Triloknath Temple Controversy: हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिले लाहौल-स्पीति स्थित प्रसिद्ध त्रिलोकनाथ मंदिर की खड़ाऊं उठाने और फेसबुक पर धार्मिक उन्माद फैलाने के मामले में कोई कार्रवाई न होने से यह मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। साल 2023 में हुई इस घटना को ढाई साल बीत जाने के बाद भी ठोस कदम न उठाया जाना पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े करता है।
इस पूरे मामले में अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पुलिस ने गहनता से जांच पूरी करके फाइनल चालान तैयार कर लिया है, तो आखिर किस स्तर पर और क्यों कानूनी कार्रवाई रुकी हुई है? पुलिस जांच पूरी होने के बाद फाइल को अभियोजन स्वीकृति की आधिकारिक प्रक्रिया के लिए भेजा गया था, लेकिन तब से लेकर अब तक यह मामला आगे नहीं बढ़ पाया है।

मामले के आधिकारिक पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, यह पूरा विवाद 24 दिसंबर 2023 की एक घटना से शुरू हुआ था। उस समय त्रिलोकनाथ मंदिर से भगवान की पवित्र खड़ाऊं उठाए जाने की बात सामने आई थी। इस घटनाक्रम के बाद सोशल मीडिया पर कथित तौर पर कई आपत्तिजनक पोस्ट और भड़काऊ टिप्पणियां की गई थीं, जिसके बाद स्थानीय स्तर पर भारी विरोध दर्ज किया गया था और पुलिस में शिकायत दी गई थी।
पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153-A और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC-ST Act) की विभिन्न सुसंगत धाराओं के तहत एफआईआर (FIR) दर्ज कर कानूनी जांच शुरू की थी। ताजा उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, पुलिस विभाग ने इस संवेदनशील मामले की अपनी ओर से पूरी जांच संपन्न कर ली थी, और चार्जशीट यानी फाइनल चालान भी पूरी तरह तैयार कर लिया था।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, प्रक्रिया के तहत तैयार चालान की फाइल को पहले उपायुक्त कार्यालय केलांग भेजा गया था। वहां से प्राथमिक जांच व विभागीय प्रक्रिया पूरी करने के उपरांत फाइल को अंतिम अभियोजन स्वीकृति प्रदान करने के लिए राजधानी शिमला स्थित संबंधित उच्च कार्यालय में भेजा जाना था। हालांकि, शिमला फाइल भेजे जाने की जानकारी सामने आने के काफी समय बाद भी इस पर कोई ठोस प्रगति होती नहीं दिख रही है।
यहीं से इस पूरे प्रशासनिक और कानूनी घटनाक्रम पर सबसे बड़ा सवालिया निशान खड़ा होता है। कानून के जानकारों और आम जनता के मन में यह सवाल उठ रहा है कि यदि जांच एजेंसी पुलिस ने अपनी निष्पक्ष जांच पूरी कर ली है और न्यायालय में पेश किया जाने वाला फाइनल चालान भी तैयार है, तो फिर सक्षम स्तर से अभियोजन स्वीकृति मिलने में इतना विलंब क्यों हो रहा है?
स्वीकृति में हो रही इस देरी के कारण प्रशासनिक गलियारों में कई तरह की आशंकाएं और सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या मामले से जुड़ी फाइल शिमला भेजी गई है, या फाइल में कोई तकनीकी या कानूनी कमी पाई गई है, जिसके कारण इसे वापस रोका गया है? या फिर क्या अभियोजन स्वीकृति देने से पहले संबंधित विभाग द्वारा कोई अतिरिक्त रिपोर्ट या दस्तावेज मांगा गया है जो अभी लंबित है?
इसके अलावा एक सवाल यह भी है कि क्या संबंधित विभाग ने फाइल का अध्ययन कर कोई निर्णय ले लिया है या फिर यह मामला केवल फाइलों के बीच विचाराधीन बनकर रह गया है? सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर जांच पूर्ण है, तो आरोपियों के खिलाफ न्यायिक प्रक्रिया शुरू करने में देरी क्यों की जा रही है?
इस मामले में जब उपायुक्त लाहौल, किरण भड़ाना, और एसपी लाहौल, शिवानी मेहला, से फोन पर संपर्क करने की कोशिश की गई, तो शायद व्यस्तता के कारण उन्होंने फोन नहीं उठाया। यदि इस विषय में उनकी कोई प्रतिक्रिया आती है, तो उसे खबर में शामिल कर लिया जाएगा।

उल्लेखनीय है कि यह पूरा मामला दिसंबर 2023 का है, यानी एफआईआर दर्ज हुए दो साल से भी अधिक का समय बीत चुका है। इतने लंबे अंतराल के बाद भी जब पुलिस की जांच पूरी हो चुकी है, तब मामला अभियोजन स्वीकृति की औपचारिक प्रक्रिया के जाल में उलझा हुआ है। ऐसे में यह सवाल भी प्रासंगिक हो जाता है कि क्या राज्य में अभियोजन स्वीकृति देने की कोई निश्चित समयसीमा तय है या नहीं? और यदि इसके लिए नियम व समयसीमा निर्धारित हैं, तो इस विशेष मामले में उसका पालन किस सीमा तक किया गया है?
इस पूरे घटनाक्रम में स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभाग की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। केलांग डीसी कार्यालय से शिमला फाइल भेजे जाने की बात तो कही जा रही है, लेकिन आधिकारिक स्तर पर यह स्पष्ट नहीं किया जा रहा है कि फाइल वर्तमान में किस अधिकारी या टेबल पर लंबित है। यह मामला सिर्फ एक धार्मिक स्थल या मंदिर विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें एससी-एसटी एक्ट जैसी बेहद संवेदनशील धाराएं भी जुड़ी हुई हैं। ऐसे गंभीर कानूनी मामलों में कार्रवाई में अनिश्चित देरी प्रशासन की कार्यप्रणाली, जवाबदेही और प्रक्रियात्मक पारदर्शिता पर सीधे सवाल खड़े करती है।
फिलहाल उपलब्ध सभी तथ्यों से यही साफ होता है कि पुलिस ने अपना काम पूरा करते हुए फाइनल चालान तैयार कर दिया है, लेकिन शासन-प्रशासन के स्तर पर अभियोजन स्वीकृति न मिलने से मामला आगे नहीं बढ़ पा रहा है। अब आवश्यकता इस बात की है कि संबंधित विभाग सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करे कि फाइल कहां और क्यों अटकी है, तथा स्वीकृति पर निर्णय कब तक लिया जाएगा। जनता सिर्फ यह नहीं जानना चाहती कि फाइल शिमला भेज दी गई है, बल्कि मुख्य सवाल यह है कि चालान तैयार होने के बाद भी आरोपियों पर कानूनी कार्रवाई कब शुरू होगी।


















