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हिमाचल प्रदेश कांग्रेस बनेगी विकल्प या BJP बदलेगी रिवाज, जानिए क्यों दोनों दलों के लिए है चुनौती

हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में चर्चा में कई दल मैदान में है।, लेकिन असल मुकाबला अभी अभी भी कांग्रेस और बीजेपी के ही बीच में है। हालांकि हिमाचल प्रदेश में सरकार को दोबारा रिपीट करने का रिवाज नहीं है और इसी के चलते कांग्रेस की सत्ता में आने की आशा बनी हुई है। जहां हिमाचल का संकल्प कांग्रेस का विकल्प नारा है, वहीं कि इस बार सरकार नहीं, रिवाज़ बदलेंगे, बीजेपी का नारा है। हालांकि दोनों ही दलों के लिए इस चुनाव में बड़ी चुनौतियां हैं। हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता वीरभद्र सिंह के गुजरने के बाद नेतृत्व सुखविंदर ठाकुर और पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह में बंटा हुआ है, वीरभद्र के करीबी हर्ष महाजन बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। जहां प्रियंका गांधी की टीम और राजीव शुक्ल कांग्रेस का हिमाचल में संचालन कर रहे हैं, वहीं मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के साथ केंद्र से सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने हिमाचल प्रदेश की कमान संभाल रखी है, लेकिन हिमाचल प्रदेश का चुनाव बीजेपी के लिए भी नाक का सवाल है। बीजेपी अध्यक्ष जे पी नड्डा खुद हिमाचल प्रदेश से हैं और यहां हुई राजनैतिक ऊंच नीच का असर उनके करियर पर पढ़ सकता है, इसलिए गुजरात के चुनाव की तरह हिमाचल प्रदेश भी दोनों पार्टियों के लिए भी ये नाक का सवाल है, लेकिन दोनों पार्टियों की चुनौतियाँ अलग हैं। वहीं मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के साथ केंद्र से सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने हिमाचल प्रदेश की कमान संभाल रखी है, जहां भाजपा के पूर्व अध्यक्ष कांग्रेस में शामिल हुए हैं वहीं टिकट बदलाव का भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती हो सकती है। बता दें कि हिमाचल प्रदेश का चुनाव बीजेपी के लिए भी नाक का सवाल है।बीजेपी अध्यक्ष जे पी नड्डा खुद हिमाचल प्रदेश से हैं और यहां हुई राजनैतिक ऊंच नीच का असर उनके करियर पर पढ़ सकता है, इसलिए गुजरात के चुनाव की तरह हिमाचल प्रदेश भी दोनों पार्टियों के लिए भी ये नाक का सवाल है, लेकिन दोनों पार्टियों की चुनौतियाँ अलग हैं। बीजेपी को नुकसान ओल्ड पेंशन स्कीम और फल उत्पादकों के गुस्से से हो सकता है, राज्य में 8 लाख सरकारी कर्मचारी हैं और कांग्रेस ऐलान कर चुकी है कि वो सत्ता में आने के बाद पुरानी पेंशन स्कीम को लागू कर देगी। वहीं फल उत्पादकों को लग रहा है कि गुजरात के बड़े उद्योपतियों के चक्कर में उनको सही दाम नहीं मिल रहे। एक बड़े गुजराती उद्योगपति फ़ूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री से जुड़े हैं और ये मामला तूल पकड़ रहा है। उसके ऊपर टीचर भर्ती का मामला भी गर्म है यानी मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के सामने स्थानीय मुद्दे गर्म हैं। उनका खुद का कार्यकाल भी बहुत असरदार नहीं रहा है, लेकिन बीजेपी के पास नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे नेता हैं जो चुनाव की लय बदल सकते हैं । हालांकि हिमाचल की सत्ता को प्रभावित करने वाले सवर्ण वोटरों का सवर्ण आंदोलन भी भाजपा की जीत को राह में एक बड़ी चुनौती रहेगा। वहीं कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती ये है कि वो लोगों को यकीन दिलाये कि चुनाव में बीजेपी का विकल्प आम आदमी पार्टी नहीं है, पंजाब में जीत के बाद आप हिमाचल प्रदेश में बहुत सक्रिय है, प्रतिभा सिंह और सुक्खू के बीच तालमेल ठीक नहीं है। इससे कांग्रेस को नुकसान हो सकता है। दूसरी बड़ी चुनौती कांग्रेस की यह है कि वो हिमाचल प्रदेश के चुनावों को राष्ट्रीय मुद्दों से कितना दूर रख पाती है। वैसे तो हिमाचल प्रदेश में दबदबा ठाकुर समाज का रहा है और कम अवसर पर ब्राह्मण ही मुख्यमंत्री रहे हैं, इसलिए दोनों पार्टियों ने फ्रंटलाइन में ज्यादा बदलाव नहीं किया है, लेकिन इस बार बीजेपी ने अपना प्रदेश अध्यक्ष दलित समाज से चुना है।

हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में चर्चा में कई दल मैदान में है।, लेकिन असल मुकाबला अभी अभी भी कांग्रेस और बीजेपी के ही बीच में है। हालांकि हिमाचल प्रदेश में सरकार को दोबारा रिपीट करने का रिवाज नहीं है और इसी के चलते कांग्रेस की सत्ता में आने की आशा बनी हुई है। जहां हिमाचल का संकल्प कांग्रेस का विकल्प नारा है, वहीं कि इस बार सरकार नहीं, रिवाज़ बदलेंगे, बीजेपी का नारा है। हालांकि दोनों ही दलों के लिए इस चुनाव में बड़ी चुनौतियां हैं।

हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता वीरभद्र सिंह के गुजरने के बाद नेतृत्व सुखविंदर ठाकुर और पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह में बंटा हुआ है, वीरभद्र के करीबी हर्ष महाजन बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। जहां प्रियंका गांधी की टीम और राजीव शुक्ल कांग्रेस का हिमाचल में संचालन कर रहे हैं, वहीं मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के साथ केंद्र से सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने हिमाचल प्रदेश की कमान संभाल रखी है, लेकिन हिमाचल प्रदेश का चुनाव बीजेपी के लिए भी नाक का सवाल है। बीजेपी अध्यक्ष जे पी नड्डा खुद हिमाचल प्रदेश से हैं और यहां हुई राजनैतिक ऊंच नीच का असर उनके करियर पर पढ़ सकता है, इसलिए गुजरात के चुनाव की तरह हिमाचल प्रदेश भी दोनों पार्टियों के लिए भी ये नाक का सवाल है, लेकिन दोनों पार्टियों की चुनौतियाँ अलग हैं।

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वहीं मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के साथ केंद्र से सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने हिमाचल प्रदेश की कमान संभाल रखी है, जहां भाजपा के पूर्व अध्यक्ष कांग्रेस में शामिल हुए हैं वहीं टिकट बदलाव का भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती हो सकती है। बता दें कि हिमाचल प्रदेश का चुनाव बीजेपी के लिए भी नाक का सवाल है।बीजेपी अध्यक्ष जे पी नड्डा खुद हिमाचल प्रदेश से हैं और यहां हुई राजनैतिक ऊंच नीच का असर उनके करियर पर पढ़ सकता है, इसलिए गुजरात के चुनाव की तरह हिमाचल प्रदेश भी दोनों पार्टियों के लिए भी ये नाक का सवाल है, लेकिन दोनों पार्टियों की चुनौतियाँ अलग हैं।

बीजेपी को नुकसान ओल्ड पेंशन स्कीम और फल उत्पादकों के गुस्से से हो सकता है, राज्य में 8 लाख सरकारी कर्मचारी हैं और कांग्रेस ऐलान कर चुकी है कि वो सत्ता में आने के बाद पुरानी पेंशन स्कीम को लागू कर देगी। वहीं फल उत्पादकों को लग रहा है कि गुजरात के बड़े उद्योपतियों के चक्कर में उनको सही दाम नहीं मिल रहे। एक बड़े गुजराती उद्योगपति फ़ूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री से जुड़े हैं और ये मामला तूल पकड़ रहा है। उसके ऊपर टीचर भर्ती का मामला भी गर्म है यानी मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के सामने स्थानीय मुद्दे गर्म हैं। उनका खुद का कार्यकाल भी बहुत असरदार नहीं रहा है, लेकिन बीजेपी के पास नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे नेता हैं जो चुनाव की लय बदल सकते हैं । हालांकि हिमाचल की सत्ता को प्रभावित करने वाले सवर्ण वोटरों का सवर्ण आंदोलन भी भाजपा की जीत को राह में एक बड़ी चुनौती रहेगा।

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वहीं कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती ये है कि वो लोगों को यकीन दिलाये कि चुनाव में बीजेपी का विकल्प आम आदमी पार्टी नहीं है, पंजाब में जीत के बाद आप हिमाचल प्रदेश में बहुत सक्रिय है, प्रतिभा सिंह और सुक्खू के बीच तालमेल ठीक नहीं है। इससे कांग्रेस को नुकसान हो सकता है। दूसरी बड़ी चुनौती कांग्रेस की यह है कि वो हिमाचल प्रदेश के चुनावों को राष्ट्रीय मुद्दों से कितना दूर रख पाती है।

वैसे तो हिमाचल प्रदेश में दबदबा ठाकुर समाज का रहा है और कम अवसर पर ब्राह्मण ही मुख्यमंत्री रहे हैं, इसलिए दोनों पार्टियों ने फ्रंटलाइन में ज्यादा बदलाव नहीं किया है, लेकिन इस बार बीजेपी ने अपना प्रदेश अध्यक्ष दलित समाज से चुना है।

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