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पहाड़ी राज्य हिमाचल का 53वां पूर्ण राज्यत्व दिवस,1971 में आज ही के दिन हुई थी पूर्ण राज्य की घोषणा

Himachal Statehood Day:

शिमला।
आज हिमाचल प्रदेश स्थापना दिवस है। आज पहाड़ी राज्य हिमाचल 52 साल का सफर तय कर 53 साल में प्रवेश कर चुका है. 25 जनवरी 1971 को माइनस डिग्री तापमान में रिज मैदान के टका बेंच से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की घोषणा की। अपने पांच दशक से ज्यादा के इतिहास में हिमाचल ने कई उतार-चढ़ाव देखें हैं।

हिमाचल 25 जनवरी, 1971 को देश का 18वां राज्य बना। हिमाचल का गठन 15 अप्रैल, 1948 को किया गया था, लेकिन उस समय का हिमाचल बेहद छोटा था और पहली नवंबर, 1956 को हिमाचल केंद्रशासित प्रदेश बना। इस समय हिमाचल में केवल चार जिले थे। ज्यादातर पहाड़ी इलाके पंजाब में थे। संपूर्ण और वर्तमान का विशाल हिमाचल बनने के लिए 18 साल का लंबा वक्त लगा।

25 जनवरी, 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने शिमला आकर ऐतिहासिक रिज पर भारी बर्फबारी के बीच हिमाचल वासियों के समक्ष हिमाचल प्रदेश की 18वें राज्य के रूप में शुरुआत करवाई। पहली नवंबर, 1972 को तीन जिले कांगड़ा, ऊना तथा हमीरपुर बनाए गए। महासू जिला के क्षेत्रों में से सोलन जिला बनाया गया।

हिमाचल निर्माता और प्रथम मुख्यमंत्री यशवंत सिंह परमार वर्ष 1976 तक हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। उनके बाद ठाकुर राम लाल मुख्यमंत्री बने और प्रदेश बागडोर संभाली। वर्ष 1977 में प्रदेश में जनता पार्टी चुनाव जीती और शांता कुमार मुख्यमंत्री बने। वर्ष 1980 में ठाकुर राम लाल फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हो गए। आठ अप्रैल, 1983 को उनकी जगह मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को बनाया गया। 1985 के चुनाव में वीरभद्र सिंह नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी को भारी बहुमत मिला और वीरभद्र सिंह मुख्यमंत्री बने। 1990 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की सरकार बनी और शांता कुमार को दोबारा मुख्यमंत्री बनाया गया। 15 दिसंबर, 1992 को राष्ट्रपति के अध्यादेश द्वारा भाजपा सरकार और विधानसभा को भंग कर दिया गया। हिमाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया।

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प्रदेश में दोबारा चुनाव करवाए गए और वीरभद्र सिंह एक बार फिर मुख्यमंत्री बन गए। वर्ष 1998 के चुनाव में सत्ता भाजपा के हाथ चली गई और प्रेम कुमार धूमल को पहली बार प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वर्ष 2003 के चुनाव में भाजपा को सत्ता से हाथ धोना पड़ा और कांग्रेस सरकार बनाने में कामयाब हुई और इस दौरान मुख्यमंत्री फिर से वीरभद्र सिंह को बनाया गया। वर्ष 2007 में भाजपा सरकार बनाने में कामयाब हुई और इस दौरान मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल बने। नवंबर, 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जीत हासिल की। 68 सीटों में से 36 सीटें जीतकर कांग्रेस ने सरकार बनाई और वीरभद्र सिंह फिर मुख्यमंत्री बन गए। नवंबर, 2017 में भाजपा ने विधानसभा चुनाव प्रो. प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में लड़ा। नतीजों में धूमल की हार के बाद केंद्रीय नेतृत्व ने हिमाचल की बागडोर सराज विधानसभा क्षेत्र से पांच बार रहे विधायक जयराम ठाकुर को सौंपी। हिमाचल के इतिहास में यह पहली बार है जब मंडी जिला से कोई मुख्यमंत्री बना है। इसके बाद वर्ष 2022 में हुए चुनाव में एक बार फिर कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की और इस बार हिमाचल प्रदेश की कामना हमीरपुर जिला के नादौन से जीत कर आने वाले सुखविंदर सिंह सुक्खू को मिली है।

