Solan News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सोलन जिले के नालागढ़ उपमंडल के अंतर्गत प्लासरा स्थित एक औद्योगिक इकाई के खिलाफ उठे गंभीर पर्यावरणीय मुद्दों पर कड़ा रुख अपनाया है। ‘हिमपरिवेश पर्यावरण संरक्षण संस्था बनाम हिमाचल प्रदेश सरकार एवं अन्य’ (CWPIL No. 90 of 2026) मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने क्षेत्र में फैल रहे प्रदूषण और भूजल के अत्यधिक दोहन पर चिंता व्यक्त की है।
बता दें कि 11 अगस्त 2026 को हुई सुनवाई के दौरान अदालत को अवगत कराया गया कि इस उद्योग की स्थापना और इसके द्वारा फैलाए जा रहे प्रदूषण के विरोध में स्थानीय स्तर पर 11 पंचायतों ने एकजुट होकर प्रस्ताव पारित किए हैं। याचिका में दी गई जानकारी के अनुसार, सोलन जिले की नालागढ़ तहसील के प्लासरा औद्योगिक क्षेत्र के प्लॉट नंबर-1 पर स्थित M/s Kinvan Private Limited (मामले में प्रतिवादी नंबर 10) द्वारा कथित तौर पर रेड कैटेगरी का उद्योग स्थापित किया गया है।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता देवेन खन्ना, प्रशांत शर्मा, प्रिया शर्मा और संभव भसीन ने मामले की पैरवी की। अदालत के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि इस औद्योगिक परियोजना को ‘B2’ श्रेणी के तहत मंजूरी प्रदान की गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि उद्योग की स्थापना के समय से ही स्थानीय लोगों द्वारा लगातार आपत्तियां जताई जा रही थीं, जिसके परिणामस्वरूप 11 ग्राम पंचायतों ने इसके खिलाफ औपचारिक प्रस्ताव पारित कर अपना विरोध दर्ज कराया है।
प्रदूषण का यह मामला केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। याचिका में स्पष्ट किया गया कि नालागढ़ बार एसोसिएशन और नगर पालिका परिषद नालागढ़ ने भी औद्योगिक कचरे के अनुचित निपटान और उससे होने वाली समस्याओं को लेकर प्रस्ताव पारित किए हैं। याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट को बताया कि उक्त इकाई से निकलने वाला जहरीला औद्योगिक अपशिष्ट सीधे चिकनी खड्ड में बहाया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, प्लांट से निकलने वाली तीव्र दुर्गंध के कारण आसपास के रिहायशी इलाकों में रहने वाले नागरिकों का जीना दूभर हो गया है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, इन पर्यावरणीय उल्लंघनों के संबंध में पूर्व में भी संबंधित उच्च अधिकारियों को कई शिकायतें, प्रतिवेदन और ई-मेल भेजे गए थे। हालांकि, प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस और त्वरित कार्रवाई न होने के कारण अंततः मामला न्यायपालिका के समक्ष लाना पड़ा। प्रशासनिक उदासीनता के कारण स्थानीय जल स्रोतों और पर्यावरण को हो रहे नुकसान पर हाईकोर्ट ने कड़ा संज्ञान लिया है।
मामले की सुनवाई के दौरान भूजल के अवैध और अत्यधिक दोहन का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। अदालत को बताया गया कि ग्राउंड वाटर अथॉरिटी द्वारा संबंधित उद्योग को केवल एक बोरवेल स्थापित करने और प्रतिदिन अधिकतम 6,71,000 लीटर पानी निकालने की अनुमति दी गई है। इसके विपरीत, याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उद्योग द्वारा स्वीकृत सीमा से लगभग पांच गुना अधिक पानी का दोहन किया जा रहा है। हाईकोर्ट ने इस गंभीर आरोप को भी अपनी आधिकारिक जांच के दायरे में शामिल किया है।
प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधवालिया और न्यायमूर्ति बिपिन सी. नेगी की खंडपीठ ने सोलन जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) के सचिव की अध्यक्षता में एक विशेष निरीक्षण टीम गठित करने का आदेश दिया है। इस निरीक्षण के दौरान हिमाचल प्रदेश राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, ग्राउंड वाटर अथॉरिटी और जल शक्ति विभाग के वरिष्ठ अधिकारी अनिवार्य रूप से मौजूद रहेंगे।
जांच टीम को उद्योग परिसर में स्थापित बोरवेल, पानी की गुणवत्ता, आसपास के प्राकृतिक जल स्रोतों में औद्योगिक अपशिष्ट छोड़े जाने की स्थिति और वायु प्रदूषण से जुड़े सभी पहलुओं की सूक्ष्मता से जांच कर अपनी विस्तृत रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। हाईकोर्ट ने प्रतिवादी नंबर 10 को नोटिस जारी कर दिया है, जिसे 21 सितंबर 2026 को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है। बता दें कि इसी उद्योग से जुड़े पर्यावरणीय मुद्दों को लेकर एक मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के समक्ष भी विचाराधीन है।
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