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हैंग ग्लाइडिंग व पैराग्लाइडिंग साहसिक खेलों ने बीड़-विलिंग को विश्वभर में दिलाई नई पहचान

हैंग ग्लाइडिंग व पैराग्लाइडिंग साहसिक खेलों ने बीड़-विलिंग को विश्वभर में दिलाई नई पहचान

प्रताप अरनोट|
पक्षियों की तरह हवा में उडने की कोशिश आदमी शुरू से करता आ रहा है। कहते है कि आवश्यकता अविष्कार की जननी है। अगर हम हैंग ग्लाइडिंग का इतिहास देखे तो सबसे पहले चीन में छठी शताब्दी के अंत में ग्लाइडिंग के शुरुआत के प्रमाण मिलत है। 1853 में जाॅर्ज केली ने एक पायलटेड ग्लाइडर का आविष्कार किया परन्तु यह सुरक्षित नहीं था। 1880 के दशक में तकनीकी और वैज्ञानिक उन्नति शुरू हई। जाॅन जोसेफ मोटगोमरी द्वारा संयुक्त राज्य में ग्लाइडर विकसित किए और व्यावहारिक ग्लाइडर्स सामने आए। ओटो लिलिएंथल ने 1890 के दशक में नियंत्रित करने योग्य ग्लाइडर्स का निर्माण किया जिसके साथ वह उंची उडान भर सकता था।

ओटो लिलिएंथल सबसे पहले विमामन के क्षेत्र में अग्रदूत माने जाने लगे। इनका हैंग ग्लाइडर नियंत्रित किया जा सकता था जो सबसे बेहतरिन माना गया। 1904 में जान लावेजारी ने बर्कबीच फ्र्रांस से एक डबल लेटेन सेल हैंग ग्लाइडर उडाया। इसी तरह हैंग ग्लाइडर के निर्माता नई तकनिक के साथ हैंग ग्लाइडर के अविष्कार करते रहे। 1940 में वाॅलमेर जेन्सेन ने वीजे-11 नामक एक बाइप्लेन हैंग ग्लाइडर के साथ फुट-लाॅन्च किए गए हैंग ग्लाइडर के सुरक्षित तीन-अक्ष नियंत्राण की अनुमति दी। 23 नवंबर, 1948 को
फांसिस रोगलो और गर्ट्रूड रोजैलो ने ग्लाइडिंग उपयोगों के लिए अनुमोदित दावों के
साथ आवेदन किया। 1960-1962 में बैरी हिल पामर ने चार अलग-अलग नियंत्रण
व्यवस्था के साथ पैर-लाॅच हैंग ग्लाइडर बनाया। 1963 में माइक बर्न्स ने एक
टिकाऊ पतंग-लटका ग्लाइडर बनाया जिसे स्कीप्लेन कहा जाता था। 1963 में जाॅन

डब्ल्यू डिकेंसन ने एक और पानी-स्की पतंग ग्लाइडर बनाया। जैसे-जैसे विश्व में
हैंग ग्लाइडिग के नए-नए अविष्कार होते गए वैसे-वैसे ही विश्व में कई देश
ग्लाइडिंग में उडान भरने लगे। दुसरे दशों को देख भारत भी पिछे रहने वाला नहीं
था। भारत में हैंग ग्लाइडिंग की शुरूआत पुना के पास बैलुर पहाड़ी से 1976 में
मेजर विवेक मुंडकर ने पहली उड़ान भर कर की थी। फिर मेजर विवेक मुंडकर ने
इंगलैंड जाकर हैंग ग्लाइडिंग की पूरी जानकारी लेने के साथ-साथ ग्लाइडर बनाने
की तकनीक भी सीखी। भारत लौटने पर उसने सैनिक छावनी के अन्य फौजियों
को भी हैंग ग्लाइडिंग के प्रति जागरूक किया। इंगलैंड की तकनीक पर आधारित
मेजर विवेक मुंडकर के सहयोग से पुना में पहला भारतीय ग्लाइडर तैयार किया
गया जिसका नाम गरूड़ रखा गया। लेकिन भारत में उस समय कहीं भी हैंग
ग्लाइडिंग से उडान भरने के लिये बेहतर स्थान नहीं मिल रहा था। जिसकी तलाश
में मुंबई के पायलट दीपक महाजन भी जुटे हुये थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात
पालमपुर के नवीन सरीन व पब्बी सरीन से हुई। उन्होंने दीपक महाजन को
हिमाचल प्रदेश में हैंग ग्लाइडिंग के लिये स्थान मिलने की उम्मीद बंधाई। दीपक
महाजन ब्रिटेन के हैंग ग्लाइडर विशेषज्ञ जान बाॅब के साथ पूरे हिमाचल की
घाटियों का निरिक्षण किया। अंततः पूरे एशिया में बिलिंग एक ऐसा स्थल सर्वोतम
लगा जो हैंग ग्लाइडिंग के लिए बिलकुल सही था। मिली जानकारी के अनुसार
1980 में इजराइल के कीथ व न्यूजीलेैंड के नील ने विलिंग को उडान भरने के
लिए सबसे पहले चुना था। दोनों विदेशी हैंग ग्लाइडर थे और ऐसी जगह की तलास
कर रहे थे जो उडान भरने तथा उसके बाद लेंडिग के लिए सुरक्षित हो। बीड़ के
स्थानीय निवासी पूरण चंद ने दोनों विदेशियों की इसके लिए सहायता की। इन
दोनों विदेशियों ने पूरण चंद से विलिंग में चाय की दुकान खुलवाई ताकि इन दोनों
विदेशियों और आने जाने वालों को चाय नास्ता मिल सके। इन दोनोेें विदेशियों ने
1980 में विलिंग से सबसे पहली हैंग ग्लाडिंग की उडान भरी थी। बिलिंग में इतनी