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छोटा राज्य होने के बावजूद चुनौतियों का पहाड़ पार किया। शिक्षा ही नहीं स्वास्थ्य के क्षेत्र में पहाड़ी ही नहीं बल्कि बड़े राज्यों के लिए आदर्श बना है।
हर गांव तक का सड़क पहुंचाने का लक्ष्य हालांकि अभी तक पूरा नहीं हुआ लेकिन पहाड़ी के जज्बे का ही कमाल है कि मेरे पास आज 35 हजार किलोमीटर से ज्यादा सड़कों का जाल है। इन्हीं सड़कों के दम पर ही विकास की बुनियाद रखी गई।
समय के चक्र के साथ साक्षरता दर बढ़ती रही। बड़े राज्यों को शिक्षा के क्षेत्र में पछाडऩे के बाद आज हिमाचल साक्षरता दर में देश में दूसरे नंबर पर है साक्षरता दर 80 फीसद से ज्यादा है। आज कई बड़े संस्थान यहां खुल चुके हैं जहां देश सहित विदेशों से आकर भी छात्र शिक्षा ग्रहण करते हैं।

पहाड़ी राज्य होने के नाते पानी नदियों में था, लेकिन गांव नदियों से दूर थे। 300 बस्तियां ही ऐसी थीं, जहां पानी पहुंचता था। हर घर में नल लगाने का मेरा सपना कब पूरा होगा, यही सोचता था। आज हिमाचल में 7500 से ज्यादा पेयजल और इससे भी कहीं ज्यादा सिंचाई की योजनाएं हैं।

पहाड़ों को चीरते हुए नदियों के पानी दूसरे राज्य नहीं बल्कि देशों तक पहुंच जाता था। हिमाचल के विकास में इसकी क्या भूमिका हो सकती है। इस पर काफी मंथन के बाद बिजली प्रोजेक्ट लगाना शुरू हुए है। देश का सबसे बड़ा बिजली प्रोजेक्ट नाथपा-झाखड़ी एक समय हिमाचल में ही लगा। 1500 मेगावाट क्षमता का प्रोजेक्ट आज भी देश के कई राज्यों को रोशन करता है। इसके अलावा अब कई और प्रोजेक्ट भी लगे हैं। बिजली से रोशनी भले ही दूसरे राज्यों को मिली, लेकिन खजाना भी बढ़ा। हिमाचल हर साल बिजली बेच कर ही 1000 करोड़ रुपये से ज्यादा कमाता है। आज हिमाचल का हर गांव बिजली से जुड़ा है।

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राज्य में प्रशासनिक विस्तार के कई तरह से मायने देखे जा सकते हैं। आज हिमाचल प्रदेश में हरेक जिला का अपना प्रशासनिक ढांचा है और उन्नति के लिए हरेक जिला की अपनी योजनाएं हैं। सभी जिलों का प्रशासनिक ढांचा अपने स्तर पर काम कर रहा है।

प्रदेश चलाने के लिए सरकार को जरूरी था कि प्रशासनिक ढांचे को बढ़ाया जाता, जिसके चलते हिमाचल में 12 जिला बनाए गए। इन जिलों में जिलाधीश हैं, जिनके अधीन पूरा प्रशासनिक ढांचा है, जो अपना-अपना काम कर रहा है। सभी जिलों के जिलाधीश जहां वार्षिक बजट की योजनाओं को सिरे चढ़ाने में जुटे हैं, वहीं जिलों की अपनी योजनाएं भी हैं। वहीं, केंद्र सरकार की योजनाएं भी अब सीधे रूप से जिलों को पहुंचने लगी हैं।

प्रशासनिक विस्तार को दूसरी तरफ से देखें, तो यहां अधिकारियों का कुनबा भी बढ़ा है। चाहे आईएएस अधिकारी हों या फिर आईएफएस या आईपीएस। इन कॉडर के विस्तार के अलावा यहां स्टेट कॉडर का भी विस्तार हुआ है, जो प्रदेश के प्रशासनिक तौर पर विकास में महत्त्वपूर्ण है। यहां सभी विभागों में प्रशासनिक रूप से उन्नति हुई है, जहां रोजगार बड़े पैमाने पर जुटा है, वहीं जो चेन बनी, उससे निचले स्तर पर प्रशासनिक ढांचा मजबूत बना है।

पूर्ण राज्यत्व का दर्जा मिलने के बाद हिमाचल प्रदेश ने कई क्षेत्रों में तरक्की की है, लेकिन चुनौतियां अभी कम नहीं हुई हैं। 68 लाख से अधिक आबादी वाले पहाड़ी प्रदेश हिमाचल के सामने कर्ज से पार पाना बड़ी चुनौती बना है। 70 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के कर्ज का बोझ हो गया है। बेशक हर क्षेत्र में विकास की बयार बह रही हो लेकिन अपने खर्चों पर नियंत्रण करने के साथ ही आय के साधन बढ़ाने की जरूरत है।

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