Sabarimala Case Supreme Court: सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक प्रथाओं से जुड़े दशकों पुराने विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को तीखी बहस हुई। केंद्र सरकार ने लिखित दलीलें पेश करते हुए जनहित याचिकाओं (PIL) की उपयोगिता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सरकार ने स्पष्ट रूप से कहा कि अब वह समय आ गया है जब जनहित याचिका को न केवल पुनर्परिभाषित किया जाना चाहिए, बल्कि इसे पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए।
केंद्र सरकार के अनुसार, PIL का कॉन्सेप्ट उस दौर की उपज था जब देश की एक बड़ी आबादी गरीबी, निरक्षरता और कानूनी संसाधनों के अभाव के कारण अदालतों तक नहीं पहुंच पाती थी। सरकार ने तर्क दिया कि आज ‘ई-फाइलिंग’ और उन्नत तकनीक के माध्यम से न्याय व्यवस्था हर व्यक्ति की पहुंच में है। अब एक साधारण पत्र भी सीधे अदालत तक पहुंच जाता है, ऐसी स्थिति में जनहित याचिकाओं की पुरानी व्यवस्था को जारी रखने का कोई ठोस आधार नहीं बचता।
इस पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने संतुलित टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालतें स्वयं PIL स्वीकार करने के मामले में अत्यंत सतर्क रहती हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि वर्ष 2006 से 2026 तक, पिछले दो दशकों में न्यायिक परिदृश्य बदला है। बेंच ने स्पष्ट किया कि नोटिस केवल उन्हीं मामलों में जारी किए जाते हैं जिनमें कोई ठोस कानूनी आधार पाया जाता है।
विदित हो कि धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से जुड़ा यह मामला पिछले 26 वर्षों से विभिन्न अदालतों में विचाराधीन है। 2018 में 5 जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी, जिसके बाद 50 से अधिक पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं।
सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान बेंच अब 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक इन याचिकाओं पर विस्तृत सुनवाई करेगी। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, याचिकाओं का समर्थन करने वाले पक्ष 7 से 9 अप्रैल तक अपनी दलीलें देंगे, जबकि विरोध करने वाले पक्ष 14 से 16 अप्रैल के बीच अपना पक्ष रखेंगे।


