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ढलानदार जगह है कि जहां एक साथ 40 हैंग ग्लाइडर खड़े किये जा सकते हैं। बर्ष
1984 में पहली बार बिलिंग में अंतर्राष्ट्रिय हैंग ग्लाइडिंग प्रतियोगिता का आयोजन
हुआ था। बर्ष 1985 में इसका आयोजन राष्ट्रीय स्तर पर हुआ। वर्ष 1986 में हैंग
ग्लाइडिंग पर रोक लगा दी गई और इसी वर्ष ब्रुस नाम के एक विदेशी ने अपने
दोस्तों के साथ पहली उडान भर कर पैराग्लाइडिंग की शुरूआत की। वर्ष 1991 में
फिर से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हैंग ग्लाइडिंग प्रतियोगिता आयोजित कि गई और इस
प्रतियोगिता को वल्र्ड़ नम्बर वन हैंग ग्लाइडिंग चैंपियनशिप का नाम दिया गया।
जिसमें भारत सहित 11 देशों के 33 प्रतियोगियों ने भाग लिया। इस प्रतियोगिता
के दौरन भारत के स्कवाड्रन लीडर आर पी देव की उडान भरने के बाद दुर्घटना के
कारण मृत्यू हो गई थी। वर्ष 1992 में बिलिंग में प्रथम पैरा ग्लाइडिंग रैली का
आयोजन किया गया। वर्ष 2014 में प्री वल्र्ड कप तथा 2015 में वल्र्ड कप का
आयोजन किया गया। 21 अक्तूबर 2015 पैराग्लाइडिंग विश्व कप का आयोजन
किया गया। अब समय-समय पर देश-विदेश से पैरा ग्लाइडिंग का आनंद लेने के
लिए आते रहते है। हैंग ग्लाइडिंग तथा पैराग्लाइडिेंग के लिए बिलिंग घाटी एशिया
में पहली जगह है जिसने भारत के हिमाचल प्रदेश को विश्व स्तर पर नयी पहचान
दी। बीड़ में तिब्बति शरणार्थियों के शिविर व भव्य बौद्य मंदिर होने से काफी
मनोरम तथा पर्यटक स्थल है। बिलिंग मंडी-पठानकोट उच्च मार्ग जोगिन्द्र नगर
क्षेत्र के बीड़ रोड़ से मात्र 17 किलामीटर की दूरी पर है। समुद्र तल से लगभग
8500 फिट ऊंचाई पर स्थित बिलिंग बहुत ही प्राकृतिक मनोरम स्थल है। यहां से
बिलिंग के लिये टैक्सी द्वारा जाया जा सकता है। अब हिमाचल प्रदेश हवा में
उड़ने वाले रोमांचकारी खेलों के लिये प्रसिद्ध है। एशिया में बीड़-विलिंग पहला एक
मात्र ऐसी जगह है जहां हवा में उड़ने वालें हैंग ग्लाइडिंग व पैरा ग्लाइडिंग खेलों
के आयोजनों की शुरूआत हुई और हिमाचल प्रदेश का नाम विश्व के मानचित्र में
आया। हिमाचल प्रदेश में बिलिंग घाटी के साथ-साथ अब प्रदेश् भर में देश-विदेश

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के लाखों पर्यटक पैरा ग्लाइडिंग का आनंद लेने के लिए आते है। अब पैराग्लाइडिंग
पर्यटन व्यवसाय के रूप में प्रदेश भर में विकसित हो गया है। प्रदेश के वेरोजगार
युवा इस रोजगार को अपना कर अपने परिवार की आजिविका चला रहे है।

Kasauli International Public School, Sanwara (Shimla Hills)
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