी कब्जे में रहने के बाद पेडोंगी मौका मिलते ही दुश्मन को चकमा देकर उनके हथियार लूटकर कई किलोमीटर दूर खुद वतन भारत में अपनी कंपनी में लौट आई।
कौन थी पेडोंगी? जानिए! 1971 के वीर चक्र विजेता खच्चर का राज़
दरअसल पेडोंगी कि कहानी शुरू होती है 1971 के उस युद्ध से, जिसमें सैम मानेकशॉ की अगुवाई में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया और दुनिया के नक्शे पर बांग्लादेश का जन्म हुआ। लड़ाई का असली मैदान तो पूर्वी पाकिस्तान था, लेकिन दुश्मन ने जम्मू-कश्मीर से सटी सीमा पर भी चाल चलने की तैयारी की थी।
इसी दौरान आर्मी सर्विस कोर की 853वीं एनिमल ट्रांसपोर्ट कंपनी का काफिला रास्ते में था कि अचानक पाकिस्तानी गोलाबारी बरस पड़ी। कंपनी तितर-बितर हो गई। साथ चल रही इन्फैंट्री यूनिट ने जवाबी कार्रवाई कर हमला तो नाकाम कर दिया, मगर जब गिनती हुई तो तीन खच्चर गायब थे। दुश्मन उन्हें अपने साथ खींच ले गया था, और उनमें पेडोंगी भी थी।
पाकिस्तानी सैनिकों ने सोचा होगा कि उन्हें मुफ्त का सामान ढोने वाला मिल गया। उन्होंने पेडोंगी की पीठ पर अपनी मीडियम मशीन गन और गोला-बारूद लाद दिया, ताकि उसे अपनी चौकियों तक पहुंचाया जा सके। लेकिन उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि भारतीय सेना के खच्चरों को ऐसी ट्रेनिंग मिलती है कि वे चाहे कहीं भी हों, घूम-फिरकर अपनी यूनिट का रास्ता ढूंढ ही लेते हैं। ये वही खच्चर हैं जो जहां सड़क और गाड़ियां जवाब दे जाती हैं, वहां 15-20 हजार फीट की ऊंचाई तक राशन, रसद और हथियार, यहां तक कि छोटी तोप भी पीठ पर उठाकर पहुंचाते हैं।
और फिर करीब बीस दिन बाद वह हुआ जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। मौका मिलते ही पेडोंगी दुश्मन की पकड़ से निकली, एलओसी पार की और अपनी कंपनी में आ खड़ी हुई। वह खाली हाथ नहीं लौटी थी। उसकी पीठ पर वही पाकिस्तानी मीडियम मशीन गन और दो एम्युनिशन बॉक्स लदे थे, यानी जिस दुश्मन ने उसे अपना सामान ढोने के लिए पकड़ा था, उसी का हथियार वह भारत लौटा लाई। उसकी थकी हुई चाल देखकर उसके हैंडलर्स समझ गए कि वह कम से कम बीस किलोमीटर पैदल चलकर आई है।
इस वफादारी और हिम्मत का इनाम सेना ने दिल खोलकर दिया। पेडोंगी को वीर चक्र से सम्मानित किया गया, वही सम्मान जो रणभूमि में अदम्य साहस दिखाने वाले जवानों को मिलता है। इसके बाद उससे कभी बोझ नहीं उठवाया गया और उसे बेंगलुरु के एएससी रेजिमेंटल सेंटर में आराम की जिंदगी के लिए भेज दिया गया, जहां 1978 में उसने आखिरी सांस ली। 1962 से 1978 तक, पूरे 16 साल उसने वर्दी की सेवा की। उसे गए पांच दशक से ज्यादा हो चुके हैं, फिर भी बेंगलुरु के एएससी सेंटर में आज उसकी तस्वीर और मेडल सहेजकर रखे गए हैं, और रेजिमेंटल सेंटर का एक लाउंज उसके नाम से जाना जाता है।



















