Himalayan Village Adoption: जिस पीढ़ी को अक्सर अपनी शॉपिंग, नए ट्रैवल ट्रेंड्स और सोशल मीडिया के प्रभाव से जोड़कर देखा जाता है, उन्हीं युवाओं का एक समूह हिमालय में एक अलग ही ट्रेंड शुरू करने का प्रयास कर रहा है। ये युवा गांवों को पैसों से नहीं, बल्कि अपनी सोच, समय, हुनर और काम करने की क्षमता से अपनाने की पहल कर रहे हैं।
यहां ‘गांव को अपनाने’ का अर्थ आर्थिक जिम्मेदारी लेना नहीं, बल्कि उस जगह के साथ एक ऐसा रिश्ता बनाना है जिसमें युवा अपनी क्षमता के अनुसार लगातार योगदान दे सकें। चंडीगढ़ के निखिल शर्मा की अगुवाई में शुरू हुई यह पहल देश के अलग-अलग हिस्सों से युवाओं को हिमालयी समुदायों से जोड़ रही है। इसका उद्देश्य सिर्फ पहाड़ों की सैर करना नहीं, बल्कि वहां के लोगों के बीच जाकर उनकी चुनौतियों को समझना और अपनी क्षमताओं के जरिए पर्यावरण एवं समुदाय से जुड़े प्रयासों में योगदान देना है।
इसी कड़ी में गत सप्ताह सैंज वैली के मनयाशी, देवरी और सराहन गांवों में युवाओं ने स्कूली विद्यार्थियों और ग्रामीणों के साथ मिलकर पर्यावरण संरक्षण और जिम्मेदार पर्यटन को लेकर पहल की। यह प्रयास इस बदलती सोच की झलक भी देता है कि आज का युवा यात्रा को किस नजर से देख रहा है। पहाड़ अब केवल घूमने, तस्वीरें खिंचवाने और सोशल मीडिया पर पोस्ट करने की जगह नहीं रह गए हैं।

युवाओं का एक वर्ग उन जगहों और वहां रहने वाले लोगों के साथ एक गहरा और सार्थक रिश्ता बनाने की कोशिश कर रहा है। निखिल के अनुसार वे चाहते हैं कि युवा हिमालय को एक अलग नजर से देखें। कोई गांव सिर्फ ऐसी जगह नहीं होना चाहिए, जहां आप कुछ दिन रुकें और फिर आगे बढ़ जाएं। अगर आपके पास ज्ञान, कोई हुनर, नए विचार या कुछ करने की इच्छा है, तो आप उस समुदाय के लिए कुछ सार्थक कर सकते हैं।
सैंज वैली के स्कूलों में युवाओं ने विद्यार्थियों के साथ प्लास्टिक कचरे, उसके पर्यावरण पर असर और कचरे के रिस्पॉन्सिबल (या जिम्मेदार) डिस्पोजल को लेकर संवाद किया। खेलों और इंटरैक्टिव गतिविधियों के जरिए बच्चों को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ा गया, वहीं ड्राइंग और रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से छोटे बच्चों को स्वच्छ गांव और प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाने की कोशिश की गई।
युवाओं ने गांव के प्रधान और स्थानीय ग्रामीणों से भी मुलाकात की और स्वच्छता, वेस्ट मैनेजमेंट तथा गांव के विकास से जुड़ी स्थानीय चुनौतियों को समझा। यानी यह पहल सिर्फ बाहर से समाधान देने की कोशिश नहीं थी, बल्कि पहले गांव की बात सुनने और फिर मिलकर रास्ता तलाशने में प्रयासरत रही।
निखिल अब इस मॉडल को हिमाचल प्रदेश के दूसरे हिस्सों तक ले जाने की योजना बना रहे हैं। इससे पहले कांगड़ा जिले की धौलाधार पहाड़ियों में करैरी और त्रिउंड के ट्रेक भी उनके प्रयासों का हिस्सा रहे हैं, जिन्हें स्थानीय लोगों से अच्छी प्रतिक्रिया मिली थी। अब उनका लक्ष्य देश के अलग-अलग हिस्सों से युवाओं को जोड़कर ऐसी यात्राओं की एक व्यापक श्रृंखला तैयार करना है।


















