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अपनी पहचान खोता जा रहा है बरोट–चौहार घाटी तथा छोटा भंगाल का आलू

Published on: 21 July 2021
अपनी पहचान खोता जा रहा है बरोट–चौहार घाटी तथा छोटा भंगाल का आलू

बरोट–चौहार घाटी तथा छोटाभंगाल घाटी में किसानों द्वारा सदियों पूर्व आलू की खेती खूब की जाती थी मगर आजकल आलू की फसल का उचित दाम न मिलने के कारण यहाँ के किसानों ने आलू की फसल की पैदावार करने के वजाय ज्यादातर विभिन्न प्रकार की सब्जियों बिजने का रुख कर दिया है। इन दोनों घाटियों के किसानों द्वारा बीजा जाने वाला आलू सदियों से ही प्रसिद्द होने के कारण भले ही आज भी मंडियों में अपनी पेंठ बरकरार रखे हुए हैं मगर कुछ ही वर्षों से यहाँ के किसान आलू के उत्पादन को लगभग अलविदा करना ही बेहतर समझ रहे हैं।

सरकार से कोई खास प्रोत्साहन, खासकर आलू का उचित मूल्य न मिलने के कारण आलू को छोड़कर अन्य सब्जियों फूल गोभी, बंद गोभी, मटर, मूली, राजमाह आदि को उगाने को प्राथामिकता देनी शुरू कर है। दोनों घाटियों के किसानों द्वारा उगाया जाने वाला यह आलू दूरदराज क्षेत्रों में (बरोट का आलू) नाम से अपनी ख्याति अर्जित करता आ रहा है। मगर आजकल इस बरोट के आलू का उत्पादन गत कई वर्षों से वैसे भी कम होता जा रहा है। यहाँ के किसान आलू उत्पादन में हर वर्ष आ रही गिरावट के लिए जहाँ कुछ वर्षों से आलू की फसल को लगाने वाली झुलसा जैसी कई बीमारियों को जिम्मेदार मान रहे है वहीँ उत्पादन व बिक्री के लिए सरकार व समन्धित विभाग द्वारा कोई खास प्रबंधों का अभाव भी इसका मुख्य कारण बताया जा रहा है।

घाटियों के किसानों का कहना है कि आज से लगभग तीस–चालीस वर्ष पूर्व यहाँ पर आलू की बम्पर फसल होती थी। यहाँ के किसान उस समय मुख्यतः ढाखरी, चन्द्र मुखी, कुफरी ज्योति, गोला व कुफरी गिरिराज किस्म का आलू बीजते थे। उस समय मुख्यता आलू, राजमह, मक्की व जौ की फसलें अधिक मात्रा में होती थी। यहाँ का आलू बीज तथा राजमह हिमाचल के जिलों के अलावा अन्य राज्यों पंजाब, हरियाणा व देहली के लिए भेजा जाता था। समूची घटी से हजारों टन आलू यहाँ से बहार भेजा जाता था। उस समय आलू की किस्मों को बिमारियों से बचाने के लिए सरकार द्वारा मुफ्त दवाइयां तथा
स्प्रे मुहैया करवाई जाती थी। मगर बाद मे ये सभी चीजें बिल्कुल हवा हो गई। किसानों का कहना है कि इन दोनों घाटियों में वर्षों पूर्व ढाखरी किस्म का आलू भारी मात्र मे उगाया जाता था मगर कुछ वर्षों से इन घाटियों में आलूओं की नई किस्में आ जाने से इस आलू को नहीं बीज रहे हैं। तर्क है कि यह आलू अलग ही किस्म का होता था तथा इसका आकार सामान्य आलू से बड़ा, चौड़ा व अधिक स्वादिष्ट भी होता था। हालांकि यहाँ के कई गाँवों में आज भी बहुत कम मात्रा में यह आलू उगाया जा रहा है। इसके बाद
यहाँ होने वाली आलू की फसल को प्रति वर्ष ही जल्द ही कोई न कोई बीमारी लगती आ रही है। गोरतलव है कि घाटियों में कहीं भी कोल्ड स्टोर नहीं है जिस कारण यहाँ के किसानों को काफी नुक्सान उठाना पड़ता है।

घाटियों के किसानों में वजिन्द्र सिंह, रामसरन चौहान, राज कुमार, विनोद कुमार तथा दान सिंह का कहना है कि कोल्ड स्टोर के अभाव के कारण उनका आलू उनके गाँव या फिर सड़कों के किनारे ही कई–कई दिनों तक पड़ा रहने के बाद सडने लग पड़ता है। वहीं यहाँ पर स्थित सरकार की आलू फार्म से मंहगा बीज मिलने के कारण भी उत्पादन की कमी का कारण किसानों का कहना है कि आलू का समुचित उत्पादन हो इसके लिए सरकार व विभाग को फसल की बीमारियों से बचाने के लिए आलू का सही दाम व कोल्ड स्टोर की व्यवस्था करवानी चाहिए।

कृषि विभाग पद्धर के एसएमएस राजिन्द्र ठाकुर का कहना है कि चौहार घाटी व टाभंगाल में किसानों का कुछ सालों से आलू की तरफ रूझान कम होने लगा और सब्जियों की तरफ अधिक यह इसलिए कि आलू के दाम कम मिलने के साथ दवाईयों के छिड़काव से अधिक मात्रा में आलू सड़ जाता था जिससे यहां के आलू की मांग भी कम होती गई। 15-20 साल पहले जो इस घाटी में आलू का उत्पादन होता था वह बीज के लिए सबसे उतम माना जाता था और खाने में भी अधिक स्वादिष्ट होता था। विभाग किसानों को कम दामों में आलू के बीज और फसल को बिमारियों से बचने के लिए दवाईयों व खाद का उचित प्रबंध करने का प्रयास कर रहा है ताकि किसानों का सब्जियों के साथ-साथ आलू की खेती की तरफ भी अधिक रुझान हो और अधिक उत्पादन करके अछा लाभ कमा सके।
प्रताप अरनोट

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